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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: सनसनी पर विश्वसनीयता को महत्व देने वाले पत्रकार

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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:  सनसनी पर विश्वसनीयता को महत्व देने वाले पत्रकार

राजदीप सरदेसाई का कॉलम: सनसनी पर विश्वसनीयता को महत्व देने वाले पत्रकार


टीवी स्क्रीन और मोबाइल फोन के हमारे जीवन पर हावी होने से बहुत पहले रेडियो की दुनिया थी। 1970 के दशक के भारत में पले-बढ़े हम जैसे लोगों के लिए रेडियो ही व्यापक संसार की खिड़की हुआ करता था। और उसी में बीबीसी रेडियो सेवा भी थी। हर सुबह मेरे दिवंगत दादाजी- जो एक पुलिस अधिकारी थे- एक घंटे के योग और ध्यान के बाद उसका दैनिक बुलेटिन सुनते थे। वे मुझसे कहा करते थे, अगर खबर चाहिए तो बीबीसी सुनो। समाचारों की दुनिया में डूबा एक जिज्ञासु बच्चा होने के नाते बीबीसी तब मेरा शुरुआती साथी बन गया था। और इसी के साथ मिस्टर बीबीसी कहलाने वाले- द वन एंड ओनली मार्क टली (बाद में सर मार्क टली) भी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए। मुझे याद है, 1984 में मैं एक हजामत की दुकान में था, जब बीबीसी पर खबर आई कि इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई है। ऑल इंडिया रेडियो शोकपूर्ण संगीत बजा रहा था, लेकिन इस भयावह खबर की पुष्टि मार्क टली की स्पष्ट और प्रभावी आवाज ने की। वर्षों बाद, 1992 में, जब बाबरी मस्जिद गिराई गई, तब मैं मुंबई में एक रिपोर्टर था। उस समय भी सबसे सटीक और मौके से की गई रिपोर्टिंग के लिए हम बीबीसी और टली की ओर ही मुड़े। तब कारसेवकों की भीड़ ने टली का पीछा किया था और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई थी, लेकिन इस भयावह अनुभव के बावजूद उन्होंने घटनाओं को यथासंभव स्पष्टता के साथ सामने रखा। वे भरोसे और विश्वसनीयता की आवाज थे। उनके भीतर ये गुण समय के साथ और एक विशाल देश के कोने-कोने की वर्षों की कठिन यात्राओं के जरिए गढ़े गए थे। बीबीसी के भारत ब्यूरो प्रमुख के रूप में वे कई दशकों तक घटित हुए ऐतिहासिक और विनाशकारी घटनाक्रमों के साक्षी रहे थे। मुझे याद है, 1990 के दशक के मध्य में मैं अपने कैमरापर्सन के साथ यूपी की यात्रा कर रहा था। हम लखनऊ के पास एक गांव पहुंचे, जहां एक आम के बाग के मालिक ने हमें चाय के लिए अपने घर बुलाया। उन्होंने हमें एक एल्बम दिखाया, जिसमें कुछ साल पहले टली के साथ खींची उनकी एक तस्वीर थी। वे उत्साह से बोले, यह मेरा फैन मोमेंट था। टली साहब उस दौर के सेलिब्रिटी थे, जब पहचान बनाने के लिए आवाज ऊंची करना जरूरी नहीं होता था। शांत, संयत और अधिकारपूर्ण लहजे में बोलना ही पर्याप्त हुआ करता था। मेरा भी उस महान पत्रकार के साथ अपना ‘फैन मोमेंट’ रहा है। 1994 में मैं दिल्ली आया था और राजधानी के सत्ता-गलियारों को समझने की कोशिश कर रहा था। राजनेताओं से ज्यादा मुझे मार्क टली से मिलने की उत्सुकता थी। जब मैंने उनसे समय लेने के लिए फोन किया, तो उन्होंने तुरंत जवाब दिया और कहा कि उन्हें मुझसे मिलकर खुशी होगी। उन्हें साथी पत्रकारों की संगत पसंद थी और वे अपनी कहानियां तथा व्यापक अनुभव उन सभी के साथ साझा करते थे, जो उन्हें सुनना चाहते थे। वे उन ‘फिरंगी’ पत्रकारों में से नहीं थे, जो भारतीय पत्रकारों से सिर्फ सूचनाओं के लिए सम्पर्क करते हों; बल्कि वे खुद को व्यापक भारतीय पत्रकारिता समुदाय का अभिन्न हिस्सा मानते थे और आजीवन मित्रताएं निभाते थे। शायद यही कारण था कि उन्हें इंग्लैंड की तुलना में भारत में कहीं अधिक अपनापन महसूस होता था। भारत के प्रति उनका स्नेह और लगाव वास्तविक था, वह कोई ओरिएंटलिस्ट-फैंटसी नहीं थी। टली के लिए भारत दृश्य-श्रव्य अनुभवों की वह जीवंत दुनिया था, जिसने उन्हें पूरी तरह से मोहित कर लिया था। उन्होंने कुछेक टीवी डॉक्यूमेंट्री जरूर कीं- जिनमें भारतीय रेल यात्राओं पर बनी एक यादगार फिल्म भी शामिल थी- लेकिन रेडियो ही उनका पहला प्यार रहा था। शायद इस माध्यम की सादगी उन्हें आकर्षित करती थी। एक बार मैंने उन्हें एक टीवी बहस के लिए आमंत्रित किया। काफी मनाने के बाद वे आए, लेकिन वो अनुभव उन्हें खास पसंद नहीं आया। उन्होंने कहा, यह सब कुछ ज्यादा ही शोरगुल भरा नहीं है? इन अर्थों में वे एक ऐसे शालीन-युग के पत्रकार थे, जिसमें सनसनी और कोलाहल पर विश्वसनीयता और सच्चाई को तरजीह दी जाती थी। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई हमारी आखिरी बातचीत मुझे आज भी याद है, जहां वे अकसर अपने करीबी दोस्तों के साथ नजर आया करते थे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा था, मुझे लगता है कि आज के भारत में पत्रकार होना आसान नहीं है! मैंने भी उनकी ओर देखा और हल्के से सिर हिला दिया। कई बार चेहरे का भाव हजार शब्दों से ज्यादा कह देता है। और जैसा कि उनकी पुस्तक का एक शीर्षक ही कहता है- भारत में कभी पूर्ण विराम नहीं होते। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई हमारी आखिरी बातचीत में उन्होंने कहा था, मुझे लगता है कि आज के भारत में पत्रकार होना आसान नहीं है! मैंने भी सिर हिला दिया। कई बार चेहरे का भाव हजार शब्दों से ज्यादा कह देता है।
अलविदा सर मार्क, शुभ यात्रा!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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