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मनुष्य कुछ नहीं करता, सब भगवान की इच्छा से होता है, क्रोध और अहंकार से बचना चाहिए – rajgarh (MP) News

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मनुष्य कुछ नहीं करता, सब भगवान की इच्छा से होता है, क्रोध और अहंकार से बचना चाहिए – rajgarh (MP) News

मनुष्य कुछ नहीं करता, सब भगवान की इच्छा से होता है, क्रोध और अहंकार से बचना चाहिए – rajgarh (MP) News


मैया विजयासन धाम भैंसवामाता में चैत्र नवरात्र के अवसर पर चल रही श्रीराम कथा में व्यासपीठ से प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि इस संसार में भगवान की इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। मनुष्य अक्सर किसी कार्य के सफल होने पर स्वयं को उसका कर्ता मान लेता है, जबकि सनातन सत्य ये है कि प्रकृति का कण-कण व मनुष्य का क्षण-क्षण भगवान के नियंत्रण में है। राम जी जब जो सोचते हैं, वही होता है, मनुष्य के हाथ में कुछ भी नहीं होता। कथा के चौथे दिन महाराज ने कहा कि हमारे धर्म शास्त्रों में मनुष्य के जीवन के लिए पांच प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं। गृहस्थ जीवन स्वयं में एक यज्ञ है, लेकिन इसके साथ भूत यज्ञ, पितृ यज्ञ, ब्रह्म यज्ञ व देव यज्ञ का पालन भी आवश्यक माना गया है। जो व्यक्ति धर्म सम्मत जीवन जीता है, वह सहज रूप से इन सभी यज्ञों को पूरा कर लेता है। ये यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित व सार्थक बनाने का मार्ग हैं। विनम्रता से बढ़ती है आयु, विद्या व यश : कथा के दौरान एक संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए महाराज ने बताया कि जो व्यक्ति विनम्र व सुशील होता है और प्रतिदिन बड़ों की सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश व बल में वृद्धि होती है। ये जीवन के चार प्रमुख स्तंभ हैं, जिन्हें पाने के लिए व्यवहार में सरलता व सेवा भाव जरूरी है। NEWS4SOCIALइनसाइट यज्ञ, कथा की दान राशि से बनवा रहे भव्य मंदिर मैया विजयासन मंदिर का निर्माण यज्ञ व रामकथा से प्राप्त दान राशि से कराया जा रहा है। मंदिर की लंबाई 220 फीट व चौड़ाई 105 फीट प्रस्तावित है। यज्ञ व कथा का ये पांचवां साल है और अब तक गर्भगृह का करीब 90% कार्य पूरा हो चुका है। गर्भगृह पर छत डल चुकी है। शिखर निर्माण शेष है। राजस्थान के मकराना के पत्थरों का उपयोग किया जा रहा है। ये मंदिर सांवरिया सेठ धाम के पैटर्न पर विकसित किया जा रहा है। 30 करोड़ रुपए खर्च का अनुमान है। समर्पण से मिलती है प्रियता : महाराज महाराज ने कहा कि किसी का प्रिय बनने के लिए व्यक्ति को ढलना व गलना पड़ता है। दूर रहकर भी प्रियता प्राप्त की जा सकती है, लेकिन इसके लिए त्याग व समर्पण जरूरी है। लक्ष्मण जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि बाल्यकाल से ही उनका समर्पण राम जी के प्रति रहा, इसलिए वे अत्यंत प्रिय बने। व्यक्ति में जब समर्पण की पराकाष्ठा होती है, तभी वह किसी के हृदय में स्थान बना पाता है।

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