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मंगलवार को मटन खाता था, इसलिए सिर काट डाला: दोस्त की प्रेमिका से अफेयर रखने वाले का प्राइवेट पार्ट काटा; दिल्ली किलर पार्ट-3

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मंगलवार को मटन खाता था, इसलिए सिर काट डाला:  दोस्त की प्रेमिका से अफेयर रखने वाले का प्राइवेट पार्ट काटा; दिल्ली किलर पार्ट-3

मंगलवार को मटन खाता था, इसलिए सिर काट डाला: दोस्त की प्रेमिका से अफेयर रखने वाले का प्राइवेट पार्ट काटा; दिल्ली किलर पार्ट-3

बात 24 अप्रैल 2007 की है। रात के 9 बज रहे थे। दिल्ली के हैदरपुर बादली गांव के एक घर में दो लोग चिकन खा रहे थे। अचानक एक शख्स उठा और बोला, ‘उपेंद्र, तुम्हें आज सजा देनी है।’ उसने रस्सी से उपेंद्र के हाथ-पैर बांध दिए। उपेंद्र हंसते हुए बोला- ‘कितना मजा

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इसके बाद उस शख्स ने गड़ासे से उपेंद्र का सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर लाश के हाथ-पैर भी काट दिए। लाश के छह हिस्सों को प्लास्टिक, कपड़े और अखबार से लपेटकर गत्ते के तीन डिब्बों में पैक कर दिया। रात करीब एक बजे इंजन वाली रेहड़ी लाश के डिब्बे लादकर हैदरपुर बादली की तरफ निकल पड़ा।

रास्ते में पीतमपुरा में बाबा रामदेव मंदिर के बाहर लगी ग्रिल पर लाश का एक पैर टांग दिया। फिर तीस हजारी कोर्ट में जजों के एंट्री-एग्जिट गेट के पास एक हाथ लटका दिया। दूसरा हाथ कोर्ट बिल्डिंग के बगल में फेंक दिया। फिर रेहड़ी लेकर तिहाड़ जेल के गेट नंबर 3 के पास पहुंचा और धीरे से लाश वाला डिब्बा वहीं रख दिया।

सुबह 8 बजे हरिनगर थाने में फोन की घंटी बजी। आवाज आई, ‘एक और लाश तोहफे में भिजवा दिया हूं। तिहाड़ जेल के गेट नंबर-3 पर जाकर देख लो। दम है तो मुझे पकड़कर दिखाओ।’

SHO होशियार सिंह एक कॉन्स्टेबल के साथ तिहाड़ जेल के गेट नंबर 3 पर पहुंचे। सामने एक गत्ते का डिब्बा रखा था जिसमें लाश थी। इसी कातिल ने अक्टूबर 2006 में भी ठीक इसी तरह अनिल नाम के लड़के की हत्या की थी और लाश तिहाड़ जेल के गेट नंबर 3 पर रख दी थी।

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दिल्ली पुलिस को एक साल के भीतर तिहाड़ जेल के गेट नंबर 3 पर तीन लाशें मिलीं थीं। सभी लाशें कटी-फटी। दो लाश के साथ चिट्ठी भी। जिस पर लिखा था- ‘दिल्ली पुलिस, कान खोलकर सुन लो। अब तक मैं नाजायज केस झेलता रहा, लेकिन अब मैंने हकीकत में मर्डर किया है। मुझे पकड़ कर दिखाओ, तब समझूंगा कि दिल्ली पुलिस ऊपर से नीचे तक के स्टाफ असल मां-बाप की पैदाइश हैं।…तुमलोगों का बाप और तुम्हारा जीजा C.C’

इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर सुंदर यादव केस की जांच में जुटे थे। उन्हें एक फोटो मिली थी। वे पुलिस वालों के इसकी छानबीन में जुटे थे।

दैनिक NEWS4SOCIALकी सीरीज ‘मृत्युदंड’ में दिल्ली किलर के पार्ट-1 और पार्ट-2 में इतनी कहानी तो आप जान ही चुके हैं। आज पार्ट-3 में आगे की कहानी…

18 मई 2007, सूरज सिर तक चढ़ चुका था। इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर सुंदर यादव ने अपनी टीम को आजादपुर मंडी की अलग-अलग गलियों में भेजा। यह देश की सबसे बड़ी सब्जी-फलों की मंडियों में से एक है। हेड कॉन्स्टेबल रोहिताश, एसआई नरेंद्र पहलवान और एसआई वीरेंद्र त्यागी के हाथ में चंद्रकांत झा की ब्लैक एंड वाइट धुंधली सी फोटो थी और वे मंडी की गली-गली घूम रहे थे।

हेड कॉन्स्टेबल रोहिताश ने ये फोटो आजादपुर मंडी वाले मुखबिर को दिखाई। फोटो देखते ही वो बोला- ‘ऐसा ही एक आदमी पहले मंडी के आसपास रहता था। पल्लेदारी का काम करता था। अब कहां है, पता नहीं।’

एक-एक दुकान में पूछते-पूछते शाम हो गई, लेकिन चंद्रकांत झा का कोई पता नहीं चला। तभी एसआई नरेंद्र पहलवान ने एक और आदमी को फोटो दिखाई, वो देखते ही बोल पड़ा- ‘सामने जो डॉक्टर का क्लिनिक दिखाई दे रहा है, ये वहां आता रहता है।’

रोहिताश और नरेंद्र पहलवान क्लिनिक की तरफ भागे और अंदर चले गए। इंस्पेक्टर सुंदर सिंह थोड़ा दूर रुक गए। अंदर डॉक्टर, एक पेशेंट से कुछ बात कर रहा था। सामने रखी बेंच पर बैठते हुए रोहिताश ने फोटो डॉक्टर के सामने रख दी। पूछा-‘इसे देखा है क्या?’

डॉक्टर के माथे पर पसीना आ गया। लड़खड़ाती जुबान में बोला- ‘नहीं, मैं नहीं जानता। आप लोग बाहर जाइए।’

चंद्रकांत झा की फोटो दिखाकर डॉक्टर से पूछताछ करती पुलिस। स्केच: संदीप पाल

तभी डॉक्टर के फोन की घंटी बजी। उसने हड़बड़ा कर फोन उठाया। और बोला-हां। ये सुनते ही नरेंद्र पहलवान ने उसे जोर से एक थप्पड़ जड़ दिया। पूछा- ‘उसी का फोन है न?’

कांपते हुए डॉक्टर बोला- ‘हां साहब’।

इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर सुंदर सिंह ने रोहिताश से कहा- ‘उठाकर जीप में डालो इसे।’

स्पेशल सेल में डॉक्टर से पूछताछ शुरू हुई। एसआई नरेंद्र पहलवान ने पूछा- ‘बता, कब से जानता है इसको।’

डॉक्टर बोला- ‘उसकी पत्नी ममता मुझसे ही इलाज करवाती है। उसके 5 बच्चे हैं। आज 4 बजे उसे क्लिनिक आना था।’

हेड कॉन्स्टेबल रोहिताश ने डंडा दिखाते हुए कहा- ‘तब तो तुझे सब पता होगा।’

डॉक्टर बोला- ‘साहब वो मेरे साले का जानने वाला है। उसकी वजह से उसे जानता हूं।’

हेड कॉन्स्टेबल- ‘दोनों के फोन नंबर दो।’

डॉक्टर ने फौरन ही चंद्रकांत और उसकी पत्नी के फोन नंबर दे दिए।

एसआई नरेंद्र पहलवान ने रोहिताश से कहा, ‘इसके साले का पता लो और उसे भी तुरंत उठा लाओ।’

रोहिताश कुछ ही देर में डॉक्टर के साले को भी स्पेशल सेल ले आया।

19 मई को रोहिताश ने डॉक्टर से कहा- ‘चंद्रकांत को फोन करो। बोलो- वो कल चार बजे क्लिनिक क्यों नहीं आया।’

डॉक्टर ने चंद्रकांत झा को फोन किया। आवाज आई- ‘हां, आज आ रहा हूं।’

इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर सुंदर सिंह ने केला बेचने वाले का भेष बनाया। लुंगी-शर्ट पहनकर क्लिनिक के आस-पास घूमने लगे। टीम के बाकी लोग भी सिविल ड्रेस में इधर-उधर घूम रहे थे। सभी को 4 बजने का इंतजार था, लेकिन… वो आया ही नहीं।

सुंदर सिंह यादव ने थाने में कॉल करके ड्यूटी ऑफिसर से कहा- ‘डॉक्टर का साला वहां बैठा हुआ है। तुम लोग चंद्रकांत के बारे में पूछताछ क्यों नहीं कर रहे हो।’

तब ड्यूटी ऑफिसर ने डॉक्टर के साले से पूछा- ‘सच, सच बता चंद्रकांत क्या करता है?’

जवाब मिला- ‘साहब, उसके पास इंजन वाली रेहड़ी है।’

इंजन वाली रेहड़ी… ड्यूटी ऑफिसर ने फौरन सुंदर सिंह को फोन किया। सर… ये तो बता रहा है कि चंद्रकांत के पास इंजन वाली रेहड़ी है।

सुंदर सिंह ने हेड कॉन्स्टेबल रोहिताश को फोन लगाया और बोले- ‘आसपास देखो कहीं कोई इंजन वाली रेहड़ी है क्या?’

फौरन सभी इंजन वाली रेहड़ी की तलाश में जुट गए। कुछ ही देर बाद एसआई नरेंद्र पहलवान को एक आदमी दिखा। उन्होंने पूछा- ‘यहां कोई इंजन वाली रेहड़ी है क्या?’ उसने करीब ही एक मकान की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘वहां है।’

अलीपुर की गुलिया कॉलोनी के उस मकान का नंबर था 592, पास ही एक शिव मंदिर था। रोहिताश और बाकी पुलिसवाले दरवाजा खोलकर जैसे ही अंदर घुसे, देखा कि करीब 35 साल का सांवला सा एक आदमी जमीन पर बैठकर हलवा खा रहा था। सामने पांच बच्चियां बैठी हुई थीं। साथ ही एक महिला भी थी। शायद ये उसकी पत्नी और बेटियां थीं।

रोहिताश ने उसे देखते ही जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। गाली देते हुए बोला- ‘तू चंद्रकांत झा है न।’

वह आदमी तमतमाता हुआ बोला, ‘मैं तो विकास हूं।’

रोहिताश ने दो थप्पड़ और जड़ दिए। इतनी ही देर में इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर सुंदर सिंह भी आ गए।

सुंदर सिंह को देखते ही वो आदमी बोला- ‘अच्छा, तो आप हैं आईओ सुंदर सिंह। सही घर में आए हैं। मैं ही चंद्रकांत झा हूं। आप बाजी जीत गए और मैं हार गया। आपने मुझे पकड़ लिया। हलवा खा लूं फिर चलता हूं।’

सभी पुलिस वाले उसे घेरकर खड़े हो गए और चंद्रकांत हलवा खाता रहा। इसके बाद ठसक से बोला-‘देखो, कोई मुझे मारेगा नहीं। सब बताऊंगा कि मैंने कितने मर्डर किए हैं।’

सुंदर यादव उसे राजौरी गार्डन स्पेशल सेल ले गए।

स्पेशल सेल में चंद्रकांत झा से पूछताछ शुरू हुई। स्केच: संदीप पाल

‘तुमने ये मर्डर किए हैं?’ रोहिताश का पहला सवाल था।

बिना किसी हिचकिचाहट के चंद्रकांत बोला- ‘हां, मैंने किए हैं।

सुंदर सिंह ने अपनी डायरी पलटते हुए चंद्रकांत से पूछा- ‘और कितने मर्डर किए हैं।’

जवाब आया, ‘सात।’

नरेंद्र पहलवान ने पूछा- ‘कब से कर रहा है ये सब?’

‘1998 से’

रोहिताश ने पूछा- ‘लाश जेल के बाहर क्यों फेंकते थे?’

‘बलवीर को तंग करने के लिए’, चंद्रकांत झा ने खीझते हुए जवाब दिया।

कौन बलवीर…?

चंद्रकांत बोला-‘जब मैं तिहाड़ जेल में बंद था, तो हवलदार बलवीर सिंह बहुत तंग करता था। तभी सोच लिया था कि जेल से बाहर निकला तो उसे खूब परेशान करूंगा।’

तुम तिहाड़ जेल में कब बंद थे? आईओ सुंदर सिंह के सवाल पर चंद्रकांत अपनी कहानी बताने लगा-

मैं बिहार के मधेपुरा जिले के घोसाई गांव का रहने वाला हूं। मां टीचर थी। पापा सरकारी नौकरी में थे, पर कोई मुझसे प्यार नहीं करता था। 1986 मैं घर से भागकर दिल्ली आ गया। यहां पल्लेदारी का काम करने लगा। फिर आजादपुर मंडी में सब्जी की रेहड़ी लगाने लगा।’

चंद्रकांत झा से पूछताछ करती पुलिस। स्केच: संदीप पाल

हेड कॉन्स्टेबल रोहिताश ने टोकते हुए पूछा- ‘जब काम मिल गया तो ये सब क्यों करने लगा?’

चंद्रकांत बोला- ‘पुलिसवाले पैसे वसूल रहे थे। मंडी की एक कमेटी थी, मंगल पंडित अध्यक्ष था। वह हफ्ता वसूलता था। मैंने मना किया, तो कई और सब्जीवालों ने भी हफ्ता देना बंद कर दिया। मंगल चिढ़ गया। एक रोज उससे मारपीट हो गई। मेरे हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू था, वह मंगल के हाथ में लग गया। खून देखते ही वह भागा-भागा पुलिस के पास चला गया। मुझे जेल में बंद करा दिया। उसने मेरी पत्नी को भी जेल भिजवा दिया, जबकि उसकी कोई गलती नहीं थी।

मैं जिस सेल में था, वहां बलवीर नाम का हवलदार था। बहुत परेशान करता था। पैंट उतरवा देता था। कहता था, पैखाना साफ करो। झाड़ू लगाओ।’

‘1998 में किसको मारा…?’ सुंदर यादव ने पूछा।

‘मंगल पंडित को’

‘कैसे मारा?’

चंद्रकांत बोला- ‘जेल से आने के बाद मैं मंगल से मिला और दोस्ती कर ली। फिर गांव गया और घरवालों को बिना बताए जमीन बेच दी। डेढ़ लाख रुपए मिले। दिल्ली आया तो मंगल ने बताया कि उसे पैसों की जरूरत है। मैंने उसे पैसे दे दिए, लेकिन वो पैसे लौटा नहीं रहा था।

एक रात हैदरपुर बादली वाले कमरे में ले जाकर उसे खिलाया-पिलाया, फिर हाथ-पैर बांधकर बोला, ये पहली गलती है। तुम्हें माफ करता हूं। जल्द पैसे नहीं लौटाए तो अगली बार माफ नहीं करुंगा।

कुछ दिन बाद, उसे फिर से उसी कमरे पर लाकर खिलाया-पिलाया। फिर हाथ-पैर बांध दिए, गर्दन में नान-चक फंसाकर खींच दिया। जब वह मर गया, तब उसके टुकड़े-टुकड़े करके आदर्श नगर थाने के बाहर फेंक दिया।

पुलिस ने इस केस में मुझे जेल में बंद कर दिया। साथ ही मुठभेड़ की फर्जी धारा लगा दी। कोर्ट ने मर्डर के केस में तो बरी कर दिया, लेकिन मुठभेड़ वाले केस में तीन साल की सजा हो गई। मैं बार-बार कोर्ट से कहता रहा कि मैंने मर्डर किया है, मुठभेड़ में मेरा कोई हाथ नहीं है, लेकिन मेरी नहीं सुनी गई। इसलिए बाद में मैंने उपेंद्र को मारकर उसका हाथ कोर्ट के बाहर लटका दिया था।’

‘तुम पहली बार में छोड़ते क्यों थे?’ एएसआई वीरेंद्र त्यागी ने जोर देकर पूछा।

चंद्रकांत हंसते हुए बोला- ‘तुम दिल्ली पुलिसवाले इतना भी नहीं समझते हो। अरे पहली बार छोड़ देता था, ताकि दूसरी बार उसे लगे कि मैं मजाक कर रहा हूं। हाथ-पैर बांधकर छोड़ दूंगा। उसे क्या पता कि अगले ही पल उसकी मौत आने वाली है और मेरे कलेजे को ठंडक।’

‘तिहाड़ के बाहर 2003 में जो लाश रखी थी, वो किसकी थी?’

‘उमेश की’

उसे क्यों मारा?

‘वह @&%$# मंगलवार को भी मटन खाता था। मैंने कई बार मना किया था। नहीं माना, इसलिए उसे भी मोक्ष दे दिया।’

‘… और किस-किस के मर्डर किए?’ रोहिताश ने शर्ट की बांहें ऊपर खींचते हुए पूछा।

चंद्रकांत ने बताना शुरू किया- ‘1998 में मंगल पंडित, 2003 में शेखर और उमेश, फिर 2005 में गुड्डू को मारकर मंगोलपुरी गंदा नाला के पास बने सुलभ शौचालय के करीब फेंका। उसके बाद अनिल मंडल को 20 अक्टूबर 2006 को मारा, जिसे तुम लोग अमित समझ रहे थे। वह भी क्रिमिनल था। उसने जान बूझकर अमित नाम का टैटू बनवाया था।

उसने मुझसे एक हजार रुपए लिए थे, लेकिन लौटाए नहीं। उलटे मेरी बेटी को उठाकर ले गया। एक साल के बाद मिला था। उसी के बाद मैंने उसका नाम फाइल से हटाने का सोच लिया।’

आईओ सुदंर यादव ने पूछा- ’17 मई 2007 को जिसकी लाश तिहाड़ के बाहर फेंकी वो कौन था?’

जवाब मिला- ‘वो तो दिलीप की थी… उसका मेरे दोस्त की फ्रेंड के साथ चक्कर था। इसलिए मारने के बाद उसका गला, हाथ-पार और गुप्तांग भी काट दिया था।’

सुंदर यादव ने फिर पूछा- ‘मंदिर के बाहर टांग क्यों फेंकी थी?’

चंद्रकांत बोला- ‘अनिल की लाश लेकर जब जा रहा था, तो रेहड़ी खराब हो गई। मैंने मंदिर के पास खड़ी कर दी थी। जब दिन में रेहड़ी बनवाने के लिए गया, तो मैकेनिक ने लात मारते हुए कहा- तुम पैसा देते नहीं हो।’ इसलिए जब दूसरा मर्डर किया, तो लात को मंदिर के बाहर टांग दिया।’

‘चिट्ठी क्यों लिखते थे?’, रोहिताश ने दोनों चिट्ठी दिखाते हुए पूछा।

‘जब पुलिस ने मुझे झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेजा। पत्नी को जेल भेज दिया, फिर मैं तुम लोगों को क्यों न परेशान करूं। इसलिए चैलेंज करता था। तिहाड़ के गेट पर दूसरी वाली बॉडी को खोलने के लिए जो आदमी चाकू लेकर आया था, वो मैं ही था। तुम्हारे SHO होशियार सिंह ने कहा था कि पुलिस के सामने पेश हो जाओ। तो मैं चाकू लेकर पेश हो गया। कैसे पुलिस वाले हो तुम लोग @&$# मैं सामने था और पकड़ भी न पाए।’

‘C.C का क्या मतलब’, रोहिताश ने चिट्ठी का आखिरी हिस्सा दिखाते हुए पूछा।

हंसते हुए चंद्रकांत बोला- ‘C.C मतलब, चंद्र ही चंद्र।’

रोहिताश ने चंद्रकांत से पूछा, CC का क्या मतलब है, जवाब मिला- चंद्र ही चंद्र। स्केच: संदीप पाल

इतने में ACP हरगोबिंद सिंह धालिवाल आ गए। उन्होंने पूछा- ‘तुम नान-चक फंसाकर गर्दन कैसे तोड़ते थे।’

बेखौफ चंद्रकांत बोला- ‘आप कुर्सी पर बैठो। मैं तोड़कर बता देता हूं।’

ACP धालिवाल चुप हो गए।

चंद्रकांत झा ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, पर आईओ सुंदर यादव सोच में पड़े थे कि कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। हथियार भी नहीं मिले हैं, कोई और सबूत भी नहीं है। अगर ये कोर्ट में मुकर गया तो…?

उन्होंने चंद्रकात से पूछा- ‘जो लाशें तिहाड़ के बाहर फेकीं, उनके सिर कहां हैं?’

‘यमुना जी में।’

‘यमुना जी में क्यों फेंका?’

‘उनका भी कल्याण हो जाएगा, इसलिए।’

चंद्रकांत झा को गिरफ्तार हुए तीन दिन हो चुके थे। वह पुलिस कस्टडी में था। 23 मई को आईओ सुंदर सिंह, चंद्रकांत झा को लेकर यमुना किनारे पहुंचे। सुबह से लेकर शाम तक कीचड़ से भरी यमुना में खोपड़ी ढूंढते रहे।

जब गोताखोर और नाव वाले कुछ नहीं निकाल पाए, तब हेड कॉन्स्टेबल रोहिताश, एसआई नरेंद्र पहलवान और आईओ सुंदर सिंह खुद कपड़े उतारकर यमुना में घुस गए। कई घंटों बाद एक खोपड़ी मिली।

यमुना से मिली खोपड़ी के साथ आईओ सुंदर सिंह और नरेंद्र पहलवान। पिक्चर क्रेडिट- स्पेशल अरेंजमेंट

चंद्रकांत झा ने कहा- यह खोपड़ी दिलीप की है। उसे 18 मई 2007 को मारा था। खोपड़ी में एक बाल तक नहीं था। डीएनए जांच में खोपड़ी उपेंद्र की निकली, जिसका मर्डर 25 अप्रैल 2007 को हुआ था। खोपड़ी और लाश का डीएनए मैच कर गया।

फोरेंसिक टीम चंद्रकांत झा के हैदरपुर बादली और अलीपुर वाले मकानों पर पहुंची। दोनों ही मकानों के फर्श पर लगे खून के धब्बों के सैंपल लिए। कत्ल में इस्तेमाल नान-चक, दरांती और गड़ासे को भी जांच के लिए भेज दिया।

अब मामला रोहिणी कोर्ट में चलने लगा। एडिशनल सेशन जज डॉक्टर कामिनी लॉ ने सुनवाई शुरू की। चंद्रकांत झा की तरफ से एडवोकेट दीपक शर्मा पेश हुए। वहीं, दिल्ली पुलिस की तरफ से कई एडवोकेट अलग-अलग तारीखों पर केस लड़े।

जिरह के दौरान दिल्ली पुलिस के वकील ने कहना शुरू किया।

‘माय लॉर्ड, इस सनकी आदमी ने एक-एक करके न जाने कितने मर्डर किए हैं। यह खुद कह रहा है कि इसने कम-से-कम 7 मर्डर किए हैं। 20 अक्टूबर 2006 और 18 मई 2007 को मिली चिट्ठियों के फिंगर प्रिंट से पता चल रहा है कि इसी ने लिखे थे। इसने साफ-साफ लिखा था कि यदि यह साल में 7-8 मर्डर नहीं कर लेता है, तो इसका दिमाग पागल होने लगता है।

जितनी बर्बरता से यह कत्ल करता है, वह भयावह है। इसने गरीब, मासूम लोगों का कत्ल किया है। ऐसे लोगों का जो अपने परिवार में इकलौते कमाने वाले थे। सब्जी मंडी में काम करते थे। रेहड़ी चलाते थे।’

दिल्ली पुलिस के वकील कोर्ट में चंद्रकांत झा के लिए कहते हैं जितनी बर्बरता से यह कत्ल करता है, वह भयावह है। स्केच: संदीप पाल

थोड़ा ठहरकर दिल्ली पुलिस के वकील फिर बोलते हैं-

‘मर्डर करने का तरीका देखिए… पहले बहला-फुसलाकर खिलाना-पिलाना, फिर हाथ-पैर बांधकर पहली बार छोड़ देना और दूसरी बार में हाथ-पैर बांधकर नान-चक लगाकर गर्दन तोड़ देना, फिर शरीर के एक-एक हिस्सों को काटकर कभी नाले में, कभी मंदिर के बाहर, कभी कोर्ट के बाहर और लाश को तिहाड़ जेल के बाहर फेंक देना।

इतनी बर्बरता कोई इंसान कैसे कर सकता है। ये शैतान है। ये जिंदा बचा, तो ना जाने कितने मर्डर और करेगा। इसे फांसी होनी चाहिए।’

चंद्रकांत के वकील दीपक शर्मा ने बचाव में कहा- ‘कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, जो बता सके कि मेरे मुव्वकिल ने ही सबका कत्ल किया है। पुलिस ने जोर-जबरदस्ती जुर्म कबूल करवाए हैं। पुलिस अपनी साख बचाने के लिए इस तरह के सबूत पेश कर रही है।’

कोर्ट ने आदेश दिया- ‘दोनों चिट्ठी और चंद्रकांत झा की हैंडराइटिंग मिलाई जाए।’

जांच में साबित हुआ कि फिंगर प्रिंट और हैंडराइटिंग दोनों चंद्रकांत झा के ही हैं। चिट्ठी पर जो खून के सैंपल मिले थे, उसका ब्लड ग्रुप इन लाशों से मैच हो गया। बचाव में अब चंद्रकांत झा के वकील दीपक शर्मा के पास कोई दलील नहीं थी।

कोर्ट में बहस पूरी हो चुकी थी। फिर भी जज कामिनी लॉ खुद में मुतमइन होना चाहती थी। इसलिए उन्होंने एडवोकेट और इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर के साथ हर एक घटनास्थल का जाकर मुआयना किया।

उसके बाद 24 जनवरी 2013 को रोहिणी कोर्ट ने चंद्रकांत झा को कत्ल के तीन मामलों में दोषी पाते हुए सजा सुनाई।

कोर्ट ने कहा- ‘चंद्रकांत झा ने एक-एक करके बर्बरता से ये सभी कत्ल किए। जिस मानसिकता के साथ उसने इन घटनाओं को अंजाम दिया, वह रेयरेस्ट ऑफ रेयर है। प्री-प्लान करके वह मर्डर करता और लाश को ठिकाने लगाता था। 6 साल तक वह पुलिस को चकमा देता रहा। पुलिस को चैलेंज करता रहा। ऐसे व्यक्ति को समाज में जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं है। उसे तब तक फांसी पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए।’

जज कामिनी लॉ ने कहा- चंद्रकांत झा को तब तक फांसी पर लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए। स्केच: संदीप पाल

फैसला लिखने के बाद जज कामिनी लॉ को अपने पेन की निब तोड़ने की परंपरा निभानी थी, लेकिन उससे पहले वो बोलीं-

‘चंद्रकांत झा इस पुलिसिया सिस्टम का बनाया हुआ अपराधी है। दिल्ली पुलिस का आदर्श वाक्य है “हमेशा आपके साथ”, लेकिन ये सिलसिलेवार हत्याएं हमारी पुलिस व्यवस्था के दूसरे पहलू को नंगा कर रही है। यह सोचने और विचार करने का समय है कि क्या इस तरह की पुलिस व्यवस्था ने एक चंद्रकांत झा को जन्म दिया है और अगर हमारी पुलिस व्यवस्था इसी तरह चलती रही तो और चंद्रकांत झा जैसे और लोग भी जन्म ले सकते हैं। यह वास्तव में सरकार के लिए एक चेतावनी है कि वह लंबे समय से प्रतीक्षित पुलिस सुधारों को लागू करे।’

फैसला सुनाने के बाद जज साहिबा उठकर चली गईं। कठघरे में खड़ा चंद्रकांत झा नीचे जमीन पर बैठ गया। बाहर कोर्ट के बरामदे में बैठी उसकी पांचों बेटियां और पत्नी ममता दहाड़ें मारकर रोने लगीं।

2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इन चार बातों को आधार मानते हुए चंद्रकांत झा की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। पहला- इस मामले में यह साबित नहीं हो पाया कि चंद्रकांत झा के अपराध के लिए उम्रकैद की सजा काफी नहीं। दूसरा-मरने वाले अनिल मंडल की पहचान काफी जटिलता से साबित हो सकी। शुरुआत में उसका डीएनए परिवार से मैच नहीं हुआ था। तीसरा- जब उपेंद्र मर्डर केस में चंद्रकांत को मृत्युदंड दिया गया था, तब तक उस पर किसी दूसरे मामले में दोष सिद्ध नहीं हुआ था, इसलिए इस मामले को एक अलग केस माना जाना चाहिए। चौथा-इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि चंद्रकांत झा में सुधार की गुंजाइश नहीं है या फिर इससे समाज को खतरा है। इन दलीलों के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला भी दिया।

साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।

अक्टूबर 2023 में चंद्रकांत झा को 90 दिन की पैरोल पर जेल से बाहर आने का मौका मिला, लेकिन उसने तय तारीख को सरेंडर नहीं किया। पुलिस उसे दो साल बाद जनवरी 2025 में पकड़ पाई। तबसे वह तिहाड़ जेल में है।

(नोट- यह सच्ची कहानी, केस के जांच अधिकारी रहे रिटायर्ड ACP सुंदर सिंह यादव, सब इंस्पेक्टर रोहिताश, बचाव पक्ष के वकील दीपक शर्मा से बातचीत और केस की चार्जशीट और कोर्ट जजमेंट पर आधारित है। सीनियर रिपोर्टर नीरज झा ने क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल करके इस घटना को कहानी के रूप में लिखा है।)

‘मृत्युदंड’ सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए एक और सच्ची कहानी…