ब्लैकबोर्ड-’बच्चा ठीक नहीं हुआ तो जहर दे देंगे’: मानसिक विकलांग बच्चे की मां अपने ऊपर केरोसिन छिड़ककर आग लगाने लगी, पिता ‘ऑटिस्टिक बेटा’ स्वीकार नहीं रहे h3>
‘डॉक्टर की बताई थेरेपी के तहत मैं बच्चे से रंगों से जुड़ी एक्टिविटी करवा रही थी, लेकिन वह कर नहीं रहा था। उसे अपने दोनों पैरों के बीच दबा लिया और एक्टिविटी कराने लगी। गुस्से में वह अपने नाखूनों से मुझे नोचने लगा। मेरे हाथों से खून बहने लगा, लेकिन मैं
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यह कहते हुए अमिता गौतम की आंखें भर आती हैं। लंबी सांस लेते हुए कहती हैं, ‘ऐसे बच्चों से जिद नहीं करनी चाहिए। जिद करने पर वे हमला कर देते हैं, उन्हें नुकसान का अंदाजा नहीं होता।’
इस दौरान मैं जब अमिता से बातचीत कर रहा था तो उनका बच्चा अविराज डाइनिंग हाल में इधर से उधर भाग रहा था- कभी मेरी मोबाइल छीन लेता, कभी आकर हमारे ऊपर आकर बैठ जाता, तो कभी कोई चीज गिरा देता। वह अभी 8 साल का है। वह ऑटिज्म से पीड़ित है, जिन्हें ऑटिस्टिक भी कहा जाता है। यह एक तरह की मानसिक विकलांगता है।
ब्लैकबोर्ड में इस बार ऑटिज्म पीड़ित मां-बाप की स्याह कहानी, जिनकी निजी और सामाजिक जिंदगी अपने बच्चों को संभालने में खत्म हो गई है।
अयोध्या नगर, भोपाल की रहने वाली अमिता गौतम बताती हैं, ‘दो बेटियों के बाद जब बेटा अविराज पैदा हुआ, तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं था। जन्म के समय वह बिल्कुल सामान्य था। वजन भी ठीक था।
जब वह लगभग एक साल का हुआ, तो रात-रातभर रोने लगा। मैं भी उसके साथ पूरी रात जागती। नींद न मिलने से धीरे-धीरे मेरी मानसिक हालत बिगड़ने लगी। ऐसा वक्त आया, जब सब कुछ सहन से बाहर लगने लगा।’
वह रुककर कहती हैं-
‘वह चुप नहीं होता था और मैं रोने लगती थी।’
एक रात वह फिर नहीं सोया। पूरी रात मैं जागती रही। तड़के सुबह, जब आखिरकार उसकी आंख लगी तो मैं बिस्तर से उठकर कमरे में इधर-उधर टहलने लगी। मन में बस एक ही ख्याल था-
अब जिंदगी खत्म हो गई है।
उस रात मैंने कुछ खाया नहीं था। आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे। अचानक गेट के अंदर हॉकर ने अखबार फेंका, तभी एहसास हुआ- रात कब सुबह में बदल गई। ऐसी ही न जाने कितनी रातें बिना सोए गुजर गईं।’
इस तरह जब मेरा बच्चा दो साल का हुआ, तब भी न बोलता था, न चलता। आवाज देने पर पलटकर देखता भी नहीं। कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। हमारी चिंता गहरी होती गई। एक रविवार मैंने मोबाइल पर खोजा-
‘ढाई साल का बच्चा क्यों नहीं बोलता?’
वहां डॉक्टर को दिखाने की सलाह मिली। अगले दिन बच्चे को एक डॉक्टर के पास ले गई। सबसे पहले उसके कान टेस्ट कराए। दोनों कान ठीक थे।
उसके बाद पति के साथ दूसरे डॉक्टर के पास गई। उन्हें बताया कि बच्चा अंधेरे में अकेले खेलता रहता है, आवाज देने पर पलट कर नहीं देखता। डॉक्टर ने जांच की और बताया-
‘बच्चे को ऑटिज्म है।’
उस दिन घर आकर मोबाइल पर फिर खोजा-
‘ऑटिज्म क्या होता है और इससे बच्चा कब ठीक होता है?’
पता चला कि यह कोई बीमारी नहीं, जिंदगीभर रहने वाली अवस्था है। मैं घबरा गई। उसके बाद उस डॉक्टर की सलाह पर थेरेपी शुरू कराई। करीब एक साल तक बच्चे की बोलने की और दूसरी थेरेपी चलीं, लेकिन कोई सुधार नहीं दिखा। एक दिन डॉक्टर ने साफ कह दिया-
‘यह बच्चा कभी बोल नहीं पाएगा।’
ऑटिज्म पीड़ित 8 साल का बच्चा अविराज।
उस दिन मैं पूरी तरह टूट गई। मन में सिर्फ एक सवाल था- अब मेरा बच्चा एक सामान्य जिंदगी कैसे जिएगा?
उस समय मैं एक सामान्य स्कूल में शिक्षिका थी। उसके बाद मुझे दिग्दर्शिका रिहैबिलिटेशन सेंटर, भोपाल के बारे में पता चला। वहां से मैंने विशेष बच्चों को पढ़ाने का कोर्स किया। वहां समझ में आया कि इन बच्चों को संभालने के तरीके अलग होते हैं।
इस तरह वहां से कोर्स कर मैं सामान्य बच्चों की शिक्षिका से विशेष बच्चों को शिक्षिका बन गई। मैंने भोपाल के ज्योति स्पेशल स्कूल में ऐसे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और वहां सीखे तरीकों को अपने बच्चे पर लागू किया। इसका असर अब दिख रहा है।
यह सब करते हुए आप धैर्य कैसे बनाकर रखती हैं?
‘हां, यह काम बिल्कुल भी आसान नहीं है। सिर्फ एक विशेष कोर्स कर लेने से ऐसे बच्चों को नहीं संभाला जा सकता। कई बार ये बच्चे दांत से काट लेते हैं। गुस्से में नोच लेते हैं या धक्का दे देते हैं। शिक्षक को उनका मां-बाप बनना पड़ता है।
अमिता कुछ पल रुकती हैं। फिर गहरी सांस लेकर कहती हैं- आपको कुछ किस्से बताती हूं… इन्हीं से समझ आता है कि ऐसे बच्चों की दुनिया कितनी अलग होती है।
‘पहला किस्सा रसोई से शुरू होता है। एक दिन मैं खाना बना रही थी। गैस पर तवा चढ़ा था। तभी मेरा बच्चा चुपचाप पीछे से आया। मैं कुछ समझ पाती, उससे पहले उसने गरम तवे पर हाथ रख दिया।
मैं घबरा गई। लेकिन वह नहीं चौंका। न चीखा, न हाथ खींचा। कुछ पल बाद- उसके चेहरे पर हल्की-सी बेचैनी आई। तब उसे एहसास हुआ कि तवा गरम है। मैं सन्न रह गई।’
वह पल भर चुप होती हैं।
फिर कहती हैं, ‘उसी दिन मैंने फिर उसका हाथ तवे पर रखा। जानना चाहती थी- उसे गर्मी कब और कितनी महसूस होती है। तभी समझ आया कि इन बच्चों को ठंडा-गरम जल्दी महसूस नहीं होता। अमिता की आंखें भर आती हैं। और जब दर्द का एहसास नहीं होता, तो खतरे का भी नहीं होता।’
वह दूसरा किस्सा शुरू करती हैं।
‘एक दिन मैंने घर में रखी फुटबॉल उठाई। बेटे को सामने खड़ा किया। गेंद सीधे उसके चेहरे की तरफ फेंकी।
वह वहीं खड़ा रहा। न आंख झपकी। न सिर हिलाया। न खुद को बचाने की कोशिश की। मेरा कलेजा कांप गया। फिर मैंने दोबारा गेंद फेंकी। इस बार उसे बचना सिखाया। कहा-
हटो।
मैंने यह बार-बार किया। धीरे-धीरे वह पीछे हटने लगा। चेहरा घुमाने लगा। आज वह खुद को बचा लेता है।’
वह कहती हैं, ‘तीसरा किस्सा तो काफी खतरनाक घटा। एक दिन मैं घर की टैरेस साफ कर रही थी। पास ही हारपिक की बोतल रखी थी। पल भर के लिए पीठ घुमाई… और उसी पल उसने बोतल उठा ली। ढक्कन खोला। घूंट भर लिया।
मेरे हाथ से झाड़ू छूट गई। मैं चिल्लाई। उसे गोद में उठाया और बिना कुछ सोचे सीधे अस्पताल भागी। उस दिन हमने उसे मौत के मुंह से खींचकर निकाला।’
‘चौथा किस्सा… सबसे डरावना।’
‘वह कई बार घर के सामने सड़क पर चुपचाप खड़ा हो जाता है। गाड़ियां गुजरती हैं, हॉर्न बजते हैं- लेकिन उसे कुछ महसूस ही नहीं होता। एक दिन वह अचानक सड़क पर दौड़ पड़ा।
मैं चिल्लाई।
उसी पल एक गाड़ी सामने आ गई। ड्राइवर ने पूरी ताकत से ब्रेक मारी। मेरी सांसें थम गईं।’
‘पांचवां किस्सा हमारी सोशल लाइफ से टकराता है। एक दिन रिश्तेदार के यहां जन्मदिन की पार्टी थी। मेरा बच्चा केक देखकर रोने लगा। बार-बार केक की तरफ दौड़ता। रोकने पर हाइपर एक्टिव हो गया। आखिरकार मुझे पार्टी बीच में छोड़कर लौटना पड़ा।
वह धीमे से कहती हैं- उस दिन रिश्तेदारों के चेहरे पर साफ दिख रहा था- उन्हें मेरे बच्चे की हरकतें पसंद नहीं आईं। मुझे बहुत ठेस लगी। अब मैंने रिश्तेदारों से दूरी बना ली है। ताकि मेरे बच्चे से उन्हें परेशानी न हो।
फिर जोड़ती हैं-
‘मैं उन्हें गलत भी नहीं मानती। दरअसल, उन्हें ऑटिज्म की गंभीरता का अंदाजा ही नहीं है।’
‘आखिरी किस्सा तो लोगों के सामने घटा। एक दिन स्कूल से बच्चे को लाने गई। उसे लाने वाला ऑटो नहीं आया। मजबूरी में बाकी बच्चों के साथ शेयरिंग ऑटो में बैठी। मेरे बच्चे को भीड़ पसंद नहीं। इतना परेशान हुआ कि आधे रास्ते उतरना पड़ा।
घर तक सात मिनट पैदल रास्ता था। लेकिन वह आगे नहीं बढ़ रहा था। वह सोच रहा था- ऑटो आएगा और वह अकेले घर जाएगा।
मैंने उसे खींचना शुरू किया। उसने बैग फेंक दिया। जोर-जोर से रोने लगा। जमीन पर लेट गया। उठाने लगी तो उसने मेरे हाथ में दांत गड़ा दिए। बाल खींचने लगा।’ वह कहती हैं- ‘उस दिन लोग अपने घरों से निकल आए। डांटने लगे- कैसा बच्चा है, जो मां को मार रहा है। इसे संस्कार नहीं मिले क्या?’
अमिता रुक जाती हैं। धीरे से कहती हैं-
‘मुझे पता था- बच्चा अपनी परेशानी से मजबूर था।’
अमिता कहती हैं, ‘हालांकि अब मेरा बच्चा बेहतर हुआ है। थोड़ा बोलने लगा है। मेरे कुछ शब्दों दोहराता है। बस चाहती हूं कि इतना बोल सके कि अपने साथ होने वाला अच्छा-बुरा बता सके।’
वह बोलते-बोलते अचानक रुक जाती हैं। जैसे शब्द गले में अटक गए हों। कुछ पल खामोशी। फिर बहुत धीरे कहती हैं-
‘इस बच्चे की वजह से मेरे और पति के बीच दरार आ गई है। वे पैसे खर्च कर देते हैं, लेकिन समय नहीं देते।’ इतना कहते ही उनकी आंखें भर आती हैं।’
वह आगे कहती हैं- ‘मेरे पति बच्चे को स्वीकार नहीं कर पा रहे। उन्हें लगता है वह बिल्कुल नॉर्मल होना चाहिए। इतना पैसा लगाया, फिर भी नॉर्मल क्यों नहीं हुआ? लेकिन मैं जानती हूं, यह बीमारी नहीं है। यह एक कंडीशन है। यह पूरी तरह ठीक नहीं होगी।’
वह रुकती हैं।
फिर जोड़ती हैं- ‘मेरे पति ग्रेजुएट हैं। बीएचएल में मैकेनिकल इंजीनियर हैं। लेकिन बच्चे को लेकर उनकी फीलिंग मेरी जैसी नहीं है।’
जब आप नहीं होंगी तब बच्चे के लेकर क्या सोचती हैं?
वह एक पल चुप रहती हैं। फिर कहती हैं- ‘मेरी बेटियां अच्छी हैं। वे अपने भाई का ध्यान रखती हैं। लेकिन मैं जानती हूं- एक दिन उनकी शादी होगी और वे अपने घर चली जाएंगी।’
अमिता की आवाज थोड़ी भारी हो जाती है।
फिर कहती हैं, ‘इसलिए मैंने पहले से ऐसी संस्थाओं के बारे में पता कर रखा है, जहां इन बच्चों की पूरी देखभाल होती है। खाना, रहना, इलाज- सब कुछ। मैं ऐसी कई संस्थाओं के संपर्क में हूं, ताकि जरूरत पड़े तो अपने बच्चे को वहां सुरक्षित रख सकूं। वहां बड़े होने पर रोजगार की ट्रेनिंग भी मिलती है।’
वह कहती हैं कि सरकार की निरामय योजना भी है, लेकिन वह कारगर नहीं है। उसमें थेरेपी के लिए 20 हजार रुपए मिलते हैं, लेकिन 20 हजार तो एक बार में खर्च हो जाते हैं। जबकि थेरेपी हमें सालों लेनी पड़ती है।
अविराज की अमिता गौतम, जो बेटे के लिए स्पेशल टीचर बन गईं।
जब पिता ने ऑटिस्टिक बच्चे को जहर देने की बात कही
अमिता के बाद मेरी मुलाकात भोपाल की ही संगीता गिरि गोस्वामी से होती है। वह अपने बच्ची की हालत पर बात करने अमिता के घर ही आ गई थीं। संगीता ज्योति स्कूल में पढ़ाती हैं। उनका बेटा अथर्व ऑटिज्म से पीड़ित है, जो कि 13 साल का है।
वह धीरे-धीरे यादों में उतरती हैं-
‘अथर्व बिल्कुल सामान्य पैदा हुआ था। लेकिन न हंसा, न मुस्कुराया। एक जगह चुपचाप लेटा रहता। कोई प्रतिक्रिया नहीं। ढाई साल बाद वह सिर्फ बैठ पाया। डॉक्टरों ने कहा-
‘कुछ बच्चों का विकास धीमा होता है।’
हम उसके चलने का इंतजार करते रहे। तीन साल बीते। बेचैनी बढ़ने लगी। उसे हॉस्पिटल ले गई। कानों की जांच हुई- दोनों ठीक थे। फिर रीढ़ के डॉक्टर के पास गई। वहां एक नया शब्द मिला-
‘जेनेटिक समस्या।’
आखिरकार डॉक्टरों की सलाह पर उसे सीआरसी- कम्पोजिट रीजनल सेंटर भोपाल ले गई। वहीं पहली बार एक रिपोर्ट से हम हिल गए-
‘ऑटिज्म।’
कागज हाथ में था। और बच्चे को रोज थेरेपी के लिए बुला लिया गया।
संगीता की आवाज हल्की पड़ जाती है। वह कहती हैं- ‘शुरुआत में कोई खास सुधार नहीं दिखा। दिन बीतते गए और मेरे पति अंदर से टूटते चले गए। एक रात…बहुत देर तक वे कुछ नहीं बोले। कमरे में सिर्फ घड़ी की टिक-टिक आवाज सुनाई दे रही थी। फिर अचानक, बेहद थकी हुई आवाज में बोले-
‘इलाज की पूरी कोशिश करेंगे…अगर ठीक हो गया तो ठीक….नहीं हुआ…तो जब हम बूढ़े हो जाएंगे… कोई देखने वाला नहीं होगा…तो इसे जहर देकर मार देंगे…और खुद भी जहर खा लेंगे।’
मेरी सांसें अटक गईं।
उस पल लगा जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई हो। मैं उस वक्त पति को नहीं, एक टूटे हुए इंसान को देख रही थी, जो उम्मीद छोड़ चुका था।
इसके बाद भी जिंदगी रुकी नहीं। सीआरसी में 2017 से 2019 तक थेरेपी चलती रही। दिन, महीने, साल बीतते गए। अथर्व पांच साल का हो चुका था। और फिर…एक दिन अचानक
उसके मुंह से पहला शब्द निकला-
‘मी।’
ऑटिज्म पीड़ित 13 साल का अथर्व।
संगीता की आंखें भर आती हैं।
वह कहती हैं, ‘उस दिन पहली बार लगा शायद मेरा बच्चा आगे बढ़ सकता है।’
उसके बाद मैंने स्पेशल बच्चों को पढ़ाने के लिए स्पेशल डीएड किया। सीखा कि ऐसे बच्चों को कैसे समझा जाता है, कैसे सिखाया जाता है। संगीता कुछ पल चुप रहती हैं।
फिर कहती हैं-
‘लेकिन उस वक्त हम पूरी तरह आर्थिक तंगी में थे। मेरे पति बार-बार नौकरी छोड़ रहे थे। घर का खर्च…बच्चे की थेरेपी…सब कुछ सिर पर था, लेकिन हाथ खाली थे। पैसे की किल्लत से हमारे रिश्ते में तनाव पैदा हो गया। बच्चे की चिंता, इलाज का दबाव और भविष्य के डर से हर दिन तनाव बढ़ता गया। झगड़े रोज की बात हो गए थे। इतना डर, इतनी बेचैनी थी कि सांस लेना मुश्किल लगने लगा।’
फिर वह रुकती हैं। आंखें झुक जाती हैं।
‘एक दिन… मैं पूरी तरह टूट चुकी थी। घर में रखा केरोसिन का डिब्बा मैंने उठा लिया। ढक्कन खोला और अपने ऊपर उड़ेल लिया। उस वक्त दिमाग में कुछ नहीं था। न बच्चा, न पति, न दुनिया। बस यह लगा- अब और नहीं सहा जाएगा।
माचिस हाथ में थी। मैं खुद को आग लगाने ही वाली थी… तभी अचानक शोर मच गया। आस-पास के लोग दौड़ पड़े। किसी ने मेरे हाथ से माचिस छीन ली। किसी ने मुझे पकड़ लिया और मैं बच गई।’
यह कहते-कहते संगीता की आंखें भर आती हैं। आवाज टूट जाती है। कुछ पल तक वह कुछ बोल नहीं पातीं।
वह कहती हैं, ‘एक किस्सा है… जिसे मैं अक्सर भूलने की कोशिश करती हूं। आठ साल का था मेरा बच्चा। मैं मायके गई थी- दादाजी के समाधि कार्यक्रम में। उस वक्त भी उसे डायपर पहनाती थी। अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। पंगत में लोग पत्तलें लगाए बैठे थे। चारों तरफ शोर, भीड़ और अफरा-तफरी थी।
उसी बीच- मेरे बच्चे ने कपड़े गंदे कर दिए। मैं उसे चुपचाप उठाकर धुलाने ले जा रही थी कि पीछे से आवाज आई-
‘ऐसे बच्चे को घर पर रखना चाहिए। इसे क्यों लेकर आई हो?’
वह रुक जाती हैं। गला भर आता है।
संगीता कहती हैं, ‘उस पल गुस्सा बच्चे पर नहीं उन लोगों पर था…और खुद पर भी। हताशा में मैंने अपने ही बच्चे को पीट दिया। बच्चा रो रहा था और साथ-साथ खुद मैं भी।
उस दिन के बाद मैंने फैसला कर लिया-
अब मैं अपने बच्चे को लेकर किसी भी रिश्तेदार के घर नहीं जाती। आज मेरा बेटा 13 साल का हो गया है।’
वह कहती हैं, ‘अभी दो महीनों हुए हैं, जब उसने डायपर पहनाना बंद किया है, लेकिन अब भी तेज आवाज होने पर घबरा कर कपड़े खराब कर लेता है।
हां, अब सही-गलत कुछ-कुछ समझने लगा है। नहाते समय गेट बंद कर लेता है। बाहर तौलिया पहनकर निकलता है, लेकिन दरवाजा बंद करके आज भी फ्रेश नहीं हो पाता। डरता है। सामाजिक रूप से अब भी किसी से घुलता-मिलता नहीं।’
मेरी सरकार से गुजारिश है कि स्पेशल बच्चों के लिए अधिक शिक्षक उपलब्ध कराए। वर्तमान में जो शिक्षक इन बच्चों को पढ़ाते हैं, उन्हें ही सामान्य बच्चों के लिए भी लगा दिया जाता है, जिससे वे इन पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते। ट्रेनिंग के दौरान इन्हें ज्यादा समय देना जरूरी है।
सोचिए- मेरा बेटा 13 साल का है। 5वीं में पढ़ता है, लेकिन हिंदी और अंग्रेजी ठीक से न पढ़ पाता है, न लिख पाता है।
अथर्व की मां संगीता गिरि गोस्वामी।
इसके बाद मेरी बात भोपाल के अवधपुरी स्थित गैलेक्सी सिटी में रहने वाली सीमा से हुई। उनकी 9 साल की बेटी वेदांशी सीवियर कैटेगरी के ऑटिज्म से ग्रसित है।
सीमा बताती हैं, ‘जब मेरी बच्ची तीन साल की उम्र तक चलना नहीं शुरू किया, तो डॉक्टर को दिखाया। वहां पता चला कि उसे ऑटिज्म है और यह स्थिति जीवनभर रहेगी। यह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।’
वह एक घटना याद करती हैं। कहती हैं, ‘ससुराल में थी। मेरी बेटी खेल रही थी। तभी ताई जी ने तंज कसते हुए कहा- यह पागल है, बाकी बच्चों के साथ खेलने के बजाय अकेले खेलती है।’
इस तरह की बातों से मैं अक्सर टूट जाती थी। बेटी के इलाज के लिए कई जगह भटकी, लेकिन कोई खास सुधार नहीं हुआ। वह रात 2 बजे से पहले सोती नहीं थी, लगातार इधर-उधर भागती है।
सीमा कहती हैं, ‘एक दिन बेटी के भविष्य के बारे में सोचते-सोचते मैं बुरी तरह घबरा गई। मन में आया कि हम नहीं रहेंगे तो उसका क्या होगा? उसी बेचैनी में एक ख्याल आया- कहीं उसे किसी अनाथ आश्रम में छोड़ आएं।’
यह बात सीमा कह रही थीं ही उनके पति लक्ष्मण ने टोका। उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं पता तुम ऐसा क्यों सोच रही हो। हमने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं।’
वह कहते हैं, ‘मेरी बेटी ऑटिस्टिक है। आमतौर पर लोग मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को पागल कह देते हैं, लेकिन ऑटिस्टिक बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया होती है। ये दिमाग से तेज होते हैं, लेकिन हाइपर एक्टिविटी के कारण दूसरे बच्चों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। सामाजिक रूप से घुल नहीं पाते, इसलिए समाज उन्हें पागल समझ लेता है।’
लक्ष्मण कहते हैं, ‘दुख बस इतना है कि समाज ऐसे बच्चों को स्वीकार नहीं करता। अगर इन्हें सामान्य बच्चों के साथ सहज रूप से रहने दिया जाए, तो ये बच्चे बेहतर हो सकते हैं। लेकिन लोग अपने बच्चों को ऐसे बच्चों के साथ खेलने नहीं देते।’
लक्ष्मण कहते हैं, ‘हम दूसरा बच्चा चाहते थे, लेकिन आज भी मुझे अपनी बेटी को एक छोटे बच्चे की तरह ही संभालना पड़ता है। उसे नहलाना, खिलाना, बाथरूम ले जाना- हर काम खुद करना पड़ता है। ऐसे में अगर दूसरा बच्चा होता, तो हम उसे और अपनी बेटी- दोनों को ठीक से नहीं संभाल पाते।’
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