ब्लैकबोर्ड-नाली का पानी पिलाकर घुटने के बल घसीटा: गोरक्षा के नाम पर पैसे मांगे, मना किया तो मेरा सिर मुंडवाया; घास खिलाई, गाय-बछड़े छीन लिए

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ब्लैकबोर्ड-नाली का पानी पिलाकर घुटने के बल घसीटा:  गोरक्षा के नाम पर पैसे मांगे, मना किया तो मेरा सिर मुंडवाया; घास खिलाई, गाय-बछड़े छीन लिए

ब्लैकबोर्ड-नाली का पानी पिलाकर घुटने के बल घसीटा: गोरक्षा के नाम पर पैसे मांगे, मना किया तो मेरा सिर मुंडवाया; घास खिलाई, गाय-बछड़े छीन लिए

ओडिशा के गंजाम जिले के सिंगीपुर गांव में 59 साल के बाबुला नायक के घर पर उन्हें देखने के लिए भीड़ जमा है। इनमें गांव के कुछ लोग और उनके रिश्तेदार शामिल हैं। बीमारी से ग्रस्त बाबुला बिस्तर पर पड़े हैं और कमरे में सन्नाटा पसरा है।

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वह दो लोगों के कंधे के सहारे घर से बाहर आते हैं। चेहरे पर चोट और आंखों के नीचे काला घेरा साफ दिख रहा है। सफेद दाढ़ी, गले में गमछा और मुंडा हुआ सिर। दोनों घुटने जख्म से सूजे हुए। पहली झलक में ही लग जाता है कि उनकी हालत काफी खराब है।

वह प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठते हैं और चारों तरफ घबराकर देखने लगते हैं। हिंदी नहीं बोल पाते, लेकिन समझ लेते हैं। वह बताते हैं कि शादी में अपनी बेटी को देने के लिए एक गाय और दो बछड़े खरीदकर ला रहे थे, तभी रास्ते में गोरक्षा के नाम पर कुछ लोगों ने उन्हें रोक लिया और 30 हजार रुपए मांगने लगे।

पैसा न देने पर बुरी तरह पीटा। उनके 42 साल के भाई बुलू नायक जब उन्हें बचाने पहुंचे तो उनको भी जमकर पीटा। इसके बाद वे लोग दोनों भाइयों को बाजार ले गए। दोनों का सिर मुंडवाया और बाजार में घसीटा।

फिर दो किलोमीटर घुटने के बल चलाया गया, जिससे दोनों भाइयों के घुटने बुरी तरह जख्मी हो गए। इसके बाद इन्हें घास खिलाई गई, नाली का पानी पिलाया गया।

यह घटना 22 जून 2025 को ओडिशा के गंजाम जिले के खारीगुमा गांव में हुई थी।

ब्लैकबोर्ड में इस बार कहानी गंजाम के उन दलितों की, जिन्हें गाय की रक्षा के नाम पर पीटा जा रहा है और उनकी गायें छीनी जा रही हैं।

घटना के बारे में बात करते हुए बाबुला नायक। इनकी हालत तब से काफी खराब है। गाय की रक्षा के नाम पर कुछ लोगों ने इन्हें बुरी तरह पीटा, सिर मुंडवाकर बाजार में घुमाया, नाली का पानी पिलाया और घुटनों के बल चलाया था।

इस घटना के बाद से बाबुला नायक मानसिक तौर पर टूट चुके हैं। डिप्रेशन में चले गए हैं। तब से हमेशा घबराए रहते हैं। घर में अकेले मजदूरी करने वाले थे। लिहाजा इनकी इस हालत से रोजी-रोटी का संकट आ गया है। अब ये गाय के नाम से डरने लगे हैं।

इनके भाई की हालत भी कुछ ऐसी ही है। वह भी दर्द के चलते दूसरों के कंधों के सहारे चल पा रहे हैं। दोनों ने बजरंग दल वालों पर इस बदसलूकी का आरोप लगाया है।

बाबुला उस दिन को याद करते हैं, ‘मैं बेटी की शादी के लिए एक गाय और दो बछड़े लेकर आ रहा था। रास्ते में कुछ लोग आए और बोले, ‘गो-तस्करी कर रहे हो।’

मैंने हाथ जोड़कर कहा, ‘नहीं, बेटी को शादी में देने के लिए ले जा रहा हूं, यह हमारे यहां रीति-रिवाज है, लेकिन वे नहीं माने और 30 हजार रुपए मांगने लगे। मैंने कहा, ‘मेरे पास पैसे नहीं हैं।’

‘इतना सुनते ही उन लोगों ने मुझे पीटना शुरू कर दिया। मैं चीखने लगा। उन लोगों ने मेरी गायें, बछड़े और पैसे छीन लिए। उसके बाद सिर मुंडवाकर बाजार में घुमाया।’

बाबुला कांपती आवाज में कहते हैं, ‘मुझे लगा था जैसे आज हमारा आखिरी दिन होगा। किसी तरह जान बचाकर भागा और घर पहुंचा तो बुरी तरह हांफ रहा था। मेरी हालत खराब थी।’

वह घुटनों पर हाथ रखकर कहते हैं, ‘मेरे पैर खराब हो गए, पता नहीं मैं अब ठीक से चल पाऊंगा या नहीं।’

फिर सिर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं सबके सामने मेरा और मेरे भाई का आधा सिर मुंडवा दिया गया। यह कहते हुए वह घबरा जाते हैं। ठीक से बात नहीं कर पाते।

दाएं से काले कपड़े में बाबुला नायक और नीली शर्ट में उनके भाई बुलू नायक। इनका सिर मुंडवाया गया, घास खिलाई गई, नाली का पानी पिलाया गया।

इसी घर में 42 साल के बुलू नायक भी रहते हैं, जो बाबुला के छोटे भाई हैं। उनके साथ भी ऐसा ही सलूक किया गया।

बुलू अपनी पत्नी के कंधे के सहारे धीरे-धीरे चलते हुए घर से बाहर आते हैं और शरीर को कुर्सी पर टिका देते हैं। उनके आधे सिर पर बाल नहीं है। घुटनों से नीचे पूरा पैर जख्मी है।

बुलू कहते हैं, ‘हम यहां 300 साल से रह रहे हैं, लेकिन उस दिन पहली बार लगा था कि हम यहां के नहीं हैं।’

‘जब मुझे पता चला कि मेरे भाई को पकड़ लिया गया है और पीटा जा रहा है, तो मैं उन्हें बचाने के लिए भागा। वहां बजरंग दल के लोगों ने मुझे भी पकड़ लिया और गालियां देते हुए पीटने लगे। वे 30 हजार रुपए मांग रहे थे, लेकिन हमारे पास कुछ नहीं था।’

ऐसा कहते हुए उनके चेहरे पर लाचारी साफ नजर आ रही थी। वह कहते हैं, ‘आप मेरे घुटनों को देख सकती हैं, इनमें लगातार दर्द हो रहा है।’

‘अब तो घर से बाहर निकलने में भी डर लगता है। अगर ये गुंडागर्दी यूं ही चलती रही, तो हम दलितों का जीना मुश्किल हो जाएगा। प्रशासन भी हमारी नहीं सुनता।’

‘जब ऊंची जाति के लोग गाय लेकर जाते हैं तो कोई नहीं पूछता, लेकिन हम गाय के साथ हों तो पकड़ लिए जाते हैं। पुलिस वाले भी इन्हीं के साथी लगते हैं।’

वह बताते हैं, ‘हमारा एक संगठन है- दलित महासंघ। उसी के दबाव में आकर पुलिस ने करीब 10 घंटे बाद एफआईआर दर्ज की थी, वरना हमारी शिकायतें तो उनकी टेबल पर धरी रह जाती हैं।’

अपनी पत्नी के कंधे के सहारे आकर कुर्सी पर बैठे बुलू नायक को भी उन्हीं आरोपियों ने पीटा है। इन्हें भी सिर मुंडाकर बाजार में घुमाया गया, नाली का पानी पिलाया गया, घास खिलाई गई और घुटनों के बल चलाया गया।

बाबुला के दामाद अनिल भी उनके पास ही खड़े हैं। वे बताते हैं, ‘ससुर जी डिप्रेशन में चले गए हैं। खाना नहीं खाते। बाहर निकलने से डरने लगे हैं।’

‘दिन-रात रोते हैं। घर के इकलौते कमाने वाले थे। मजदूरी से घर चलता था, लेकिन अब पता नहीं घर का खर्च कैसे चलेगा।’

वह आक्रोश में कहते हैं, ‘इन गुंडों और तालिबानियों में कोई फर्क नहीं। एक-दो थप्पड़ मारकर भी छोड़ सकते थे, लेकिन 2 किमी घुटनों के बल चलवाना कहां से जायज है। सरकार किसी अच्छी जगह इनका इलाज करवाए।’

गोरक्षा के नाम पर कुछ लोग डंडे के बल पर बाबुला नायक और उनके छोटे भाई बुलू नायक को 2 किलोमीटर तक घुटनों के बल पर चलवाते हुए। बाएं से काली शर्ट में बाबुला नायक और नीली शर्ट में बुलू नायक।

‘जब हम इस मामले की एफआईआर कराने गए तो पुलिस आनाकानी कर रही थी। जब इसका वीडियो वायरल हुआ, तब जाकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। इस घटना की हमारे पास तो कॉल रिकॉर्डिंग भी है, जिसमें हमसे 30 हजार रुपए मांगे जा रहे थे। हमें उम्मीद है कि पुलिस मामले में ठीक से कार्रवाई करेगी।’

वह अफसोस जाहिर करते हुए कहते हैं, ‘गोरक्षा के नाम पर कुछ लोग वसूली कर रहे हैं। अगर यह मामला गोरक्षा का होता तो वे लोग गाय लेकर ही खुश हो जाते, लेकिन पैसे मांग रहे थे और पैसा न मिलने पर ये हाल कर दिया।’

अनिल बताते हैं, ‘दलित होने की वजह से हमें कहा जाता है कि तुम नीची जाति के हो, थोड़ी दूर से बात किया करो। दुकान में दूर से सामान लिया करो।’

‘कितनी अजीब बात है… मौत के बाद सब बराबर हो जाते हैं। एक ही चिता की आग सबको जलाती है, लेकिन जब तक जिंदा हैं, हम एक नल से पानी तक नहीं पी सकते।’

इस दौरान वहां इकट्ठा हुए बाकी लोग भी कहते हैं, ‘ये गोरक्षा का काम नहीं, वसूली है। धर्म के नाम पर डर फैलाया जा रहा है।’

यहीं से पास के दायिसी गांव के दलित भुवन के साथ भी ऐसी ही घटना घटी है। वह बताते हैं, ‘एक दिन वह अपने खेत से 17 बैलों को चारा खिलाकर घर आ रहे थे। बीच रास्ते में गोरक्षा के नाम पर कुछ लोगों ने मुझे रोका और 50 हजार रुपए की मांग की।’

‘मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। पैसा देने से मना करने पर उन लोगों ने मुझ पर हमला कर दिया। मेरे सारे बैल छीन लिए और किसी को दे दिया। जब पुलिस से शिकायत की, तो कोई कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि पुलिस ने भी हमसे पैसे मांगे। पैसे न देने पर पुलिस ने मेरे सभी बैलों को गोशाला में डाल दिया।’

‘मैं एक पशु व्यापारी हूं। अब यही हाल रहा, तो काम छोड़ना पड़ेगा। फिलहाल, मैंने यह काम अभी बंद कर दिया है। जब तक गोरक्षा के नाम पर पैसे वसूले जाते रहेंगे, हमारे लिए ये रास्ता मुसीबत बना रहेगा। प्रशासन भी आंखें मूंदकर बैठा है। जैसे हमारी तकलीफें उसके दायरे में आती ही नहीं।’

वह आगे बताते हैं, ‘मेरे तीन बेटियां और दो बेटे हैं। दो बेटियों की शादी कर दी है, लेकिन अब परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। मैं पहले से ही बेटियों की शादी के कारण 4 लाख के कर्ज में हूं।’

‘अब मेरे 17 पशु भी छिन गए। मेरा बहुत नुकसान हो गया। समझ में नहीं आता कहां जाऊं, किससे शिकायत करूं।’

दायिसी गांव के भुवन नायक जिनसे गाय की रक्षा के नाम पर 50 हजार रुपए की मांग की गई। न देने पर मार-पीटा और इनके 17 बैल छीन लिए।

वहीं अब इस गांव में गो-तस्करी के नाम पर चल रही गुंडई के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। गांव के चौक पर लोग जमा होकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

उनमें शामिल थे 37 साल के ढंडासिर, जो पेशे से गो-व्यापारी हैं, बताते हैं, ‘हम इस धंधे को कई पीढ़ियों कर रहे हैं। गाय पालन हमारे घर की रीढ़ रहा है, लेकिन कुछ महीनों से सब चौपट हो गया है।’

‘बजरंग दल के लोगों के डर से हमने काम बंद कर दिया है। जिस तरह से घटनाएं हो रही हैं, उनमें जान-माल दोनों का नुकसान हो रहा है।’

‘मेरे घर में छह लोग हैं और रोटी लाने वाला सिर्फ मैं अकेला।’

वह एक घटना को याद करते हुए कहते हैं, ‘एक रात मैं चार गायें लेकर घर आ रहा था। बजरंग दल वालों ने रास्ते में पकड़ लिया। 45 हजार रुपए और चारों गायें छीन लीं। गालियां दीं, मारा-पीटा। किसी तरह 50 हजार रुपए का इंतजाम करके अपनी गायें छुड़ाई थीं।’

37 साल के ढंडासिर पेशे से गो-व्यापारी हैं। इनसे भी मारपीट की गई और 45 हजार रुपए और गायें छीन ली गईं। इन्होंने 50 हजार रुपए देकर किसी तरह अपनी गायें छुड़ाई थीं।

इसी गांव के 32 साल के पंचु नायक ड्राइविंग का काम करते हैं। वह भी इसी तरह का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ‘कुछ दिन पहले मैं चार गायें लेकर घर लौट रहा था। बीच रास्ते में बजरंग दल के लोगों ने मेरी गाड़ी रोक ली। वे मुझसे 80 हजार रुपए मांगने लगे। जब मैंने पैसे देने से मना कर दिया तो डंडों से पीटने लगे। सभी लोग सिर पर केसरिया पट्टी बांधे हुए थे।’

‘उन लोगों ने मेरा मोबाइल और गायें छीन लीं। मैंने मामले की शिकायत पुलिस से की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। पुलिस भी उन लोगों की दादागिरी को शह देती है, तभी हम जैसे गरीबों की कोई सुनवाई नहीं होती।’

‘मेरे पास अब कमाई का कोई जरिया नहीं है। अगर मैं उन्हें 80 हजार रुपए दे दूं, तो शायद वे मेरी गायें, गाड़ी और मोबाइल वापस कर दें, लेकिन मेरे पास इतना पैसा कहां है?’

पंचु नायक से 80 हजार रुपए मांगे गए थे। न देने पर कथित गोरक्षकों ने इनको भी पीटा और इनकी गायें व मोबाइल छीन लिया।

इन घटनाओं की तस्दीक करते हुए अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव भालाचंद्र सारंगी कहते हैं कि गोरक्षा के नाम पर वसूली का यह खेल कोई नया नहीं है। काफी समय से चल रहा था, लेकिन जब दो दलितों को मारा-पीटा गया, तब से यह समस्या खुलकर सामने आ गई है।

वह कहते हैं कि गंजाम जिले में कुछ लोग बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के साथ मिलकर इस पूरे काम को अंजाम दे रहे हैं।

जिस बेरहमी से दो लोगों को घुटनों के बल चलाया गया, नाली का गंदा पानी पिलाया गया, घास खिलाई गई और सार्वजनिक रूप से सिर मुंडवाया गया, यह दिखाता है कि जलील करने की सारी हदें पार कर दी गईं।

इस घटना को सांप्रदायिक सोच और संगठन के हिसाब से अंजाम दिया जा रहा है।

सारंगी बताते हैं कि ऐसी ही एक और घटना 6 महीने पहले पास के गांव ब्रह्मपुर में घटी थी। इसमें पुलिस ने एक गैंग को पकड़ा था। उसे 50 हजार रुपए UPI से भेजे गए थे, जिसके आधार पर पुलिस ने उस गैंग को दबोचा था।

इन घटनाओं की तस्दीक करते हुए अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के राष्ट्रीय महासचिव भालाचंद्र सारंगी। वह कहते हैं कि गोरक्षा के नाम पर वसूली का खेल अब खुलकर सामने आ गया है।

वह बताते हैं कि अब गंजाम में किसान गाय को मुसीबत समझने लगे हैं। जिस गाय को कभी घर की समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, आज वही किसानों के लिए डर और लाचारी का सबब बन गई है।

जो लोग डर के साए में पैसे थमा देते हैं, बच जाते हैं, लेकिन जो लोग इनकार करते हैं, उन पर गो-तस्करी का ठप्पा लगा दिया जाता है। यही इनका ‘मॉडस ऑपरेंडी’- यानी काम करने का तरीका है: डराओ, वसूलो और जो न झुके, उसे झुकने पर मजबूर करो।

सारंगी बताते हैं कि गंजाम में दो जगहों- हिंजली और बेलमुंढा में ही गाय का आधिकारिक तौर से व्यापार होता है। यहां लोग गाय को एटीएम मशीन की तरह देखते हैं। जब जरूरत पड़ती है, तो बेचकर अपना रुका काम कर लेते हैं।

सबसे चिंता की बात यह है कि यह सारा खेल थाने की सरपस्ती में खेला जा रहा है। थाने में इन गोरक्षकों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, बल्कि उल्टा जो परेशान होता है, उसी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

(डिस्क्लेमर- घटना के शिकार लोगों ने एक संगठन पर बार-बार आरोप लगाया है, लेकिन हम इसकी पुष्टि नहीं करते।)

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