ब्रह्मा चेलानी का कॉलम: कूटनीति से कारोबार के मेल की ट्रम्प-शैली अनुचित है h3>
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8 घंटे पहले
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ब्रह्मा चेलानी पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस
यदि कोई नेता अहम कूटनीतिक जिम्मेदारियां अपने परिजनों और बिजनेस साझेदारों को सौंप दे तो ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा। लेकिन ट्रम्प को ऐसा करने पर बहुत कम विरोध झेलना पड़ा है। कई लोग उनकी इस ‘क्रोनी डिप्लोमेसी’ को गैर-पारम्परिक कार्यशैली कह देते हैं। लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हैं। विदेश मंत्री या पेशेवर कूटनीतिज्ञों पर भरोसा करने के बजाय ट्रम्प ने अहम जिम्मेदारियां अपने दामाद जैरेड कुश्नर और बिजनेस-पार्टनर स्टीव विटकॉफ को सौंप दी हैं।
कुश्नर ट्रम्प के पहले कार्यकाल में भी वरिष्ठ सलाहकार थे और इजराइल तथा अरब देशों के बीच अब्राहम समझौता कराने में उनकी भूमिका रही थी। कुश्नर और विटकॉफ यूक्रेन, गाजा और ईरान पर वार्ता का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन दोनों के पास ही जटिल और महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौतियां हल करने का कोई पिछला अनुभव नहीं है। फिर, दोनों के हितों का टकराव भी साफ नजर आ रहा है।
चलिए, विटकॉफ से शुरू करते हैं। पिछले साल पाकिस्तान ने क्रिप्टोकरेंसी कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल (डब्ल्यूएलएफ) के साथ एक विवादित निवेश समझौता किया था। इस कंपनी के सीईओ विटकॉफ के बेटे जैक हैं और कंपनी में ट्रम्प और विटकॉफ परिवार की मालिकाना हिस्सेदारी है। इस साल जनवरी में इसी कंपनी से जुड़ी एक इकाई ने पाकिस्तान के साथ एक और समझौता किया। यह कंपनी द्वारा स्टेबलकॉइन शुरू करने को लेकर था, जिसका सीमा पार लेनदेन के लिए इस्तेमाल हो सके।
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लेकिन यूएस-ईरान के बीच पाकिस्तान में ही वार्ता हुई है और पाकिस्तान वार्ता का मध्यस्थ भी था। जब अलग-अलग पक्ष एक इलाके में भू-राजनीतिक परिणाम तय कर रहे हों और कारोबार के अवसर भी तलाश रहे हों तो कूटनीति बाजार जैसी लगने लगती है। पहुंच, प्रभाव और मुनाफा आपस में जुड़ी चीजें हैं। अब कुश्नर की बात करें तो ट्रम्प के पहले कार्यकाल के बाद उन्होंने ‘एफिनिटी पार्टनर्स’ नाम की एक निजी इक्विटी फर्म शुरू की और खाड़ी देशों की राजशाहियों से अरबों डॉलर जुटाए। इसमें सऊदी अरब के सॉवरेन वेल्थ फंड के करीब 2 अरब डॉलर भी शामिल हैं।
यानी, कुश्नर सऊदी पूंजी पर निर्भर हैं, लेकिन इसके बावजूद उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे ईरान के साथ संबंध सुधारने पर बातचीत करेंगे। जबकि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कथित तौर पर ट्रम्प से युद्ध जारी रखने की गुहार लगा रहे हैं। कुश्नर और विटकॉफ के हितों के टकराव और विदेश नीति में उनकी अनुभवहीनता अपने आप में यह बताती है कि क्यों ट्रम्प ने उन्हें आधिकारिक कूटनीतिक पदों पर नियुक्त नहीं किया।
विशेष दूतों को सीनेट द्वारा पुष्टि की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। पेशेवर कूटनीतिज्ञों की तरह उन पर नैतिक नियमों और संसद की निगरानी की बाध्यता भी नहीं होती। ऐसे में कुश्नर और विटकॉफ अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते हैं और बिना जवाबदेही के अमेरिका की ओर से बातचीत भी कर सकते हैं। ट्रम्प के सहयोगी लैरी एलिसन भी ‘टिकटॉक’ में निवेश से मोटा फायदा कमा चुके हैं।
ट्रम्प के बेटों एरिक और डोनाल्ड जूनियर ने भी हाल ही में ‘पावरस’ नामक ड्रोन कंपनी जॉइन की है। वे अपने पिता द्वारा शुरू किए युद्ध में ईरान के हमलों का जवाब देने के लिए खाड़ी देशों को ड्रोन इंटरसेप्टर बेचने की जुगत में हैं। अब तो ईरान युद्ध को लेकर संभावित इनसाइडर ट्रेडिंग की खबरें भी सामने आ रही हैं।
बताया जाता है कि ट्रम्प के बाजार को प्रभावित करने वाले सार्वजनिक बयानों से ठीक पहले बड़े दांव लगाए गए। ऐसे घोटाले किसी भी पिछली अमेरिकी सरकार को गिरा सकते थे या कम से कम तत्काल जांच शुरू करा सकते थे, पर ट्रम्प शासन में वो आम बात हो गए हैं।
- यूएस-ईरान के बीच पाकिस्तान में ही वार्ता हुई और वह वार्ता का मध्यस्थ भी था। जब अलग-अलग पक्ष ए क इलाके में भू-राजनीतिक परिणाम तय कर रहे हों और कारोबार के अवसर भी खोज रहे हों तो कूटनीति बाजार जैसी लगने लगती है।
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ब्रह्मा चेलानी पॉलिसी फॉर सेंटर रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस
यदि कोई नेता अहम कूटनीतिक जिम्मेदारियां अपने परिजनों और बिजनेस साझेदारों को सौंप दे तो ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा। लेकिन ट्रम्प को ऐसा करने पर बहुत कम विरोध झेलना पड़ा है। कई लोग उनकी इस ‘क्रोनी डिप्लोमेसी’ को गैर-पारम्परिक कार्यशैली कह देते हैं। लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हैं। विदेश मंत्री या पेशेवर कूटनीतिज्ञों पर भरोसा करने के बजाय ट्रम्प ने अहम जिम्मेदारियां अपने दामाद जैरेड कुश्नर और बिजनेस-पार्टनर स्टीव विटकॉफ को सौंप दी हैं।
कुश्नर ट्रम्प के पहले कार्यकाल में भी वरिष्ठ सलाहकार थे और इजराइल तथा अरब देशों के बीच अब्राहम समझौता कराने में उनकी भूमिका रही थी। कुश्नर और विटकॉफ यूक्रेन, गाजा और ईरान पर वार्ता का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन दोनों के पास ही जटिल और महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौतियां हल करने का कोई पिछला अनुभव नहीं है। फिर, दोनों के हितों का टकराव भी साफ नजर आ रहा है।
चलिए, विटकॉफ से शुरू करते हैं। पिछले साल पाकिस्तान ने क्रिप्टोकरेंसी कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल (डब्ल्यूएलएफ) के साथ एक विवादित निवेश समझौता किया था। इस कंपनी के सीईओ विटकॉफ के बेटे जैक हैं और कंपनी में ट्रम्प और विटकॉफ परिवार की मालिकाना हिस्सेदारी है। इस साल जनवरी में इसी कंपनी से जुड़ी एक इकाई ने पाकिस्तान के साथ एक और समझौता किया। यह कंपनी द्वारा स्टेबलकॉइन शुरू करने को लेकर था, जिसका सीमा पार लेनदेन के लिए इस्तेमाल हो सके।
लेकिन यूएस-ईरान के बीच पाकिस्तान में ही वार्ता हुई है और पाकिस्तान वार्ता का मध्यस्थ भी था। जब अलग-अलग पक्ष एक इलाके में भू-राजनीतिक परिणाम तय कर रहे हों और कारोबार के अवसर भी तलाश रहे हों तो कूटनीति बाजार जैसी लगने लगती है। पहुंच, प्रभाव और मुनाफा आपस में जुड़ी चीजें हैं। अब कुश्नर की बात करें तो ट्रम्प के पहले कार्यकाल के बाद उन्होंने ‘एफिनिटी पार्टनर्स’ नाम की एक निजी इक्विटी फर्म शुरू की और खाड़ी देशों की राजशाहियों से अरबों डॉलर जुटाए। इसमें सऊदी अरब के सॉवरेन वेल्थ फंड के करीब 2 अरब डॉलर भी शामिल हैं।
यानी, कुश्नर सऊदी पूंजी पर निर्भर हैं, लेकिन इसके बावजूद उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे ईरान के साथ संबंध सुधारने पर बातचीत करेंगे। जबकि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कथित तौर पर ट्रम्प से युद्ध जारी रखने की गुहार लगा रहे हैं। कुश्नर और विटकॉफ के हितों के टकराव और विदेश नीति में उनकी अनुभवहीनता अपने आप में यह बताती है कि क्यों ट्रम्प ने उन्हें आधिकारिक कूटनीतिक पदों पर नियुक्त नहीं किया।
विशेष दूतों को सीनेट द्वारा पुष्टि की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता। पेशेवर कूटनीतिज्ञों की तरह उन पर नैतिक नियमों और संसद की निगरानी की बाध्यता भी नहीं होती। ऐसे में कुश्नर और विटकॉफ अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते हैं और बिना जवाबदेही के अमेरिका की ओर से बातचीत भी कर सकते हैं। ट्रम्प के सहयोगी लैरी एलिसन भी ‘टिकटॉक’ में निवेश से मोटा फायदा कमा चुके हैं।
ट्रम्प के बेटों एरिक और डोनाल्ड जूनियर ने भी हाल ही में ‘पावरस’ नामक ड्रोन कंपनी जॉइन की है। वे अपने पिता द्वारा शुरू किए युद्ध में ईरान के हमलों का जवाब देने के लिए खाड़ी देशों को ड्रोन इंटरसेप्टर बेचने की जुगत में हैं। अब तो ईरान युद्ध को लेकर संभावित इनसाइडर ट्रेडिंग की खबरें भी सामने आ रही हैं।
बताया जाता है कि ट्रम्प के बाजार को प्रभावित करने वाले सार्वजनिक बयानों से ठीक पहले बड़े दांव लगाए गए। ऐसे घोटाले किसी भी पिछली अमेरिकी सरकार को गिरा सकते थे या कम से कम तत्काल जांच शुरू करा सकते थे, पर ट्रम्प शासन में वो आम बात हो गए हैं।
- यूएस-ईरान के बीच पाकिस्तान में ही वार्ता हुई और वह वार्ता का मध्यस्थ भी था। जब अलग-अलग पक्ष ए क इलाके में भू-राजनीतिक परिणाम तय कर रहे हों और कारोबार के अवसर भी खोज रहे हों तो कूटनीति बाजार जैसी लगने लगती है।
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