बिजली कर्मियों ने नियामक आयोग दफ्तर के बाहर किया प्रदर्शन: मूक प्रदर्शन के लिए जुटे सैकड़ों कर्मचारी – Lucknow News

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बिजली कर्मियों ने नियामक आयोग दफ्तर के बाहर किया प्रदर्शन:  मूक प्रदर्शन के लिए जुटे सैकड़ों कर्मचारी – Lucknow News

बिजली कर्मियों ने नियामक आयोग दफ्तर के बाहर किया प्रदर्शन: मूक प्रदर्शन के लिए जुटे सैकड़ों कर्मचारी – Lucknow News

उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों ने एक बार फिर निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सोमवार को प्रदेशभर के सभी जिलों और बिजली परियोजनाओं पर निजीकरण के विरोध में व्यापक प्रदर्शन हुए। राजधानी लखनऊ में विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले

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सायं 4 बजे नियामक आयोग के मुख्य गेट के सामने कर्मचारी हाथों में तख्तियां लेकर शांतिपूर्वक खड़े रहे। बाद में आयोग के सचिव मौके पर पहुंचे और प्रदर्शनकारियों से ज्ञापन लिया। संघर्ष समिति ने अपने ज्ञापन में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के लिए तैयार किए गए RFP दस्तावेजों को मंजूरी न देने की मांग की है।

नियामक आयोग के दफ्तर के बाहर जुटे प्रदर्शनकारी

आयोग की भूमिका पर भी उठाए सवाल

ज्ञापन में समिति ने आयोग द्वारा निजीकरण की प्रक्रिया पर विचार किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। समिति का कहना है कि निजीकरण की यह कवायद न केवल कर्मचारी हितों के खिलाफ है, बल्कि पूर्व में हुए सरकारी समझौतों का भी उल्लंघन करती है।

संघर्ष समिति ने आरोप लगाया है कि निजीकरण से जुड़े दस्तावेज एक ऐसे ट्रांजैक्शन कंसलटेंट (ग्रांट थॉर्टन) ने तैयार किए हैं, जो खुद फर्जीवाड़े के आरोप स्वीकार चुका है। ऐसे में आयोग को इन दस्तावेजों पर कोई विचार नहीं करना चाहिए।

पुराना समझौता भी सामने रखा

ज्ञापन में वर्ष 2020 के उस समझौते का हवाला भी दिया गया है, जिस पर तत्कालीन ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा और वित्त मंत्री सुरेश खन्ना की मौजूदगी में तत्कालीन पावर कॉरपोरेशन चेयरमैन अरविंद कुमार ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते में साफ तौर पर कहा गया था कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का निजीकरण नहीं किया जाएगा और बिना कर्मचारियों की सहमति के भविष्य में भी कोई निजीकरण नहीं होगा।

अब जब श्री अरविंद कुमार खुद नियामक आयोग के अध्यक्ष हैं, तो संघर्ष समिति ने सवाल उठाया है कि वह कैसे निजीकरण के दस्तावेजों पर अपनी राय दे सकते हैं?

आयोग की संरचना भी सवालों के घेरे में

ज्ञापन में यह भी बताया गया है कि आयोग में वर्तमान में कोई सदस्य लॉ मौजूद नहीं है, और अन्य सदस्य संजय सिंह पहले पावर कॉरपोरेशन में काम कर चुके हैं, जिससे हितों का टकराव पैदा होता है। ऐसे में आयोग की पूरी निर्णय प्रक्रिया तकनीकी रूप से अधूरी और पक्षपातपूर्ण मानी जा सकती है।

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