बड़वानी में अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन: ज्ञान और संस्कृति का संगम, युवाओं को गीता संदेश से जोड़ा – Barwani News h3>
बड़वानी में अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2025 के अवसर पर जिला स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस शहीद भीमा नायक महाविद्यालय के सभागृह में हुआ। इसका उद्देश्य जिले में श्रीमद् भगवद् गीता के शाश्वत संदेश और मूल्यों के प्रति
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कार्यक्रम का शुभारंभ जिला पंचायत अध्यक्ष बलवंतसिंह पटेल और जिला कलेक्टर जयति सिंह ने कन्या पूजन एवं माँ सरस्वती पूजन के साथ किया। इस अवसर पर बलवंतसिंह पटेल ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता जीवन का सार है, जो हमें कर्मण्यता, कर्तव्यनिष्ठा और धर्मपरायणता का पाठ पढ़ाती है। उन्होंने युवाओं को गीता के संदेशों को अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया।
पटेल ने यह भी बताया कि आधुनिक युग में भी गीता का ज्ञान उतना ही प्रासंगिक है, जो तनावमुक्त रहकर जीवन के हर संघर्ष में सही मार्ग दिखाता है। कार्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय पर आधारित बुकलेट का वितरण किया गया। साथ ही, 1100 गीता पाठियों द्वारा 15वें अध्याय का सामूहिक सस्वर वाचन किया गया।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवाओं और जनमानस को भारतीय संस्कृति और दर्शन की अमूल्य निधि श्रीमद्भगवद्गीता से परिचित कराना और उसके नैतिक मूल्यों को समाज में प्रसारित करना रहा।
क्यों मनाई जाती है गीता जंयती
मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। यानि इसी दिन श्रीमद्भगवद गीता जन्म हुआ था।
गीता जयंती का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ गीता के श्लोक आज 21वीं सदी में भी लोगों को जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। इसमें धर्म के साथ कर्म का मर्म समाहित है। सही मायने में कहा जाए तो यह कर्म, भक्ति और ज्ञान का संगम है, जिसमें डुबकी लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में जरूर सफलता मिलती है। भगवान श्री कृष्ण के द्वारा कहे गए गीता के अनमोल वचन व्यक्ति को कठिन समय में जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। गीता में कहा गया है कि किस तरह कठिन से कठिन समय में भी कर्म करते हुए धर्म का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। सही मायने में देखा जाए तो श्रीमद्भगवद गीता में जीवन की हम समस्या का समाधान मिलता है।
गीता के प्रथम श्लोक का क्या है मर्म
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय.
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए उपदेशों से जुड़ी गीता के पहले श्लोक के पहले दो शब्द पर यदि गौर करें तो इसमें पूरी श्रीमद्भगवद गीता का सार समाहित है। ये दो शब्द हैं धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे। यह संदेश देता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म के क्षेत्र में धर्म का अनुसरण करें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि धर्म ही मनुष्य का पिता, माता, भाई, मित्र, रक्षक और स्वामी है। इसलिए कर्म करते हुए किसी भी सूरत में धर्म का साथ न छोड़ें।
गीता के जरिए श्रीकृष्ण ने दिया है ये संदेश
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं – ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:’, अर्थात व्यक्ति का सिर्फ कर्म करने पर अधिकार है फल पर नहीं. ऐसे में उसे कर्म को फल की इच्छा लिए हुए नहीं बल्कि कर्तव्य समझकर करना चाहिए. इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को गीता के जरिए संदेश देते हैं कि – ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:’ यानि पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि और अधर्म बढ़ता है तो भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं।
श्री कृष्ण कहते हैं कि – ‘नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:’ यानि आत्मा अजर-अमर है और उसे न तो कोई शस्त्र काट सकता है और न ही आज उसे जला सकती है. भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट रूप से गीता के वचन में कहा है कि – ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ यानि वे सज्जन और अच्छे लोगों के कल्याण और दुर्जन लोगों के विनाश के लिए समय-समय पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।
