परिवार को वक्त देना क्यों जरूरी, बता रहीं लेखिका क्रिस्टिना: साथ खाना तो सिर्फ बहाना है, हर शाम प्लेट-चम्मच की खनक में दिल के बोझ हल्के हो जाते हैं h3>
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न्यूयॉर्क1 घंटे पहले
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लेखिका क्रिस्टीना राइट कहती हैं- दुनिया चाहे कितनी भी तेज क्यों न दौड़े, परिवार की डोर उन्हें मजबूती से जोड़े रखती है। – प्रतीकात्मक फोटो
शाम के सात बजते ही लेखिका क्रिस्टीना राइट के घर की डाइनिंग टेबल छोटे से मंच में बदल जाती है। पनीर की खुशबू पूरे घर में फैल रही होती है। बड़ा बेटा घड़ी पर नजर डालते हुए दोस्तों से मिलने की तैयारी करता है, वहीं छोटा बेटा खेल से थका-हारा लौटता है। पिता मीटिंग के बाद लैपटॉप बंद करते हैं और क्रिस्टिना प्लेटें सजाती हैं।
यह दृश्य किसी खास दिन का नहीं, बल्कि रोज का है- जहां चार दिशाओं में भागते लोग डिनर टेबल पर साथ ठहर जाते हैं। जानी-मानी लेखिका क्रिस्टीना बताती हैं, ‘यह परंपरा बच्चों के छोटे होने पर शुरू हुई थी। तब उन्हें समय पर खिलाने के लिए दंपती ने शेड्यूल बदल दिया था। उस समय यह सिर्फ सहूलियत थी, पर धीरे-धीरे यही आदत परिवार को जोड़ने वाली सबसे मजबूत डोर बन गई।
अब जब बच्चे किशोरावस्था में हैं, तो उनके शेड्यूल और व्यस्तताओं के बीच ‘फैमिली टाइम’ अपने आप नहीं मिलता। क्रिस्टीना मानती हैं कि अब यह समय चुराना पड़ता है। कभी शाम 6 तो कभी रात 8 बजे तक… डिनर का समय बदल सकता है, पर नियम वही रहता है-खाना साथ ही खाएंगे। इस दौरान ‘नो-फोन पॉलिसी’ लागू रहती है।
शुरुआत में बातचीत मुश्किल होती है, माता-पिता के लंबे सवालों के जवाब में टीनेजर्स अक्सर ‘हां’, ‘हूं’ या ‘ठीक है’ जैसे जवाब देते हैं, लेकिन क्रिस्टीना कहती हैं कि इन शांत रातों का भी अपना एक सुकून है। पर धीरे-धीरे ब्रोकली आगे बढ़ाते हुए या बर्तन सिंक में रखते हुए बच्चों की गहरी बातें सामने आ जाती हैं। यही छोटे-छोटे पल परिवार को और करीब लाते हैं, बोझ उतार देते हैं।
क्रिस्टिना जानती हैं कि कॉलेज के बाद यह परंपरा छुट्टियों तक सीमित हो जाएगी। पर आज, जब तक वे चारों एक छत के नीचे हैं, डिनर टेबल उनके लिए ‘रीसेट बटन’ है। दिनभर की भागदौड़ व तनाव के बाद यह आधा घंटा उन्हें याद दिलाता है कि दुनिया चाहे कितनी भी तेज क्यों न दौड़े, परिवार की डोर उन्हें मजबूती से जोड़े रखती है।
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लेखिका क्रिस्टीना राइट कहती हैं- दुनिया चाहे कितनी भी तेज क्यों न दौड़े, परिवार की डोर उन्हें मजबूती से जोड़े रखती है। – प्रतीकात्मक फोटो
शाम के सात बजते ही लेखिका क्रिस्टीना राइट के घर की डाइनिंग टेबल छोटे से मंच में बदल जाती है। पनीर की खुशबू पूरे घर में फैल रही होती है। बड़ा बेटा घड़ी पर नजर डालते हुए दोस्तों से मिलने की तैयारी करता है, वहीं छोटा बेटा खेल से थका-हारा लौटता है। पिता मीटिंग के बाद लैपटॉप बंद करते हैं और क्रिस्टिना प्लेटें सजाती हैं।
यह दृश्य किसी खास दिन का नहीं, बल्कि रोज का है- जहां चार दिशाओं में भागते लोग डिनर टेबल पर साथ ठहर जाते हैं। जानी-मानी लेखिका क्रिस्टीना बताती हैं, ‘यह परंपरा बच्चों के छोटे होने पर शुरू हुई थी। तब उन्हें समय पर खिलाने के लिए दंपती ने शेड्यूल बदल दिया था। उस समय यह सिर्फ सहूलियत थी, पर धीरे-धीरे यही आदत परिवार को जोड़ने वाली सबसे मजबूत डोर बन गई।
अब जब बच्चे किशोरावस्था में हैं, तो उनके शेड्यूल और व्यस्तताओं के बीच ‘फैमिली टाइम’ अपने आप नहीं मिलता। क्रिस्टीना मानती हैं कि अब यह समय चुराना पड़ता है। कभी शाम 6 तो कभी रात 8 बजे तक… डिनर का समय बदल सकता है, पर नियम वही रहता है-खाना साथ ही खाएंगे। इस दौरान ‘नो-फोन पॉलिसी’ लागू रहती है।
शुरुआत में बातचीत मुश्किल होती है, माता-पिता के लंबे सवालों के जवाब में टीनेजर्स अक्सर ‘हां’, ‘हूं’ या ‘ठीक है’ जैसे जवाब देते हैं, लेकिन क्रिस्टीना कहती हैं कि इन शांत रातों का भी अपना एक सुकून है। पर धीरे-धीरे ब्रोकली आगे बढ़ाते हुए या बर्तन सिंक में रखते हुए बच्चों की गहरी बातें सामने आ जाती हैं। यही छोटे-छोटे पल परिवार को और करीब लाते हैं, बोझ उतार देते हैं।
क्रिस्टिना जानती हैं कि कॉलेज के बाद यह परंपरा छुट्टियों तक सीमित हो जाएगी। पर आज, जब तक वे चारों एक छत के नीचे हैं, डिनर टेबल उनके लिए ‘रीसेट बटन’ है। दिनभर की भागदौड़ व तनाव के बाद यह आधा घंटा उन्हें याद दिलाता है कि दुनिया चाहे कितनी भी तेज क्यों न दौड़े, परिवार की डोर उन्हें मजबूती से जोड़े रखती है।
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