‘गेस्ट ने बाजरे की खिचड़ी खाई और रोने लगा’: शेफ कुणाल बोले-पहले महिलाओं तक सीमित था खाना बनाना, मास्टर शेफ शो ने बदल दी सोच – Jaipur News

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‘गेस्ट ने बाजरे की खिचड़ी खाई और रोने लगा’:  शेफ कुणाल बोले-पहले महिलाओं तक सीमित था खाना बनाना, मास्टर शेफ शो ने बदल दी सोच – Jaipur News

‘गेस्ट ने बाजरे की खिचड़ी खाई और रोने लगा’: शेफ कुणाल बोले-पहले महिलाओं तक सीमित था खाना बनाना, मास्टर शेफ शो ने बदल दी सोच – Jaipur News


गेस्ट ने मेरे हाथ की बाजरे की खिचड़ी खाई और रोने लगे। पहले मुझे लगा शायद खाना खराब बन गया। लेकिन गेस्ट ने कहा- मां बिल्कुल ऐसा ही बनाती थीं। मां अब नहीं थीं और उस स्वाद ने उन्हें बचपन याद दिला दिया। मेरे लिए शायद वह सबसे बड़ा कॉम्प्लिमेंट था। यह कहना है सेलिब्रिटी शेफ कुणाल कपूर का। कुणाल कपूर जयपुर के टोंक रोड स्थित एक होटल में गैस्ट्रोनॉमिक एक्सपीरियंस इवेंट में पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने दैनिक NEWS4SOCIALके साथ फूड, फ्लेवर्स, राजस्थान के स्वाद, ट्रैवलिंग और भारतीय खाने की बदलती पहचान को लेकर खुलकर बातचीत की। कुणाल कपूर ने कहा- खाना केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि वह यादों, भावनाओं और लोगों से जुड़ाव का माध्यम भी है। अब कुणाल कपूर का पूरा इंटरव्यू पढ़िए..
भास्कर: जयपुर में आयोजित इस कार्यक्रम को आप किस तरह देखते हैं? कुणाल कपूर: आज की शाम फ्लेवर्स को एक नए नजरिए से समझने की कोशिश है। हमने एक ऐसा अनुभव तैयार किया है, जहां लोग सिर्फ स्वाद नहीं चखेंगे, बल्कि उसे महसूस भी करेंगे। यहां अलग-अलग जोन बनाए गए हैं। कहीं लोग खुशबू से फ्लेवर समझेंगे, कहीं टेक्सचर से, कहीं देखकर और कहीं चखकर। फ्लेवर्स का पूरा खेल अनुभव का होता है और आज हम उसी अनुभव को नए तरीके से लोगों के सामने ला रहे हैं। यह सिर्फ खाना नहीं, एक पूरा गैस्ट्रोनॉमिक एक्सपीरियंस है। यहां हम फ्लेवर्स को सेलिब्रेट कर रहे हैं। मैं बस यही कहूंगा कि लोग इस अनुभव का हिस्सा बनें और इसे पूरी तरह महसूस करें। यह कुछ अलग और यादगार होने वाला है। भास्कर: जब आप कोई डिश तैयार करते हैं तो आपके दिमाग में क्या रहता है? कुणाल कपूर: खाना सिर्फ स्वाद देने के लिए नहीं होना चाहिए। अगर खाने के साथ कोई याद जुड़ जाए तो वह अनुभव खास बन जाता है। मान लीजिए मैं कढ़ी-कचौड़ी को नए तरीके से परोसूं। स्वाद अच्छा लगे, लेकिन साथ ही आपको अपने शहर, अपने मोहल्ले या बचपन की याद भी आए। यही फूड का असली कनेक्शन है। जब खाना यादों से जुड़ता है, तभी अनुभव पूरा होता है।
भास्कर: शुरुआती दिनों की कोई तारीफ जो आज भी याद हो? कुणाल कपूर: मेरी मां और पिता हमेशा बहुत सपोर्टिव रहे। शुरू में मैं जो बनाता था, आज सोचता हूं तो लगता है उतना अच्छा नहीं होता था, लेकिन घर वाले हमेशा कहते थे कि बहुत अच्छा बनाया है। वह तारीफ एक पॉजिटिव पुश थी। छोटी उम्र में मिलने वाला भरोसा आपको आगे बढ़ाता है। भास्कर: किसी डिश को लेकर मिला ऐसा कॉम्प्लिमेंट जो आज भी याद हो? कुणाल कपूर: एक बार एक गेस्ट ने मेरे हाथ की बाजरे की खिचड़ी खाई और रोने लगे। पहले मुझे लगा शायद खाना खराब बन गया। लेकिन उन्होंने कहा कि उनकी मां बिल्कुल ऐसा ही बनाती थीं। मां अब नहीं थीं और उस स्वाद ने उन्हें बचपन याद दिला दिया। मेरे लिए शायद वह सबसे बड़ा कॉम्प्लिमेंट था। भास्कर: मास्टरशेफ के बाद फूड इंडस्ट्री को लेकर क्या बदलाव महसूस हुआ? कुणाल कपूर: बहुत बदलाव आया है। पहले खाना बनाना सिर्फ महिलाओं तक सीमित समझा जाता था। लोग खुलकर अपनी कुकिंग शेयर नहीं करते थे। लेकिन टीवी और सोशल मीडिया ने चीजें बदली हैं। अब लोग अपने क्षेत्र के खाने पर गर्व महसूस करते हैं। जयपुर की कचौड़ी, लाल मांस, अजमेर की कढ़ी, बिहार का खाना सबकी पहचान सामने आ रही है। भारतीय खाने का डॉक्यूमेंटेशन हो रहा है और यह बहुत अच्छी बात है। भास्कर: आपने कहा कि आज लोग देसी स्वाद को खोज रहे हैं। आप खुद इस पर कैसे काम करते हैं? कुणाल कपूर: मेरे लिए ट्रैवल सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट है। लोग कहते हैं घूमने में खर्चा होता है, लेकिन मैं इसे निवेश मानता हूं। अगर नए फ्लेवर्स समझने हैं तो अलग-अलग जगह जाना पड़ेगा। वहां का खाना खाना पड़ेगा, उसकी कहानी समझनी पड़ेगी। जब आप यह सब सीखकर अपनी किचन में लौटते हैं, तो वही अनुभव आपकी नई डिश बनाने में काम आता है।

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