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आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम: ईरान में जारी युद्ध कब और कैसे खत्म होगा?

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आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:  ईरान में जारी युद्ध कब और कैसे खत्म होगा?

आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम: ईरान में जारी युद्ध कब और कैसे खत्म होगा?


ईरान में जारी युद्ध कब और कैसे खत्म होगा, यह उन देशों के उद्देश्यों पर निर्भर करता है जिन्होंने युद्ध शुरू किया है- अमेरिका और इजराइल। यह कुछ हद तक ईरान की प्रतिक्रिया और उसकी सैन्य व राजनीतिक क्षमता पर भी निर्भर करता है। जहां इजराइल के युद्ध के उद्देश्य साफ और लगातार एक जैसे रहे हैं, वहीं अमेरिका की स्थिति कई अलग-अलग कारणों में उलझी हुई है। ईरान की धार्मिक सरकार अपने नागरिकों के प्रति बहुत दमनकारी रही है और बाहरी तौर पर भी आक्रामक रही है, खासकर इजराइल के खिलाफ। इसमें पहला बिंदु इजराइल की मुख्य चिंता नहीं है; दूसरा है। इजराइल चाहता है कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था खत्म हो जाए, या कम से कम उसकी सैन्य ताकत और उसके सहयोगी समूहों की ताकत बहुत घट जाए- खासकर लेबनान में हिजबुल्ला और गाजा में हमास। 7 अक्टूबर 2023 के बाद इन दोनों समूहों को भारी नुकसान हुआ था और कुछ लोगों को लगा था कि वे फिर से खड़े नहीं हो पाएंगे, लेकिन अब साफ है कि लेबनान में हिजबुल्ला कमजोर होने के बावजूद फिर से सक्रिय हो गया है। इजराइल का रवैया ईरान के प्रति- जो कि एक अरब देश नहीं है- वैसा नहीं है, जैसा कि वह फिलिस्तीनियों के प्रति रखता है। सिर्फ इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और दक्षिणपंथी नेताओं के लिए ही नहीं, बल्कि इजराइली समाज के एक बड़े हिस्से के लिए भी 7 अक्टूबर 2023 के बाद गाजा के फिलिस्तीनी “मानव से कम’ माने जाने लगे थे और इसलिए उनके हिंसक विनाश को सही समझा गया। इतिहास और सिद्धांत बताते हैं कि ऐसी सोच बड़े पैमाने पर हत्याओं और नरसंहार की स्थिति पैदा कर सकती है। लेकिन ईरान के मामले में इजराइल की चर्चा में अकसर सरकार और समाज के बीच फर्क किया जाता है। जहां ईरान की सरकार को बुरी बताया जाता है और उसे खत्म करने की बात की जाती है, वहीं ईरानी समाज- जो 1979 की क्रांति से पहले इजराइल का दोस्त माना जाता था- को एक प्राचीन सभ्यता का हिस्सा समझा जाता है। इसलिए गाजा में जो रणनीति अपनाई गई, वैसी ईरान के लिए नहीं सोची जा सकती। ईरान में इजराइल का मुख्य लक्ष्य समाज को नष्ट करना नहीं, बल्कि सरकार को बदलना होगा। अमेरिका ने ईरान पर हमले के कई कारण बताए हैं : राजनीतिक व्यवस्था बदलना; ईरान की सैन्य क्षमता को खत्म करना खासकर उसकी मिसाइल बनाने और लॉन्च करने की क्षमता को; उसे यूरेनियम संवर्धन करने और परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना; अरब दुनिया में ईरान के सहयोगी समूहों को खत्म करना; दमन झेल रहे नागरिकों को आजाद कराना; और अमेरिका या उसके क्षेत्रीय हितों पर हमले से पहले ईरान को कड़ी चोट पहुंचाना। इतने सारे कारणों के बावजूद कई लोग कहते हैं कि यह असल में इजराइल का युद्ध है और अमेरिका इसमें उसका साझेदार भर ही है। फिर भी, इतने अलग-अलग कारण होने की समस्या सैद्धांतिक रूप से हल की जा सकती है। यह कहा जा सकता है कि सरकार बदलना अमेरिका का मुख्य उद्देश्य है और बाकी लक्ष्य उससे जुड़े हुए हैं। अगर बड़ा लक्ष्य हासिल हो जाता है तो बाकी उद्देश्य अपने आप पूरे हो जाएंगे। दूसरे शब्दों में, अगर सरकार बदल जाती है तो परमाणु हथियारों की योजना छोड़ दी जाएगी, मिसाइल निर्माण कम हो जाएगा, सहयोगी समूह कमजोर पड़ जाएंगे और नागरिकों पर दमन भी कम होगा। लेकिन समस्या यह है कि सरकार बदलना शायद संभव न हो, या इसमें बहुत लंबा समय लग सकता है। नेताओं को मार देना राजनीतिक व्यवस्था बदलने के बराबर नहीं होता, खासकर एक ऐसे देश में, जहां व्यवस्था बहुत मजबूत संस्थाओं पर टिकी हो। 1979 की क्रांति के बाद ईरान ने संविधान के जरिए एक धार्मिक-शासन व्यवस्था बनाई, जिसमें धर्मगुरुओं के पास चुनी हुई सरकार से भी ज्यादा शक्ति है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रांति की रक्षा के लिए एक बड़ा संगठन बनाया गया- इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स। अगर मौजूदा नेतृत्व को बाहरी ताकत हटा भी दे, तो स्थापित प्रक्रियाओं के जरिए फिर नया नेतृत्व उभर सकता है। कम से कम निकट भविष्य में बाहरी दबाव से पूरी व्यवस्था का गिरना संभव नहीं लगता। इसके अलावा, ईरान राजनीतिक व्यवस्था बदलने की कोशिश की कीमत आसानी से और काफी बढ़ा भी सकता है। मिसाइलों को रोकने वाली एयर डिफेंस प्रणाली बहुत महंगी होती हैं। जितनी ज्यादा मिसाइलें दागी जाएंगी, मिसाइल डिफेंस की लागत उतनी ही बढ़ेगी और यह हमेशा तक नहीं चल सकता। अगर युद्ध लंबा चलता है, तो ये खर्च छोटे नहीं होंगे। कुछ मिसाइलें एयर डिफेंस को पार कर अपने लक्ष्य तक भी पहुंच जाएंगी, जैसे तेल डिपो, पानी को साफ करने वाले प्लांट, बिजली स्टेशन, एआई डेटा सेंटर और यहां तक कि होटल और मॉल भी। ईरान पहले से ही खाड़ी देशों में ऐसा कर रहा है, जिससे उनकी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान हो रहा है। यह नुकसान और भी बड़ा हो सकता है। दूसरा, ड्रोन ने युद्धों की प्रकृति बदल दी है। मिसाइलों की तुलना में इन्हें बनाना और लॉन्च करना काफी सस्ता होता है और जैसा यूक्रेन ने दिखाया है, ड्रोन युद्ध को लंबे समय तक जारी रख सकते हैं, भले ही दोनों देशों की सैन्य ताकत में बड़ा फर्क क्यों न हो। गर मिसाइल लॉन्चर और उत्पादन केंद्रों पर हमला किया जाता है- जैसा कि इजराइल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई में दिख रहा है- तो अमेरिका के सहयोगी देशों जैसे यूएई और कतर पर ड्रोन हमले रक्षा के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। अभी तक कोई नहीं जानता कि ड्रोन बनाने की क्षमता को पूरी तरह कैसे खत्म किया जाए। तीसरा, ईरान दुनिया के कुल तेल का सिर्फ 5% ही पैदा करता है, लेकिन दुनिया के 20% तेल और गैस की सप्लाई होर्मुज से होकर गुजरती है। ऊर्जा विशेषज्ञ डेनियल येरगिन के अनुसार, दुनिया तेल उत्पादन में इतिहास के सबसे बड़े व्यवधान और वैश्विक गैस बाजारों में बड़े झटके का सामना कर रही है। यह तो साफ है कि यह ईरान के हित में होगा कि वह ड्रोनों के इस्तेमाल और होर्मुज पर अपने नियंत्रण के जरिए युद्ध की कीमत बढ़ाए, और उसके पास ऐसा करने की क्षमता भी है। वेनेजुएला जैसी कोई सस्ती जीत यहां संभव नहीं है। ईरान इस युद्ध की कीमत बढ़ाने के लिए तैयार है…
यह ईरान के हित में होगा कि वह ड्रोनों के इस्तेमाल और होर्मुज पर अपने नियंत्रण के जरिए युद्ध की कीमत बढ़ाता चला जाए, और उसके पास ऐसा करने की क्षमता भी है। वेनेजुएला जैसी कोई सस्ती जीत ईरान में संभव नहीं है। यहां हवा से हुकूमत नहीं बदली जा सकती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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