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असम कांग्रेस में AIUDF से अलग होने की उठी मांग, नेता बोले- गठबंधन तोड़ने में देरी से होगा नुकसान

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असम कांग्रेस में AIUDF से अलग होने की उठी मांग, नेता बोले- गठबंधन तोड़ने में देरी से होगा नुकसान


असम कांग्रेस में AIUDF से अलग होने की उठी मांग, नेता बोले- गठबंधन तोड़ने में देरी से होगा नुकसान

विधानसभा चुनाव में हार के बाद जहां कांग्रेस में चुनावी समझौतों को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग जोर पकड़ रही है, वहीं पार्टी में मौजूदा चुनाव के दौरान किए गए गठबंधन को फौरन खत्म करने की मांग उठ रही है। पार्टी का एक बड़ा तबका चाहता है कि असम कांग्रेस को फौरन एआईयूडीएफ से अपने गठबंधन को तोड़ते हुए महाजोत को खत्म कर देना चाहिए।

पार्टी को चुनाव में सबसे ज्यादा उम्मीद असम और केरल से थी। असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन पार्टी को महंगा पड़ा। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हमें एआईयूडीएफ के साथ अपना गठबंधन तुरंत तोड़ देना चाहिए। इसके लिए हार के कारणों की समीक्षा के लिए बनी समिति की रिपोर्ट का इंतजार नहीं करना चाहिए।

गठबंधन तोड़ने में देरी से नुकसान: असम चुनाव में पार्टी की तरफ से चुनाव का जिम्मा संभाल चुके कांग्रेस नेता ने कहा कि एआईयूडीएफ के साथ अपना गठबंधन खत्म करने में जितनी देर करेंगे, उसका नुकसान दूसरे राज्यों में भी होगा। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं। क्योंकि, भाजपा एआईयूडीएफ नेताओं के बयानों के जरिये धुव्रीकरण की कोशिश करेगी।

बंगाल का उदाहरण दिया: पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के भविष्य में इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ कोई संबंध नहीं रखने के ऐलान का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि असम में भी हमें ऐसा ही करना चाहिए। क्योंकि इस गठबंधन से पार्टी को नुकसान और एआईयूडीएफ को सीट का फायदा हुआ है। हालांकि उसके वोट बैंक में पहले के मुकाबले कमी आई है।

कांग्रेस का वोट प्रतिशत घटा: विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करीब तीस फीसदी वोट के साथ 29 सीट मिली। वर्ष 2016 के चुनाव में पार्टी को लगभग 31 फीसदी वोट मिले थे और 26 सीट पर जीत दर्ज की थी। एआईयूडीएफ को इस साल 16 सीट के साथ लगभग नौ प्रतिशत वोट मिले हैं। वहीं साल 2016 में एआईयूडीएफ सिर्फ 13 सीट जीत पाई थी। पार्टी नेता ने कहा कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल का कांग्रेस के साथ समझौता नहीं होता, तो यूडीएफ इतनी सीट नहीं जीतती।



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