बेटी और बहु का फर्क ।

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Why girls always sacrifice their dreams
बेटी और बहू का फर्क ।

समाज चाहे कितना भी आधुनिक होने का दवा करे, वह बहू व बेटियों को समानता का दर्जा देने में हमेसा विफल ही रहा है। समय बदलता है, सोच बदलती है, लड़कियां पढ़ रही हैं और आगे भी बढ़ रही हैं, मगर आज भी हमारे समाज में हजारो लड़कियां ऐसी हैं, जिनके सपनो का सफर शादी होते ही थम जाता हैं । उन्हें ये एहसास कराया जाता हैं कि एक अच्छी गृहिणी होना ही अब उनकी सबसे बड़ी योग्यता हैं । उनकी पठन-पाठनकि योग्यता को कोई महत्व नहीं दिया जाता । भारतीय समाज की दोहरी मानसिकता का यह एक कड़वा सच हैं । आखिर क्यों बलिदान हमेशा लड़की से माँगा जाता हैं ? क्यों हमेशा उससे ही यही उम्मीद की जाती हैं की वह अपने सपनों को भूल जाएँ ? क्यों हमेशा उसे ये आभास दिलाया जाता हैं कि परिवार के सारे कर्तव्यों का निर्वाह उसको ही करना हैं? घर कि बेटियों के लिए मापदंड अलग हैं और बहुओं के लिए अलग क्यों होते हैं ? लिहाजा जरुरत मानसिकता बदलने की हैं। अगर बहू को भी बेटी जैसा प्यार व सम्मान मिले तो यकीं मानियें घर से आप बेटी विदा करेंगे, तो आने वाली बहू भी बेटी ही होगी ।