सवाल 134 – राधा की मृत्यू के बाद श्रीकृष्ण ने क्यों तोड़ी बांसुरी?

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राधा की मृत्यू के बाद श्रीकृष्ण ने क्यों तोड़ी बांसुरी?

अगर बात करे प्रेम की तो श्रीकृष्ण-राधा के नाम की मिसाल दी जाती है. यह भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण-राधा के प्रेम को जीवात्मा और परमात्मा का मिलन कहा जाता है. यह सभी बखूबी जानते है कि राधा श्रीकृष्ण का बचपन का प्यारा ती. जब श्रीकृष्ण 8 साल के थे तब दोनों ने प्रेम की अनुभूति की. राधा श्रीकृष्ण के दैवीय गुणों से परिचित थे. उन्होंने जिंदगी भर अपने मन में प्रेम की स्मृतियों को बनाए रखा.

कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को केवल दो ही चीजें सबसे ज्यादा प्रिय थीं. ये दोनों चीजें भी आपस में एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई थीं बांसुरी और दूसरी राधा. कृष्ण की बांसुरी की धुन ही थी जिससे राधा श्रीकृष्ण की तरफ खिंची चली गईं. राधा की वजह से श्रीकृष्ण बांसुरी को हमेशा अपने पास ही रखते थे.

भले ही श्रीकृष्ण और राधा का मिलन नहीं हुआ है, लेकिन श्रीकृष्ण की बांसुरी उन्हें हमेशा एक सूत्र में बांधे रखती है. भगवान श्रीकृष्ण से राधा पहली बार तब अलग हुईं थी. जब मामा कंस ने बलराम और कृष्ण को आमंत्रित किया था. मथुरा जाने से पहले श्रीकृष्ण राधा से मिले थे. राधा, कृष्ण के मन में चल रही हर गतिविधि को जानती थीं. राधा को अलविदा कह कृष्ण उनसे दूर चले गए.

जाने से पहले श्रीकृष्ण राधा से ये वादा करके गए थे कि वह वापस जरूर आएंगे, लेकिन कृष्ण राधा के पास वापस नहीं आए. जिसके बाद उनकी शादी भी रुक्मिनी से हो गई. रुक्मिनी ने भी श्रीकृष्ण को पाने के लिए बहुत जतन किए थे. श्रीकृष्ण से विवाह के लिए वह अपने भाई रुकमी के खिलाफ चली गईं. रुक्मिनी ने श्रीकृष्ण को एक प्रेम पत्र भी भेजा था कि वह आकर उन्हें अपने साथ ले जाएं. इसके बाद ही कृष्ण रुक्मिनी के पास गए और उनसे शादी कर ली.

जब कृष्ण वृंदावन से निकल गए तब राधा की जिंदगी ने अलग ही मोड़ ले लिया था. राधा की शादी एक यादव से हो गई. राधा ने अपने दांपत्य जीवन की सारी रस्में निभाईं और बूढ़ी हुईं, लेकिन उनका मन तब भी कृष्ण के लिए समर्पित था. राधा ने पत्नी के तौर पर अपने सारे कर्तव्य को पूरा किया दूसरी तरफ श्रीकृष्ण ने अपने दैवीय कर्तव्य निभाए.

सारे कर्तव्यों से मुक्त होने के बाद राधा आखिरी बार अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने गईं. जब वह द्वारका पहुंचीं तो उन्होंने कृष्ण की रुक्मिनी और सत्यभामा से विवाह के बारे में सुना लेकिन वह दुखी नहीं हुईं. जब कृष्ण ने राधा को देखा तो बहुत प्रसन्न हुए. जिसके बाद दोनों ने ही संकेतों में एक दूसरे से काफी देर तक बाते की. राधा जी को कान्हा की नगरी द्वारिका में कोई नहीं पहचानता था. राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के रूप में नियुक्त किया.

राधा दिन भर महल में रहती थीं और महल से जुड़े सभी कार्यों को देखती थी. मौका मिलते ही वह कृष्ण के दर्शन करने चली जाती है, लेकिन महल में राधा- श्रीकृष्ण के साथ पहले की तरह का आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रही थीं इसलिए राधा ने महल से दूर जाना तय किया.

उन्होंने सोचा कि वह दूर जाकर दोबारा श्रीकृष्ण के साथ गहरा आत्मीय संबंध स्थापित कर पाएंगी.
राधा को नहीं पता था कि वह कहां जाएंगी, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण जानते थे. धीरे-धीरे समय बीता और राधा बिलकुल अकेली और कमजोर हो गईं. उस वक्त उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की आवश्यकता पड़ी. आखिरी समय में भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने आ गए. कृष्ण ने राधा से कहा कि वह उनसे कुछ मांगें, लेकिन राधा ने मना कर दिया. कृष्ण के दोबारा कहने पर राधा ने कहा कि वह आखिरी बार उन्हें बांसुरी बजाते देखना चाहती हैं. श्रीकृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद सुरीली धुन में बजाई.

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श्रीकृष्ण ने दिन-रात अपनी बांसुरी बजाई जब तक की राधा आध्यात्मिक रूप से कृष्ण में विलीन नहीं हो गईं. वहीं दूसरी और बांसुरी की धुन सुनते-सुनते राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया. भगवान कृष्ण जानते थे कि उनका प्रेम अमर है, इसके बावजूद वे राधा की मृत्यु को बर्दाश्त नहीं कर सके. कृष्ण ने प्रेम के प्रतीकात्मक अंत के रूप में बांसुरी तोड़कर झाड़ी में फेंक दी. उसके बाद से श्री कृष्ण ने जीवन भर बांसुरी या कोई अन्य वादक यंत्र नहीं बजाया.

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