जैन धर्म के व्यक्ति कहाँ पूजा करते हैं

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जैन धर्म
जैन धर्म

जैन धर्म बहुत पुराना धर्म है. प्राचीन भारत के इतिहास में जैन धर्म का विशेष महत्व है. जैन शब्द की उत्पत्ति की बात करें तो यह संस्कृत भाषा के जिन् शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है – विजेता ( जितेंद्रिय ). जैन धर्म में महात्माओं निर्ग्रंथ ( बंधन रहित ) और जैन धर्म के अधिष्ठाता को तीर्थकर कहा जाता है.

जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे. जैन धर्म को मानने वालों का विश्वास है कि जैन धर्म के सबसे महान् धर्मपदेष्टा महावीर स्वामी थे. इससे पहले जैन धर्म के 23 तीर्थकर थे तथा महावीर स्वामी जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर थे. जैन धर्म में 23 वें तीर्थकर पार्श्वनाथ माने जाते हैं.

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जैन मंदिर

महावीर स्वामी का जन्म 540 ई. पू. वैशाली के कुण्डग्राम के निकट बिहार में हुआ था. 30 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी ने अपना गृह त्याग कर दिया था. जिसके बाद 12 वर्षों तक तपस्या करने के बाद इनको ज्ञान की प्राप्ति हुई. महावीर स्वामी को ज्ञान प्राप्ति के बाद केवलिन कहा गया. जिसका अर्थ होता है- सर्वोच्चय ज्ञान प्राप्त व्यक्ति. 72 वर्ष की आयु में 468 ई.पू. में इनकी मृत्यु हो गई. जिसे निर्वाण कहा जाता है.

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जैन मंदिर

जैन धर्म में देवताओं के अस्तित्व को तो स्वीकार किया गया है. लेकिन उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है. अगर हम देखें कि जैन धर्म के व्यक्ति कहाँ पूजा करते हैं, तो जैन धर्म में पूजा करने के लिए जैन मंदिर होते हैं. जहां पर जैन धर्म को मानने वाले लोग पूजा करते हैं. जैन मंदिर कला के आधार पर मुख्य रूप से 2 प्रकार के होते हैं. शिखर बंद जैन मंदिर तथा घर जैन मंदिर जिसको बिना शिखर वाले मंदिर भी कहा जाता है. जैन मंदिरों में मंदिर का मुख्य भाग “गर्भ ग्रह” कहलाता है. यहां भगवान की प्रतिमा स्थापित की जाती है. इसमें बिना स्नान किए तथा पूजा के वस्त्रों के बिना नहीं जाना चाहिएं.

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जैन समाज में कई मंदिर ऐसे भी होते हैं, जहां मूर्ति के स्थान पर जिनवाणी रखी जाती है. ऐसे मंदिर चैत्यालयों के नाम से जाने जाते हैं. इनमें जैन धर्म की एक शाखा दिगंबर जैन तारणपंथी पूजा करते हैं.

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