भैरव देवता की हिंदू धर्म में बहुत मान्यता है. इनकी सवारी कुत्ता है. इनकी पूजा पूरे देश में होती है. महाराष्ट्र में खंडोबा उन्हीं का एक रूप है. दक्षिण भारत की बात करें तो वहां उनको शास्ता के नाम से जाना जाता है. भैरव देव को एक उग्र देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है.
ऐसी मान्यता रही है कि काल भैरव जी का जन्म भगवान शिव के क्रोध के हुआ था. पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश में विवाद हो जाता है तथा तीनों अपने आप को एक दूसरे से श्रेष्ट बताने लगते हैं. इसी बात को लेकर तीनों में विवाद होता रहा, इसी बीच ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की निंदा की, इससे भगवान शिव शंकर क्रोधित हो गए. उनके रौद्र रूप के कारण ही काल भैरव जी का जन्म हुआ.
ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा के पहले पाँच सिर होते थे. जब का भगवान शिव के क्रोध से जन्म हुआ तो उन्होंने एक सिर काट दिया. इसके बाद ब्रह्मा जी के चार सिर शेष रह गए. ऐसा करने के कारण काल भैरव को ब्रह्म हत्या का पाप लग गया. जिससे बचने के लिए उन्होंने भगवान शिव से उपाय पूछा. जिसके बाद भगवान शिव ने एक उपाय बताया कि वह पृथ्वी लोक में चले जाएं. पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए जहाँ कही भी उनके हाथ से ब्रह्मा जी का सिर अपने आप गिर जाएगा. वहीं पर उसी समय वो ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो जाएंगें.
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जहाँ पर काल भैरव के हाथ से वो सिर गिरा वो जगह काशी थी जो शिव की स्थली मानी जाती है. यही कारण है कि आज भी काशी जाने वाला हर श्रद्धालु या पर्यटक काशी विश्वनाथ के साथ साथ काल भैरव के दर्शन भी करता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त करता है.















