West Bengal News: सिंगूर आंदोलन कर सत्ता में आई थीं ममता बनर्जी, अब 13 साल बाद टाटा ग्रुप के स्वागत के लिए तैयार TMC

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West Bengal News: सिंगूर आंदोलन कर सत्ता में आई थीं ममता बनर्जी, अब 13 साल बाद टाटा ग्रुप के स्वागत के लिए तैयार TMC

West Bengal News: सिंगूर आंदोलन कर सत्ता में आई थीं ममता बनर्जी, अब 13 साल बाद टाटा ग्रुप के स्वागत के लिए तैयार TMC

हाइलाइट्स

  • पश्चिम बंगाल में टाटा ग्रुप के स्वागत के लिए तृणमूल तैयार
  • मंत्री पार्थ ने कहा- टाटा से नहीं रही दुश्मनी, हमेशा स्वागत
  • ‘अभी रोजगार का सृजन है ममता सरकार की प्राथमिकता’
  • सिंगूर में आंदोलन कर ममता बनर्जी की हुई थी ताजपोशी

कोलकाता
सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में अहम स्थान रखता है। टाटा कंपनी को प्लांट स्थापित करने के लिए किसानों की जमीन के जबरन अधिग्रहण का विरोध कर ही ममता बनर्जी की सत्ता में ताजपोशी हुई थी। टाटा की 2008 में हुई वापसी के 13 साल बाद अब तृणमूल कांग्रेस उसी ग्रुप के साथ निवेश के लिए बातचीत के रास्ते तैयार कर रही है। ममता बनर्जी के साथ ही सुवेंदु अधिकरी उस समय आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे, जो कि अब विपक्षी दल बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।

पश्चिम बंगाल के इंडस्ट्री और आईटी मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा, ‘अभी हमारी सरकार की प्राथमिकता रोजगार का सृजन है। ममता सरकार जल्द से जल्द किसी भी इंडस्ट्रियल हाउस की तरफ से दो बड़े मैनुफैक्चरिंग यूनिट्स लगाना चाहती है। रोजगार मुहैया कराने की क्षमता के आधार पर कंपनियों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।’ ममता सरकार के इस कदम का असर प्रदेश की राजनीति पर देखने को मिल सकता है।

‘टाटा ग्रुप से कभी नहीं रही दुश्मनी’
चटर्जी ने कहा, ‘टाटा के साथ हमारी कभी भी दुश्मनी नहीं रही। ना ही हमने कभी उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी। वे इस देश के ही नहीं बल्कि विदेश के भी सबसे बड़े और सम्मानित बिजनस घरानों में शुमार हैं। सिंगूर में जो हुआ, उसके लिए आप टाटा को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। समस्या तो लेफ्ट फ्रंट की सरकार और जमीन के जबरन अधिग्रहण में रही। बंगाल में आने और निवेश करने के लिए टाटा ग्रुप का हमेशा से स्वागत है।’

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उन्होंने कहा, ‘नमक से लेकर स्टील के निर्माण में लगी टाटा कंपनी ने कोलकाता में अपना सेंटर बनाने में रूचि दिखाई है। टीसीएस के अलावा हमारे पास टाटा के सेंटर के तौर पर टाटा मेटालिक्स की मौजूदगी पहले से ही है। लेकिन अगर वे मैनुफैक्चरिंग और अन्य सेक्टर में निवेश करना चाहते हैं, तो इसमें समस्या नहीं है।’ चटर्जी ने साथ ही यह भी कहा कि वे निवेश के लिए ग्रुप के अधिकारियों के साथ संपर्क में हैं।

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क्या हुआ था सिंगूर में?
सिंगूर का इलाका कई सारी फसलों की खेती के लिए मशहूर था। मीडिया की सुर्खियों में यहां का नाम 2006 में आना शुरू हुआ, जब टाटा ग्रुप ने अपनी सबसे सस्ती कार नैनो के निर्माण के लिए इस जमीन को चुना। उस समय बंगाल में लेफ्ट फ्रंट सरकार का राज था, जिसने नैशनल हाइवे 2 के पास 997 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर कंपनी को सौंप दिया।

उस समय विपक्ष में रहीं ममता बनर्जी ने इस जमीन में से 347 एकड़ को जबर्दस्ती अधिग्रहित किए जाने आरोप लगाया और इसे वापस करने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ गईं। यह आंदोलन बढ़ता ही गया। टीएमसी और लेफ्ट सरकार के बीच कई दौर की बातचीत के बाद भी मामला सुलझ नहीं सका था। इस वजह से टाटा ने 2008 में सिंगूर से प्लांट की योजना को हटाकर गुजरात के साणंद में शिफ्ट कर लिया। बाद में 2016 में किसानों की जमीन वापस लौटा दी गई थी।

फाइल फोटो

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