भारतीय राजनितिक परिदृश्य को अगर तर्क के नजरिये से देखा जाय तो जमीनी स्तर पर इसमें कुछ बदलाव होते हुए नजर आते हैं. 2014 में सत्ताविरोधी लहर या यूँ कहे की मोदी लहर पर बैठ कर प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोद…
लेकिन जिस तरह से लोगो के बीच में नरेटिव गढ़े जा रहे हैं, यह समझना आसान है की सभी पार्टियाँ मुद्दे से भटकाने की राजनीति को जोर दे रही हैं, फिर चाहे वो प्रधानमंत्री की किसान सम्मान निधि योजना हो या फिर…
असल में चाहे वो न्यूनतम आय योजना हो या फिर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि दोनों का उद्देश्य मात्र एक से बढ़कर एक दावे करना है. भारतीय अर्थव्यस्था का स्वास्थ्य इतना खराब है कि ये योजनायें शायद ताबूत मे…
असल में चाहे वो युवाओं में बढती बेरोजगारी हो या फिर किसानो को उनके उत्पादों का उचित मूल्य न मिल पाना, असल मुद्दे यही है और इस तरफ बात करने की फुर्सत किसी भी राजनीतिक दल को नही है.
बेरोज़गारी के मुद्दे से राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भारतीय राजनीति की छलांग शायद नरेटिव गढ़ने का हथियार मात्र है, और जिस तरह से मतदाताओं को गुमराह करने की राजनीति हो रही है ये एक प्रकार की गिरावट ही है.
असल में लोकसभा चुनावों की तासीर अब बदल चुकी है, अब चुनाव राजनीतिक दल नहीं बल्कि उनके आईटी सेल कर रहे हैं. कौन सी पार्टी ज्यादा असल मुद्दों से गुमराह करती है, सारा ध्यान यही है. देखना होगा की अब मुद्दो…
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