भारत के विभाजन से पहले के दिनों में सभी समृद्ध घरों में बकरीद के मौके पर क़ुर्बानी की जाती थी. केवल ग़रीब लोग पैसा जमा कर मिलकर बकरे या भेड़ की क़ुर्बानी करते थे. हालांकि, उस दौर में बकरियां और भेड़ें…
1857 के विद्रोह से पहले के सालों में सांप्रादायिक सौहार्द मजबूत करने के उद्देश्य से शहरी इलाक़ों में इस प्रतिबंध को कड़ाई से लागू किया गया। बहादुर शाह ज़फ़र ने शायद ऐसी अफ़वाहें सुनी थीं कि 1857 के वि…
इसके बाद साल 1880 के मध्य में जब हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा की वजह से दोनों पक्षों में मुठभेड़ हुई जिसके बाद किशन दास गुरवाला बाग में आयोजित होने वाले तारवाला ईद मिलन मेले का आयोजन बंद…
लेकिन इसके चालीस साल बाद 1920 में दोनों पक्षों में एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द संकट में पड़ गया और जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में शामिल हाकिम अजमल ख़ान की कोशिशों का भी असर न हुआ।कुछ ल…
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बकरीद और ईद-उल-अज़हा से जुड़ी एक और चीज़ ये है कि औरंगजेब के दौर में ऊंचे स्थान पर बनी ईदगाह के आसपास सबसे ज़्यादा क़ुर्बानियां दी गईं।कुछ लोग आज भी ये कहते हैं कि क़ुर्बान अली की आत्मा सुकून में होगी…
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