भारतीय राजनीति में कभी भी धर्म और जाति तब तक महत्वपूर्ण निर्णायक भूमिका नहीं निभाते जब तक स्वयं पब्लिक आप और मैं स्वयं किसी जाति एवं धर्म विशेष को श्रेष्ठ मानते हुए उस पार्टी को वोट करते हैं।
पर देखिए कहते हैं कि जाति कभी नहीं जाती जो ना चाहते हुए भी कड़वा सच है। साथ ही एक महिला प्रत्याशी होना भी वोटरों को लुभावना लगता है क्यों? क्योंकि माना जाता है कि मूलतः
महिलाएं स्वभाव से भावुक होती है और बिल्कुल वे जहाँ एक ओर कर्मनिष्ठ होती हैं वहीं दूसरी ओर समस्याओं का समाधान अपने आज्ञाकारी स्वभाव के कारण कर्तव्यनिष्ठ रहती हैं!
पर बिल्कुल इस बात या फिर कहूँ कि इस तथ्य को किसी भी तरह से एक बार को भी नकार नहीं सकते कि वोट बैंक जाति की राजनीति खेलकर वोटरों की भावनाओं के साथ खेलते हैं और भावनाओं में बहाना सबसे आसान तरीका है…
भारतीय राजनीति में कभी भी धर्म और जाति तब तक महत्वपूर्ण निर्णायक भूमिका नहीं निभाते जब तक स्वयं पब्लिक स्वयं किसी जाति एवं धर्म विशेष को श्रेष्ठ मानते हुए उस पार्टी को वोट करते हैं।
पर देखिए कहते हैं कि जाति कभी नहीं जाती! जो ना चाहते हुए भी कड़वा सच है। साथ ही एक महिला प्रत्याशी होना भी वोटरों को लुभावना लगता है क्यों? क्योंकि माना जाता है कि मूलतः
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