Uttarakhand Election 2022: ‘फूल वाले’ के मुरीद पर राष्ट्रवाद को लेकर नजरिया उससे जुदा, पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट

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Uttarakhand Election 2022: ‘फूल वाले’ के मुरीद पर राष्ट्रवाद को लेकर नजरिया उससे जुदा, पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट

पिथौरागढ़: उत्तराखंड (uttarakhand election ground report) के पिथौरागढ़ जिले में नेपाल से लगते झूलाघाट इलाके के बुजुर्ग जय बहादुर चंद भारत में खड़े होकर काली नदी के उस पार (नेपाल) खड़े पहाड़ में स्थित अपनी इष्ट देवी त्रिपुर सुंदरी को दंडवत प्रणाम कर रहे हैं। प्रणाम करने के बाद बताने लगे – हम यहां आ गए, माताजी वहीं रह गईं। साल में दो बार उधर जाता हूं। बाकी दिन यहीं से रोज दर्शन करता हूं।

चुनाव की बात चली तो जयबहादुर कहने लगे- जिसके पास भी दिमाग है, वह उस सरकार को ही वोट करेगा जो आपको राशन दे रही हो, आपको पैसा दे रही हो। पिछले आठ सालों में बहुत फर्क आया है। हम तो माताजी से प्रार्थना करते हैं कि हमेशा फूल वाला ही बने। धारचूला सीट के बलुवाकोट के बुजुर्ग खीम सिंह ‘चुनाव में हवा किसकी’ के सवाल पर कहते हैं- हवा तो नकद की और खाने-पीने की है। मुद्दों पर कौन वोट देता है? जो आपके लिए इतना कर रहा है, जिसका लोहा आज दुनिया मान रही है, उसे आप अनदेखा कर रहे हैं। मोदी जैसा नेता आज तक नहीं हुआ। उसने हममें राष्ट्रवाद का भाव जगाया।

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नेपाल और चीन की सीमा से लगे इस सीमाई जिले में राष्ट्रवाद का मुद्दा काफी मुखर दिखा लेकिन नजरिया अलग-अलग नजर आया। धारचूला नगर पालिका के भूतपूर्व डिप्टी चेयरमैन दीवान सिंह पत्याल से बात चली तो कहने लगे कि इस दूरदराज इलाके में अगर हम चीन और नेपाल के सामने खड़े हैं तो कहीं ना कहीं यहां के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना है। इसी बीच में उन्हें कोई टोकता है – राष्ट्रवाद की बात तो मोदी जी भी करते हैं, लेकिन पत्याल उससे सहमत नहीं होते। वह कहने लगते हैं, उनका राष्ट्रवाद तो हिंदुत्व से जुड़ा है, जिसमें सब लोग शामिल नहीं हैं। हमारा राष्ट्रवाद ऐसा नहीं है। झूलाघाट के कारोबारी शंकर पड़ायत का कहना था कि बीते कुछ सालों में भारत-नेपाल के बीच राष्ट्रवाद की भावना काफी उग्र हुई है। इससे कहीं ना कहीं दोनों देशों के सहज रिश्तों पर एक दरार आई है। मोदी जी ने तो आने के बाद राष्ट्रवाद को और हवा दी है।

जातियों की गोलबंदी की उम्मीद
यूं तो इस सीमाई जिले में कई दल ताल ठोक रहे हैं, लेकिन असली मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही है। आप, एसपी और बीएसपी जैसे दल यहां कोई खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम दिख रहे हैं। पिथौरागढ़ जिले में चार विधानसभा सीटें हैं, जिनमें पिथौरागढ़, डीडीहाट, धारचूला, गंगोलीहाट हैं। जिले की कुल आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा जनजातियों का है, जिसमें भोटिया जनजाति प्रमुख है। भोटिया यहां का काफी प्रभावशाली समुदाय है, जो परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोटर रहा है। स्थानीय राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले प्रेम पुनेठा का मानना है कि जिस तरह से भोटिया समुदाय खुलकर कांग्रेस के साथ दिख रहा है, उससे यहां के गैर भोटिया लोगों के बीजेपी के साथ जाने की संभावना बढ़ी है। इनके अलावा ब्राह्मण, राजपूत और एससी आबादी भी अपना खासा वर्चस्व रखती है। शहर के सिल्थियाम इलाके में होटल चलाने वाले रवींद्र बिष्ट का मानना है कि यहां जाति से ज्यादा उम्मीदवार की अपनी छवि और लोगों के बीच उसका व्यक्तिगत व्यवहार और निजी संपर्क ज्यादा मायने रखता है।

पिथौरागढ़ : दो पुराने धुरंधर आमने-सामने
इस सीट पर असली मुकाबला बीजेपी उम्मीदवार चंदा पंत और कांग्रेस के मयूख महर के बीच है। अपने पति प्रकाश पंत की मृत्यु के बाद 2019 में हुए उपचुनाव में चंदा यहां से जीती थीं। अलग राज्य बनने के बाद से बीजेपी का ही इस सीट पर पलड़ा भारी रहा है। तीन बार यहां से प्रकाश पंत और एक बार मयूख जीते हैं। ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही अपने बढ़ते हुए उम्मीदवारों पर दांव लगाना ठीक समझा। इनके अलावा यहां से आप पार्टी से चंद्रप्रकाश पुनेड़ा, एसपी से वीरेंद्र वीर विक्रम सिंह व निर्दलीय नितिन मकराना मैदान में हैं। समस्याओं की बात की जाए तो पानी का मुद्दा, हवाई सेवा, हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज यहां के प्रमुख मुद्दे हैं।

धारचूला : बाहरी बनाम भीतरी का मुद्दा
इस सीट पर कांग्रेस के हरीश धामी का मुकाबला बीजेपी के धन सिंह धामी के साथ है। बीजेपी ने अपने मौजूदा सांसद स्वामी वीरेंद्रानंद का टिकट काटकर धारचूला के ब्लॉक प्रमुख धन सिंह धामी को मौका दिया है। धारचूला में आज तक बीजेपी कभी नहीं जीत पाई। यहां से कांग्रेस और निर्दलीय जीतते रहे हैं। इनके अलावा यहां एसपी से मंजू, आप पार्टी से नारायण राम, बीएसपी से गोविंद राम मुकाबले में हैं। इस बार चुनाव में बाहरी बनाम भीतरी का मुद्दा बन रहा है। हरीश मुंसियारी से यहां आते हैं, जबकि धन सिंह धारचूला के ही हैं। धारचूला के दीवान सिंह जुम्मा का मानना है कि अगर क्षेत्रवाद चला तो यहां भी कमल खिल जाएगा। यहां के प्रमुख मुद्दों में सड़क व दूरसंचार की कनेक्टिविटी की कमी, मेडिकल व शिक्षा सुविधाओं की किल्लत इस दूरदराज इलाके की मुश्किलों को और बढ़ा रही हैं।

डीडीहाट : निर्दलीय के कारण तिकोना मुकाबला
जिले की सबसे छोटी सीट पर बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल, कांग्रेस के प्रदीप पाल और निर्दलीय किशन सिंह भंडारी के बीच तिकोना मुकाबला है। पिछली बार भी इन्हीं तीनों के बीच कड़ा मुकाबला था। चुफाल इस सीट पर अब तक अजेय रहे हैं। वह लगातार पांच बार यहां से जीत चुके हैं, जिसमें पहला टर्म यूपी और अलग राज्य बनने के बाद से लगातार यहां से जीतते रहे हैं। पिछले चुनाव में भंडारी महज 1,600 वोटों से हारे थे, लेकिन इस बार उनका वैसा ग्राफ नहीं दिख रहा। इस सीट पर आप पार्टी से दीवान सिंह, एसपी से सुरेंद्र सिंह गुरुंग मैदान में हैं। यहां के मुद्दों में डीडीहाट को जिला बनाने की मांग एक बड़ा मुद्दा है। लंबे समय से यह मांग उठ रही है, जिसे लेकर अब तक कई आंदोलन भी हुए हैं। वहीं सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा भी अपने आप में मुद्दे हैं।

nadda

उत्‍तराखंड ग्राउंड रिपोर्ट



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