UP Election News : जहां नेताजी का टिकट हो रहा फिट वही विचारधारा हिट, जानें पार्टियों को क्यों भा रहे बाहरी

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UP Election News : जहां नेताजी का टिकट हो रहा फिट वही विचारधारा हिट, जानें पार्टियों को क्यों भा रहे बाहरी

लखनऊ : ये नाम बस नजीर भर हैं। इनकी सूची बहुत लंबी है। सागर खय्यामी का शेर है ‘कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर, क्या हकीकत हैं और सियासत क्या।’ यूपी की चुनावी (UP Election) बिसात का चेहरा भी कुछ ऐसा ही है। नेताओं के लिए जहां टिकट का जुगाड़ फिट है, वही विचारधारा उनके लिए हिट है। बहुजन समाज पार्टी (BSP), कांग्रेस (Congress), समाजवादी पार्टी (SP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उनके सहयोगी दलों के टिकटों की सूची तो यही कहती है। बाहरियों, दल-बदलुओं का स्वागत सियासी दल भी खुले मन से कर रहे हैं।

चुनावी मैदान में उतरने के लिए नेता किसी भी दल से जुड़ने को तैयार हैं। जिनके टिकट फाइनल नहीं हो रहे, उनके तुरंत दिल बदल जा रहे हैं। एक दिन पहले तक दावेदार जिस दल को कोस रहे हैं, अगले दिन उस दल से टिकट का जुगाड़ हो जाने के बाद उसे ही सबसे बेहतर बता रहे हैं। मसलन नोमान मसूद कांग्रेस छोड़कर रालोद में गए। वहां टिकट की उम्मीद कमजोर हुई तो बसपा में चले गए और मुराद पूरी हो गई। कांग्रेस के चमरौआ से प्रत्याशी यूसुफ अली कांग्रेस से टिकट मिलने के बाद सपा के मंच पर चढ़ गए। वहां मुराद पूरी नहीं हुई तो फिर विचारधारा बदल गई और माफी मांगकर कांग्रेसी हो गए। मोहम्मदी से भाजपा विधायक बाला प्रसाद अवस्थी टिकट के लिए साइकल पर चढ़े, लेकिन मंजिल तक नहीं पहुंच पाए। अब फिर यह कहकर भाजपा में लौट आए कि ‘बहक गए थे।’ बसपा ने तो बाहरियों के आने पर घोषित टिकट तक बदल दिए। फिरोजाबाद से शाजिया हसन, धामपुर से मूलचंद चौहान, कुंदरकी से मोहम्मद रिजवान समेत कई नाम इस फेहरिस्त में हैं।

यूपी की जनता भी समझ रही है, सपा का दामन थामने वाले भी जान रहे हैं कि हमारी सत्ता आ रही है। उत्पीड़न से त्रस्त पिछड़े-दलित, ब्राह्मण सपा से जुड़े रहे हैं। जो नीतियों से प्रभावित होकर आए हैं, उनका समायोजन हो रहा है। 90% से अधिक मूल कार्यकर्ताओं को ही टिकट मिला है।

– आईपी सिंह, प्रवक्ता, सपा

तीन-चौथाई विधायकों के बाद भी भाजपा में कम पड़े चेहरे
भाजपा 2017 में करीब तीन-चौथाई सीटों पर जीत के साथ सत्ता में आई थी। सरकार-संगठन का दावा है कि उसके काम से जनता गदगद है और जीत तय है। बावजूद इसके मैदान में उतारने के लिए पार्टी में चेहरे कम पड़ रहे हैं। अफसरशाही से लेकर दूसरे दलों के बागियों से यह कसर पूरी की जा रही है। आरोप लग रहे हैं कि ‘देवतुल्य’ कार्यकर्ताओं के दावों के बीच सिस्टम में रहकर ‘सहानुभूति’ रखने का इनाम टिकट के तौर पर अफसरों को जा रहा है। एके शर्मा, असीम अरुण से लेकर राजेश्वर सिंह जैसे नाम इसके उदाहरण हैं। सिधौली से सपा से टिकट कटने पर मनीष रावत को भाजपा भायी तो पार्टी ने भी उन्हें तुरंत टिकट दे दिया। सपा में विधायक सुभाष राय का टिकट कटा तो भाजपा ने उन्हें उम्मीदवार बना दिया। आगरा में सपा के पूर्व विधायक धर्मराज 12 जनवरी को भाजपा की नीतियों से ‘प्रभावित’ हुए तो भाजपा ने भी उनकी जनसेवा पर तीन बाद ही टिकट की मुहर लगा दी। इसके लिए अपने विधायक को भी कुरबान कर दिया। अनिल सिंह, नितिन अग्रवाल, राकेश सिंह, नरेश सैनी, हरिओम यादव समेत ऐसे नामों की लंबी फेहरिस्त है। कुछ और नाम भी टिकट के आश्वासन के साथ जुड़ने को तैयार हैं। भाजपा के सहयोगी दल भी इसी राह पर हैं। 2017 में भी भाजपा की लहर में बाहरी खूब भीगे थे और ‘अपने’ किनारे हो गए थे।

चुनावी राजनीति में जिताऊ उम्मीदवार आवश्यक होता है। जो भी भाजपा से चुनाव जीतकर आएगा, वह पार्टी की रीति-नीति व कार्यक्रमों के साथ रहेगा। कार्यकर्ताओं का बड़े पैमाने पर पार्टी ने समायोजन किया है।

– राकेश त्रिपाठी, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा

सपा में बाहरी आते गए, टिकट पाते गए
‘नई हवा है’ का नारा देने वाली सपा की हवा ने बाहरियों को खूब ‘शीतल’ किया है। सत्ता वापसी का माहौल बनाने के लिए बाहरियों को पार्टी ने इतनी तवज्जो दी कि पांच साल तैयारी कर रहे कई सपाइयों के हिस्से ‘त्याग’ ही आया है। अम्बेडकरनगर में लगभग सारे टिकट बाहरियों को ही गए हैं। यहां चार सीटों पर लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, त्रिभुवन दत्त और राकेश पांडेय उम्मीदवार हैं। ये सभी बसपा से आए हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ आए विधायकों और मंत्रियों में अधिकतर के टिकट सुरक्षित हो गए हैं। इसमें धर्म सिंह सैनी, दारा सिंह चौहान, भगवती सागर, रोशनलाल वर्मा, ब्रजेश प्रजापति, अमरनाथ मौर्य, विनय शंकर तिवारी समेत कई और नाम शामिल हैं। इन्हें न केवल टिकट दिया गया, बल्कि इनकी सहूलियत के हिसाब से सीटें भी दी गईं। दारा सिंह चौहान मधुबन की जगह घोसी से लड़ना चाहते थे, उनकी इच्छा पूरी कर दी गई। स्वामी की भी सीट बदल गई है। बसपा छोड़कर सपा में आए माधुरी वर्मा, हरगोविंद भार्गव, असलम राईनी समेत ऐसे नामों की लंबी फेहरिस्त है। राईनी को श्रावस्ती से मो. रमजान का टिकट काटकर दे दिया, जबकि रमजान 500 से भी कम वोटों से हारे थे। सहयोगी दल रालोद भी इसी राह पर है। अवतार सिंह भड़ाना, किरनपाल सिंह समेत और भी नाम इस सूची में हैं। सपा में पूर्वांचल की कई सीटों पर बचे टिकटों पर भी बाहरियों की दावेदारी जारी है।

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