UP BJP President : ओबीसी या ब्राह्मण अध्यक्ष, क्या इस दुविधा में है बीजेपी? समझिए पूरा समीकरण

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UP BJP President : ओबीसी या ब्राह्मण अध्यक्ष, क्या इस दुविधा में है बीजेपी? समझिए पूरा समीकरण

लखनऊ : भाजपा के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह का कार्यकाल बीती 16 जुलाई को पूरा हो गया। वह सरकार में जलशक्ति विभाग के मंत्री भी हैं। ‘एक व्यक्ति-एक पद’ के सिद्धांत पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी योगी-2.0 सरकार के शपथ ग्रहण के बाद से ही नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश में है, लेकिन बात बन नहीं पाई है। यह भी कहा जा रहा है कि जल्दी किस बात की?

सरकार भी बढ़िया चल रही है, संगठन भी मुस्तैद है लेकिन नए अध्यक्ष के चयन में हो रही देरी के पीछे शीर्ष स्तर पर यह तय न हो पाना मुख्य वजह बताया जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर ब्राह्मण अध्यक्ष बनाएं या फिर किसी ओबीसी चेहरे पर दांव लगाएं? देखने में आया है कि विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी के लिए ओबीसी चेहरा फायदेमंद रहता है लेकिन लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण चेहरे के जरिए कामयाबी की इबारत लिखी गई है।

कामयाबी की यह है कहानी
2014 से यूपी भाजपा में ‘ब्राह्मण’ चेहरे की अगुआई में लोकसभा चुनाव लड़ने का फॉर्म्युला सफल रहा है। 2014 में लक्ष्मीकांत वाजपेयी की अगुआई में भाजपा ने सहयोगियों के साथ 73 सीटें जीतीं। इसके बाद 2019 से पहले भाजपा ने डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी। इस बार भी भाजपा ने सहयोगियों के साथ 64 सीटें जीत लीं। इसी वजह से भाजपा के रणनीतिकार इसी सफल फॉर्म्युले को आजमाने पर मंथन करने में जुटे हैं। इसके लिए कुछ नामों पर मंथन भी हुआ।

इनमें पूर्व डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा, सांसद सुब्रत पाठक, सांसद हरीश द्विवेदी, सतीश गौतम के साथ पूर्व मंत्री श्रीकांत शर्मा के नाम शामिल हैं। हालांकि पार्टी की ही ओर से यह भी राय आई है कि इस वक्त सरकार में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक खुद पार्टी के बड़े ब्राह्मण फेस हैं तो क्या एक और ब्राह्मण ‌फेस को लोकसभा चुनाव की जिम्मेदारी दी जाए? या कोई नया प्रयोग किया जाए?

ओबीसी चेहरे का समीकरण
चूंकि भाजपा 2017 से विधानसभा चुनाव ओबीसी फेस के सहारे जीतती आई है, इस वजह से दूसरी संभावना ओबीसी चेहरे के रूप में तलाशी जाने लगी है। 2017 में केशव मौर्य को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने ऐसा ही प्रयोग किया था। उस वक्त यह फैसला चौंकाने वाला लग रहा था, पर जब पार्टी को प्रदेश में सहयोगियों के साथ 325 सीटें मिलीं तो इसे सफल फॉर्म्युला माना जाने लगा।

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इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले स्वतंत्र देव सिंह को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। उनकी अगुआई में भी भाजपा ने सहयोगियों के साथ 273 सीटें जीतकर इस फॉर्म्युले की सफलता पर एक और मुहर लगा दी। इस वजह से पार्टी ने कुछ ओबीसी चेहरों पर भी मंथन किया। केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, प्रदेश महामंत्री अमर पाल मौर्य, पूर्व सीएम कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह ‘राजू’ के नामों पर चर्चा हुई। आखिर में यह भी सुझाव आया कि पिछड़े वर्ग के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पर भी दांव लगाया जा सकता है। इस वजह से अब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने पर भी मंथन किया जा रहा है।

एक कोशिश यह भी
एक फॉर्म्युला पुराने ‘अनुभवी’ नेताओं की बजाए नई लीडरशिप और नई जाति को मौका देने का भी है। इसके लिए युवा और दलित चेहरे की भी तलाश अछूती नहीं है। युवा चेहरों में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, पश्चिम के क्षेत्रीय अय्धक्ष मोहित बेनीवाल के अलावा दलित चेहरों में पूर्व महामंत्री विद्या सागर सोनकर, केंद्रीय मंत्री डॉ. एसपी सिंह बघेल और सांसद विनोद सोनकर के नामों पर भी चर्चा की गई है। इसमें कोशिश ऐसे चेहरे को लाने पर होगी, जो सरकार और संगठन का संतुलन बनाए रखें और उसका पूरा फोकस 2024 में लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का हो।

गेंद केंद्रीय नेतृत्व के पाले में
अब गेंद केंद्रीय नेताओं के पाले में है, जिन्हें फैसला लेना है। सबसे बड़ा संकट है कि मौजूदा संगठन महामंत्री सुनील बंसल को यूपी से किसी दूसरे प्रदेश भेजने पर भी संघ और केंद्रीय नेतृत्व में मंथन चल रहा है। वह खुद भी केंद्रीय नेतृत्व से इसकी इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। 2014 से वह लगातार अपने रणनीतिक कौशल से यूपी में भाजपा को जीत दिलाते आए हैं, इस वजह से 2024 के मद्देनजर उन्हें यूपी की जिम्मेदारी से मुक्त किए जाने को लेकर कोई ‘रिस्क’ नहीं लेना चाहता। इसलिए कोशिश है कि अगर संगठन महामंत्री यूपी में बने रहते हैं तो अध्यक्ष भी ऐसा होगा, जिससे उनका तालमेल बना रहे।

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