अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजे भारत के लिए राहत क्यों? टैरिफ का खतरा कम, अर्थव्यवस्था को मिलेगी मदद
अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है, जिसका भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…
अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है, जिसका भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, अब अमेरिकी कांग्रेस पर रिपब्लिकन पार्टी का एकछत्र नियंत्रण खत्म हो गया है, जिससे भारत के लिए व्यापार समझौते का तात्कालिक दबाव और अचानक टैरिफ लगने का जोखिम कुछ हद तक कम हो गया है।
यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छी खबर मानी जा रही है। एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट में बताया गया है कि कमजोर होता अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता में कमी भारत के लिए फायदेमंद है। इससे भारतीय रुपये को स्थिरता मिलेगी, निर्यातकों की संभावनाएं बेहतर होंगी और भारतीय संपत्तियों पर जोखिम का भार धीरे-धीरे कम हो सकता है।
व्यापार नीति पर ट्रंप के सीमित अधिकार
चुनाव नतीजों से भले ही टैरिफ के मौजूदा ढांचे में बड़ा बदलाव न आए, लेकिन ये राष्ट्रपति ट्रंप की राजनीतिक प्राथमिकताओं को जरूर प्रभावित कर सकते हैं। अब उनके पास व्यापारिक तनाव बढ़ाने के सीमित साधन होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप पर अब उपभोक्ताओं के लिए कीमतें काबू में रखने और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले कुछ व्यापारिक समझौते करने का दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में कोई भी नया व्यापारिक कदम धीमी और जांच-आधारित प्रक्रियाओं जैसे "सेक्शन 301" या "सेक्शन 232" के तहत ही उठाया जा सकेगा। इससे अचानक टैरिफ या व्यापार प्रतिबंध लगने की आशंका घट जाएगी। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेताया गया है कि व्यापार नीति पर राष्ट्रपति के पास अब भी काफी अधिकार हैं, इसलिए अस्थिरता की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
भारत के लिए क्या हैं संभावित जोखिम?
इस सकारात्मक माहौल के बावजूद कुछ जोखिम बने हुए हैं। रिपोर्ट में फार्मास्युटिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों पर "सेक्शन 232" के तहत टैरिफ लगने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा, अगर रूस या ईरान से जुड़े कूटनीतिक मामलों में कोई विफलता होती है, तो भारत के कच्चे तेल आयात पर फिर से दबाव बढ़ सकता है।
कच्चे तेल और रुपये को राहत
भारत के लिए एक बड़ी राहत यह है कि ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें अक्टूबर 2026 के अपने उच्चतम स्तर से लगभग 19% गिरकर 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई हैं। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि चालू वित्त वर्ष में भारत का तेल आयात बिल अब तक 24% बढ़ चुका है और औसत कीमत लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल रही है।
रुपये की स्थिरता के मोर्चे पर भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को कुछ राहत मिल सकती है, जो लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा था। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार चालू खाते के घाटे और आरबीआई की बैलेंस शीट पर लगभग 239 अरब डॉलर की फॉरवर्ड डॉलर देनदारियों को देखते हुए, केंद्रीय बैंक रुपये में बहुत ज्यादा तेजी आने की संभावना को सीमित रख सकता है।
इनपुट: IANS



