अच्छे दिन आने से लेकर ‘चौकीदार’ बनने तक का ढोंग

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2014 के दौरान लोकसभा चुनाव का दौर याद कीजिये. चारो तरफ विकास और तथाकथित ‘अच्छे दिन’ लाने की गूँज थी. वर्तमान प्रधानमंत्री और उस समय भाजपा द्वारा घोषित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी में ही देश की जनता को सारी उम्मीद नजर आ रही थी. और वो उम्मीद वोटों की शक्ल में भाजपा की झोली में गिरती भी है. भारी बहुमत से भाजपा की सरकार बनती है.

असल में बहुमत मिलना एक बड़ी जिम्मेदारी भी होती है. आपको उन उम्मीदों पर खरा उतरना होता है, क्योंकि चुनाव तो हर पांच साल में होते हैं, हुक्मरानों को हर पांच सालो में जनता की अदालत में आना पड़ता है. ये ठीक उसी तरह है जैसे कि स्पाइडरमैन सीरीज की एक फिल्म में हीरो को उसका पिता समझाता है “बड़ी शक्तियों के साथ बड़ी जिम्मेदारियां भी आती हैं” अब मोदी सरकार की बात करें तो उस जिम्मेदारी को कितना समझा गया है, इस बात का फैसला तो जनता वोट से कर ही देगी.

नोटबंदी की अगर बात करें तो छोटे धंधो को चौपट करने का काम सरकार के इसी फैसले ने किया है. जो धंधे नकदी लेन-देन और उधारी पर चलते थे, उन व्यापारियों के पास तो बंद होने के सिवाय कोई रास्ता ही नहीं बचा था. खुद टेलिकॉम सेक्टर की बात करें तो एक रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बाद से लगभग 60 प्रतिशत छोटी दुकानें बंद हो गयी. काला धन कितना ख़त्म हुआ इस बात का जवाब सरकार के पास किसी भी आकड़े में नही है.

आकड़ो की ही जानिब से आगे बढ़ें तो पाएंगे की बेरोजगारी की रिपोर्ट्स अपने चरम पर है, 1991 के उदारीकरण के बाद से युवा सबसे अधिक बेरोजगार है. 23 मई को जो भी सरकार चुनी जायेगी उसके सामने भारत की अर्थव्यस्था सबसे बड़ी चुनौती होगी. एनएसएसओ की रिपोर्ट हो या फिर मुद्रा जॉब सर्वे की रिपोर्ट इनको क्यों समय पर बाहर नहीं किया गया है, इसकी जवाबदेही किसकी है, किसी को नही पता.

गुमराह करने की राजनीति, और मुद्दों से भटकाव शायद भारतीय राजनीति की यही नियति बन चुकी है, फिलहाल जनता का फैसला आने में अभी वक़्त है. 23 मई को क्या होता है, देश का फैसला उसी से होगा.