Scindia Death Anniversary :दो बार मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे सिंधिया, मां के खिलाफ जाकर किया था ये काम | Mother Vijaya Raje Scindia Taught Scindia the ‘abcd of politics’ | Patrika News

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Scindia Death Anniversary :दो बार मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे सिंधिया, मां के खिलाफ जाकर किया था ये काम | Mother Vijaya Raje Scindia Taught Scindia the ‘abcd of politics’ | Patrika News

लाखों वोटों से जीता था पहला चुनाव
1971 में माधवराव सिंधिया ने अपनी मां की छत्रछाया में पहला चुनाव जनसंघ से लड़ा। 1971 के इस चुनाव में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के ‘डी. के. जाधव’ को एक लाख 41 हजार 90 मतों से पराजित किया।

तब ग्वालियर रहा चर्चा में
सिंधिया परिवार ने अपनी राजनीतिक पारी जनसंघ के साथ शुरू की थी। लेकिन बाद में विजया राजे बीजेपी के साथ ही रह गईं और माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस से जुड़कर राजनीति की दूसरी पारी खेली। माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में जाने के बाद ग्वालियर उस समय चर्चा में आ गया था, जब 1984 के आम चुनाव में उन्होंने बीजेपी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हराया था। यह चर्चा इसलिए हुई कि ग्वालियर जनसंघ और बीजेपी का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब सिंधिया के गढ़ के रूप में सामने आया था।

मां के खिलाफ जाकर कांग्रेस से जुड़े
राजमाता के खिलाफ जाकर कांग्रेस से जुडऩे की बात 1979 की है जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया के खिलाफ जाकर भी माधवराव ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली थी। इसे लेकर मां-बेटे के व्यवहार में इतनी कटुता आ गई थी कि बातचीत बंद हो गई और अलग-अलग महल में रहने लगे थे। यहां तक कि राजमाता ने अपनी वसीयत में भी लिख दिया था कि मेरे बेटे का जायदाद में कुछ हिस्सा नहीं रहेगा। मेरा अंतिम संस्कार भी वो नहीं करेगा। हालांकि सिंधिया ने ही अपनी मां का अंतिम संस्कार किया।

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दो बार मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए सिंधिया
पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे। यह किस्सा उस समय का है जब 1989 में चुरहट लाटरी कांड हुआ था। उस समय अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे और चुरहट अर्जुन सिंह का ही निर्वाचन क्षेत्र था। उस समय अर्जुन सिंह पर इस्तीफे का दबाव बढ़ गया था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की इच्छा थी कि सिंधिया मुख्यमंत्री बन जाएं। लेकिन, अर्जुन सिंह भी राजनीति के माहिर थे। वे इस्तीफा नहीं देने पर अड़ गए। लेकिन, आज उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया को लोग मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।

सिंधिया इंतजार करते रहे, वोरा बन गए सीएम
यह भी बताया जाता है कि आखिरी दौर में जब माधवराव भोपाल आ गए और सीएम बनने का इंतजार कर रहे थे, तो विवादों के बीच एक ऐसा समझौता हुआ, जिसके बाद मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इस वाकये के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी अर्जुन सिंह से बेहद खफा हो गए थे। इसके बाद अर्जुन के धुर विरोधी माने जाने वाले श्यामाचरण शुक्ल को पार्टी में लाया गया और मोतीलाल वोरा के बाद शुक्ल को सीएम बनाया गया। इसके बाद अर्जुन सिंह ने भी मध्यप्रदेश की राजनीति से किनारा कर लिया और केंद्र में चले गए।

दिग्विजय से नहीं बैठी पटरी
महाराजा सिंधिया और राघोगढ़ राजघराने से ताल्लुक रखने वाले दिग्विजय सिंह में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण कभी पटरी नहीं बैठी। 1993 की बात है जब दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने उस दौर में सिंधिया का नाम भी शीर्ष पर आ गया था, लेकिन रातो रात पांसे पलट गए और अर्जुन गुट ने दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया। उस समय दिग्विजय सिंह के राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह माने जाते थे। सिंधिया दूसरी बार भी सीएम बनने से चूक गए थे।

मां ने ही जिताया था लोकसभा का चुनाव
बात 1971 की है जब माधवराव 26 साल के थे। उस समय वे जनसंघ के समर्थन से लड़े थे। इसके बाद 1977 में माधवराव ने ग्वालियर से निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन उनका जीतना संभव नहीं था। लेकिन राजमाता को जनता से अपील करनी पड़ी, तब माधवराव चुनाव जीत सके। वे ऐसे अकेले प्रत्याशी थे जो 40वीं लोकसभा में निर्दलीय जीत कर गए थे। बाकी सभी जनसंघ की जीत पर गए थे।

तो संजय गांधी के साथ ही हो जाती मौत
माधवराव सिंधिया और संजय गांधी को एयरोप्लेन उड़ाने का बेहद शौक था। दोनों सफदरजंग हवाई पट्टी पर हवाई जहाज उड़ाने जाते थे। संजय के पास लाल रंग का नया जहाज पिट्सएस-2ए वापस मिल गया था। जनता पार्टी की सरकार ने इस विमान को जब्त कर लिया था। यह कम ही लोग जानते हैं कि माधवराव और संजय दोनों विमान उड़ाने के लिए दूसरे दिन सुबह जाने वाले थे। लेकिन, माधवराव की नींद नहीं खुली और संजय गांधी अकेले ही उड़ान भरने चले गए। संजय गांधी की यह आखिरी उड़ान थी। इसी विमान दुर्घटना में संजय गांधी की मौत हो गई थी।



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