रविवार, 6 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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अपराध, जासूसी और ईशनिंदा: मौत की सजा पाने वाली इन महिलाओं की कहानियाँ क्यों हैं चर्चा में?

दुनिया भर में जब किसी महिला को मौत की सज़ा सुनाई जाती है, तो यह अक्सर एक बड़ी बहस और गहरे सवालों को जन्म देती है। हाल ही में मिस्र की एक टीवी प्रस्तोता सारा खलीफा का मामला सामने आया है, जिसने एक बार…

अपराध, जासूसी और ईशनिंदा: मौत की सजा पाने वाली इन महिलाओं की कहानियाँ क्यों हैं चर्चा में?
(फोटो: IANS)

दुनिया भर में जब किसी महिला को मौत की सज़ा सुनाई जाती है, तो यह अक्सर एक बड़ी बहस और गहरे सवालों को जन्म देती है। हाल ही में मिस्र की एक टीवी प्रस्तोता सारा खलीफा का मामला सामने आया है, जिसने एक बार फिर उन ऐतिहासिक और चर्चित मामलों की याद दिला दी है, जहाँ महिलाएँ अपराध, अदालत और मृत्युदंड के केंद्र में रहीं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, खलीफा को ड्रग्स बनाने और तस्करी के एक संगठित आपराधिक मामले में 11 अन्य लोगों के साथ मौत की सज़ा सुनाई गई है।

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39 वर्षीय सारा खलीफा अपने टीवी शो ‘मिशन इंपॉसिबल’ के लिए जानी जाती थीं, जिसमें वह खुद अपराध और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उठाती थीं। जाँच एजेंसियों ने इस मामले में 750 किलोग्राम से अधिक नशीले पदार्थ और उन्हें बनाने की सामग्री बरामद करने का दावा किया है। हालाँकि, खलीफा ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है और उनके पास अभी फैसले के खिलाफ अपील करने का विकल्प मौजूद है।

जासूसी से लेकर सीरियल किलिंग तक

इतिहास में ऐसे कई मामले दर्ज हैं जहाँ महिलाओं को मौत की सज़ा दी गई। इनमें सबसे चर्चित नामों में से एक माता हारी का है, जिनका असली नाम मार्गरेथा जेला था। 20वीं सदी की शुरुआत में यूरोप की मशहूर डांसर रहीं माता हारी पर प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के लिए जासूसी करने का आरोप लगा। 1917 में फ्रांस की एक सैन्य अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और 15 अक्टूबर, 1917 को 41 साल की उम्र में फायरिंग स्क्वाड ने उन्हें मौत दे दी।

वहीं, अमेरिका में ‘डेथ रो ग्रैनी’ के नाम से जानी जाने वाली वेल्मा बारफील्ड को अपने मंगेतर की ज़हर देकर हत्या करने के जुर्म में 1978 में दोषी पाया गया। बाद में उन्होंने और भी हत्याएँ करने की बात कबूली। 2 नवंबर, 1984 को उन्हें घातक इंजेक्शन दिया गया, और वह 22 वर्षों में अमेरिका में मृत्युदंड पाने वाली पहली महिला बनीं। इसी तरह, फ्लोरिडा की सीरियल किलर ऐलीन वुर्नोस को कई पुरुषों की हत्या के लिए छह बार मौत की सज़ा सुनाई गई। 2002 में उन्हें भी घातक इंजेक्शन दिया गया।

जब पलट गया सज़ा-ए-मौत का फैसला

कुछ मामले ऐसे भी रहे जहाँ सज़ा सुनाए जाने के बाद फैसला पलट गया। पाकिस्तान की ईसाई महिला आसिया बीबी का मामला इसका एक बड़ा उदाहरण है। उन पर 2010 में ईशनिंदा का आरोप लगाकर मौत की सज़ा सुनाई गई थी। यह मामला इतना संवेदनशील था कि उनके समर्थक दो बड़े नेताओं, सलमान तासीर और शाहबाज़ भट्टी, की हत्या कर दी गई। करीब नौ साल जेल में बिताने के बाद, 31 अक्टूबर, 2018 को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया।

वर्तमान में जारी कानूनी लड़ाई

ईरान की कुर्द मानवाधिकार कार्यकर्ता पख्शान अजीजी का मामला आज भी दुनिया भर में चर्चा का विषय है। उन्हें जुलाई 2024 में ‘सशस्त्र विद्रोह’ के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई थी, जिसे जनवरी 2025 में ईरान के सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठनों ने उनकी सुनवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं और सज़ा पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। उनका मामला दिखाता है कि यह लड़ाई आज भी जारी है।

इनपुट: IANS

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