प्रेमी, पागल और कवि एक ही मिट्टी के बने होते हैं

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भगत सिंह वो नाम है जो आज़ादी की लड़ाई में युवाओं का सबसे बड़ा नेता बन कर उभरा. देश को अपनी प्रेमिका मानता था और एक दफे तो अपने साथी चंद्रशेखर आज़ाद से ही लड़ गया था. आज ही के दिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गयी थी.

भगत सिंह की ज़िन्दगी में क्रांति की ज्वाला बचपन से ही जल रही थी. तभी एक दफे भगत सिंह खेतों में ही बन्दूक बोना शुरू कर दिया था, और पूछने पर बताया कि जब बन्दूक उग जायेंगे तो उनसे ही अंग्रेजो को मार भगाऊंगा. जलियावाला बाग़ कांड के वक़्त भगत की उम्र मात्र 11 साल थी, लेकिन सैकड़ो निर्दोषों की मौत ने उसकी रूह को अन्दर तक हिला कर रख दिया, और आज़ाद भारत की लड़ाई में ये लड़का कूद पड़ा.

काकोरी कांड और सांडर्स वध के बाद अंग्रेजो के ज़हन में भगत का खौफ समां गया था और डर था कि अगर भगत को जेल से बाहर रक्खा गया तो शायद विद्रोह की स्थिति पैदा हो जाएगी. इसके बाद भगत सिंह को जेल में ही मुकदमे के चंगुल में फंसा कर फांसी की सजा दे दी गयी.

फांसी वाले दिन कि कहानी भी अलग ही है, भगत ने एक ख़त लिखा, जिसमें माँ से न रोने को कहा था. और 23 मार्च 1931 को सुखदेव और राजगुरु के साथ भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया. देश भगत सिंह की कुर्बानी को हमेशा याद रखेगा.

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालो की यही आखिर निशां होगा