Presidential Election: द्रौपदी मुर्मू या यशवंत सिन्हा…क्या राष्ट्रपति चुनाव के बाद टूट जाएगी महाविकास अघाड़ी?

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Presidential Election: द्रौपदी मुर्मू या यशवंत सिन्हा…क्या राष्ट्रपति चुनाव के बाद टूट जाएगी महाविकास अघाड़ी?

मुंबई: आगामी 18 जुलाई को देश के राष्ट्रपति पद (Presidential Election 2022) का चुनाव होना है जिसमें एनडीए (NDA) की तरफ से द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) को उम्मीदवार बनाया गया है। जबकि उनके विरोध में विपक्षी दलों द्वारा यशवंत सिन्हा (Yashwant Sinha) को उम्मीदवार बनाया गया है। महाराष्ट्र (Maharashtra) में फिलहाल शिवसेना (Shivsena) ऐसे मोड़ पर खड़ी है। जहां एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ कुआं है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) इस वक़्त असमंजस की स्थिति से गुजर रहे हैं। उसके सामने एक तरफ पार्टी को बचाने की जिम्मेदारी है तो दूसरी तरफ अगर वह मुर्मू को समर्थन देते हैं तो महाविकास अघाड़ी (Maha Vikas Aghadi) से निकलना पड़ सकता है। इस बारे में मंगलवार सुबह शिवसेना सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह इशारा दिया है कि शिवसेना, द्रौपदी मुर्मू को अपना समर्थन दे सकती है। दरअसल राउत ने आज सुबह कहा कि मुर्मू को समर्थन देने का मतलब बीजेपी को समर्थन देना नहीं है। आइये समझते हैं कि इस मामले में शिवसेना और उद्धव ठाकरे के पास क्या विकल्प हैं?

मुर्मू को समर्थन उद्धव की मजबूरी
महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में यह खबर भी आम है कि उद्धव ठाकरे द्वारा द्रौपदी मुर्मू का समर्थन एक राजनीतिक मजबूरी भी है। इस बारे में एनबीटी ऑनलाइन ने संविधान विशेषज्ञ डॉ. सुरेश माने से बातचीत की। उन्होंने बताया कि फिलहाल इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शिवसेना के तमाम सांसद यह चाहते हैं कि इस बार पार्टी एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को अपना समर्थन दे। इस बारे में लिखित और मौखिक रूप से सांसदों ने अपनी मांग उद्धव ठाकरे के सामने रखी है। उद्धव ठाकरे यह भी जानते हैं कि अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो बागी विधायकों की तरह उनके सांसद भी उन्हें धोखा दे सकते हैं। इसके अलावा राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी का व्हिप लागू नहीं होता। इसका सीधा मतलब यह है कि सांसद अपनी मर्जी के मुताबिक मतदान कर सकते हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे मौजूदा सियासी हालातों में सांसदों पर दबाव भी नहीं बना सकते। लिहाजा उनके लिए सांसदों की बात मानने वाला रास्ता ज्यादा मुफीद रहेगा।

महाविकास अघाड़ी से निकलेगी शिवसेना?
सुरेश माने ने बताया, माना जा रहा है कि द्रौपदी मुर्मू को समर्थन देने के बाद शिवसेना महाविकास अघाड़ी से निकल सकती है। इसके पीछे भी कई वजहें हैं। जिस दिन उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उसके कुछ घंटों पहले ही उन्होंने औरंगाबाद समेत तीन शहरों का नाम बदला था। ठाकरे ने औरंगाबाद को संभाजीनगर का नाम दिया था। इस बात का विरोध एमवीए में शामिल कांग्रेस ने भी किया था। इसके अलावा खुद एनडीए के संयोजक शरद पवार ने यह कहा था कि उन्हें इस बात की जानकारी आदेश पारित करने के बाद दी गई। औरंगाबाद शहर का नाम बदलना भी एमवीए में मतभेद का एक बड़ा कारण है। दूसरी वजह यह भी है कि इस वक़्त उद्धव ठाकरे के सामने महाविकास अघाड़ी में बने रहने से ज्यादा जरूरी अपनी हर दिन बिखरती हुई पार्टी को बचाना है।

सुरेश माने ने यह भी बताया कि उद्धव ठाकरे की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी बन सकती है कि एनडीए की बैठक में उद्धव ठाकरे के विरोधी गुट के एकनाथ शिंदे को भी बुलाया गया है। इस बात पर शिवसेना अपना एतराज जता सकती है। इसका मतलब यह भी होता है कि एक तरह से शिवसेना को कम आंकने की कोशिश की जा रही है। जबकि अभी तक इस बात का फैसला नहीं हुआ है कि शिवसेना वाकई में किसकी है।

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पवार को भी चाहिए शिवसेना का साथ?
सुरेश माने के मुताबिक़ मुर्मू को समर्थन देना देने से उद्धव ठाकरे से शरद पवार नाराज भी हो सकते हैं। इस बात की भी संभावना है कि उद्धव ठाकरे आने वाले दिनों में महाविकास अघाड़ी सरकार से निकल भी जाएं। इस बात की भी उतनी ही संभावना है कि दोनों ही पार्टियां फिर से एक-दूसरे के साथ हाथ मिला लें। क्योंकि दोनों ही पार्टियों की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरी है। यह भी हो सकता है कि शरद पवार यह मान लें कि केंद्र में शिवसेना जिसको चाहे अपना समर्थन दे सकती है। लेकिन राज्य में वह एनसीपी के साथ रहे। क्योंकि शरद पवार भी इस बात को भलीभांति जानते हैं कि अकेले दम पर एनसीपी भी सत्ता में वापसी नहीं कर सकती। उन्हें शिवसेना और कांग्रेस का साथ लेना ही पड़ेगा। वहीं शिवसेना भी यह स्पष्ट कर चुकी है कि मुर्मू को समर्थन देने का मतलब बीजेपी को समर्थन देना बिल्कुल नहीं है।

उद्धव पर सांसदों का दबाव
महाराष्ट्र के सियासी हालात पर नवभारत टाइम्स ऑनलाइन ने वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार सचिन परब से भी बातचीत की। उन्होंने बताया कि इस समय एनडीए के उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को लेकर शिवसेना सांसदों का उद्धव ठाकरे पर जबरदस्त दबाव है। ऐसे में न चाहते हुए भी उन्हें इन सांसदों की बात को मानना पड़ेगा और मुर्मू को समर्थन देना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा करने के बाद भी शिवसेना के सांसद उनके साथ रहेंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। लेकिन उद्धव ठाकरे तब यह जरूर कह सकेंगे कि हां उन्होंने अपने पदाधिकारियों और नेताओं की बात मानी। वह इस बात का भी उदाहरण दे सकेंगे कि पार्टी ने हमेशा अच्छे और सच्चे लोगों का ही चुनाव में साथ दिया है। वह बीते राष्ट्रपति चुनावों का उदाहरण दे सकते हैं। जिसमें उन्होंने प्रणब मुखर्जी और प्रतिभा पाटील को अपना समर्थन दिया था।

परब ने कहा कि उद्धव के इस फैसले से महाविकास अघाड़ी के शरद पवार और कांग्रेस नाराज हो सकते हैं। लेकिन उद्धव ठाकरे इनको अपनी तरफ से मनाने की पूरी कोशिश करेंगे। क्योंकि मौजूदा सियासी हालात में कांग्रेस और एनसीपी दोनों ही दल उद्धव ठाकरे की मजबूर समझते हैं। वहीं, मुर्मू का समर्थन करके उद्धव ठाकरे ने अपने सांसदों को यह मौका नहीं दिया है कि वह पार्टी पर हिंदुत्व विरोधी होने का आरोप लगाकर अलग हो सकें। बावजूद इसके अभी भी शिवसेना से बगावत का खतरा टला नहीं है।

मुर्मू को समर्थन का संकेत
आज प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से संजय राउत ने मुर्मू को समर्थन देने के संदर्भ में बात की है। उससे इस बात का संकेत मिलता है कि शिवसेना राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू को अपना समर्थन दे सकती है। हालांकि इसका औपचारिक ऐलान अभी होना बाकी है। संजय राउत ने यह भी कहा कि शिवसेना इसके पहले भी गठबंधन के उम्मीदवार के विपरीत जाकर मतदान कर चुकी है। इसका उदाहरण प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी हैं। इन दोनों की उम्मीदवारी के समय शिवसेना ने एनडीए के खिलाफ जाकर मतदान किया था। राउत ने कहा कि शिवसेना किसी के दबाव में फैसला नहीं लेती है।

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