Parle-G Biscuits : पारले जी में ऐसा क्या है कि 38,000 करोड़ का मालिक भी चाय में डुबोकर खा रहा, जानिए इस बिस्किट की कहानी

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Parle-G Biscuits : पारले जी में ऐसा क्या है कि 38,000 करोड़ का मालिक भी चाय में डुबोकर खा रहा, जानिए इस बिस्किट की कहानी

नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo) के को-फाउंडर (Co-founder) और एमडी राहुल भाटिया (Rahul Bhatia) की एक फोटो काफी वायरल हो रही है। इस फोटो में भाटिया फ्लाइट में बैठे हुए हैं। खास बात यह है कि वे फ्लाइट में बैठकर 5 रुपये में मिलने वाला पारले जी का बिस्किट (Parle-G Biscuits) खा रहे हैं। उनके एक हाथ में चाय का कप है, तो दूसरे हाथ में पारले जी का बिस्किट। चाय के कप में पारले जी का बिस्किट डुबाकर खाते भाटिया की फोटो को लोग काफी पसंद कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि चाहे अमीर हो या गरीब, पारले जी बिस्किट किसी का भी फेवरेट हो सकता है। फोर्ब्स के अनुसार, राहुल भाटिया और उनके पिता कपिल भाटिया की रियल टाइम नेटवर्थ 4.7 अरब डॉलर (38,000 करोड़ रुपये) है।

कोरोना काल में बना था पारले जी की बिक्री का रेकॉर्ड

पारले जी एक ऐसा बिस्किट है, जो अधिकतर लोगों को पसंद आता है। कोरोना काल में इस बिस्किट की बिक्री के रेकॉर्ड टूट गए थे। साल 2020 में लॉकडाउन के समय पारले जी बिस्किट की जबरदस्त बिक्री हुई थी। यह बिक्री इतनी अधिक थी कि, 82 वर्षों का रेकॉर्ड टूट गया था। पारले जी के 5 रुपये के पैकेट की देश में जमकर बिक्री होती है।

हाउस ऑफ पारले थी ओरिजिनल कंपनी
पारले प्रॉडक्ट्स की ओरिजिनल कंपनी ‘हाउस ऑफ पारले’ (House of Parle) थी, जिसकी शुरुआत साल 1929 में हुई थी। हाउस ऑफ पारले को मोहनलाल दयाल ने शुरू किया था। बाद में हाउस ऑफ पारले तीन अलग-अलग कंपनियों में बंट गई। इन कंपनियों का स्वामित्व चौहान परिवार के लोगों के पास ही रहा। ये तीन कंपनियां हैं, पारले प्रॉडक्ट्स, पारले एग्रो और पारले बिसलेरी। पारले पहली भारतीय फूड कंपनी है, जिसे लगातार 4 सालों तक मॉन्डे सिलेक्शन अवॉर्ड्स मिले। कंपनी बिस्किट और कन्फैक्शनरी की आज दिग्गज मैन्युफैक्चरर कंपनी है। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो पारले ने एक ऐड लॉन्च किया था। यह ऐड दर्शाता था कि पारले ग्लूकोज बिस्किट, ब्रिटिश बिस्किट का भारतीय विकल्प है।

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सिर्फ 12 लोगों से शुरू हुई फैक्ट्री
मोहनलाल दयाल ने कन्फैक्शनरी बिजनेस में उतरने का फैसला किया। मोहनलाल, कन्फैक्शनरी मेकिंग की कला को सीखने के लिए जर्मनी भी गए थे। जब वे लौटे थे, तो उनके साथ जरूरी मशीनरी भी थी। इस मशीनरी को वह 60,000 रुपये में इंपोर्ट करके लाए थे। कंपनी की कन्फैक्शनरी बनाने की पहली फैक्ट्री 1929 में केवल 12 लोगों से शुरू हुई थी। यह एक पुरानी फैक्ट्री थी, जिसे मोहनलाल ने खरीदकर रिफर्बिश किया था। 12 लोगों में फैमिली मेंबर ही थे, जिनमें से अपनी क्षमता के अनुरूप कोई इंजीनियर था, कोई मैनेजर था और कोई कन्फैक्शनरी मेकर था। यह मुंबले के विले पार्ले में थी। इसी इलाके के नाम पर कंपनी का नाम पारले रखा गया। कंपनी का पहला प्रॉडक्ट एक ऑरेंज कैंडी थी।
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पारले जी में क्या है जी का मतलब

पारले ने साल 1938 में अपना पहला बिस्किट पारले ग्लूको लॉन्च किया। पारले ग्लूको बिस्किट लगातार 12 सालों तक भारत में बेस्ट सेलिंग बिस्किट रहा। यह बिस्किट बाद में पारले जी के नाम से जाना जाने लगा। कंपनी ने 1981-85 के बीच बिस्किट का नाम बदला। पारले जी में ‘जी’ का मतलब है ग्लूकोज। 2001 में पहली बार पारले-जी कागज की पैकिंग से बाहर निकलकर नई प्लास्टिक रैपर पैकिंग में आया। पारले की ग्लोबल बिस्किट मार्केट में साल 2020 में हिस्सेदारी 50 फीसदी थी।

भारत की पहली मैंगो कैंडी

साल 1972 में कंपनी अपना स्वीट व सॉल्टी बिस्किट क्रैकजैक लेकर आई। साल 1983 में पारले ने चॉकलेटी मेलोडी को लॉन्च किया। इसके बाद साल 1986 में मैंगो बाइट को लेकर आई। मैंगो बाइट भारत की पहली मैंगो कैंडी थी। साल 1996 में पारले ने अपने पोर्टफोलियो को और विस्तार देते हुए हाइड एंड सीक चॉको चिप कुकी लॉन्च किया। 1991-2000 के दौरान कंपनी भारत के बाहर भी ग्रो करने लगी। इसके बाद साल 2000 में पारले ने 20-20 बटर कुकीज और मैजिक्स को लॉन्च किया। साल 2011 में पारले प्लैटिना मार्केट में आया।

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