पारसनाथ पहाड़ी पर आदिवासी समाज ने तेज की दावेदारी, 'मरांगबुरु' के अधिकार बहाली का प्रस्ताव पारित
झारखंड के गिरिडीह स्थित पारसनाथ पहाड़ी पर संताल आदिवासी समाज ने अपने पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की मांग को और मुखर कर दिया है। पहाड़ी की तलहटी मधुबन में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में…
झारखंड के गिरिडीह स्थित पारसनाथ पहाड़ी पर संताल आदिवासी समाज ने अपने पारंपरिक और धार्मिक अधिकारों की मांग को और मुखर कर दिया है। पहाड़ी की तलहटी मधुबन में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इसे 'मरांगबुरु धोरोमगढ़' के रूप में सर्वोच्च तीर्थस्थल घोषित करने और इसके पारंपरिक अधिकारों की सुरक्षा का प्रस्ताव पारित किया गया है।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, 'मरांगबुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा' द्वारा आयोजित इस महासम्मेलन में देश-विदेश से प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और छत्तीसगढ़ के अलावा नेपाल और बांग्लादेश से भी लोग शामिल हुए। गुरुवार को हुए समापन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी और गांडेय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन के साथ उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री ने दिया एकजुटता का संदेश
सम्मेलन को संथाली और हिंदी में संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि मरांगबुरु केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक है। उन्होंने अपनी धरोहर और अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को एकजुट रहने का आह्वान किया। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा, "आदिवासियों को संविधान के तहत कई अधिकार प्राप्त हैं और राज्य सरकार उनके अधिकारों, संस्कृति तथा परंपराओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।" कल्पना सोरेन ने भी अपने संबोधन में मरांगबुरु के महत्व पर प्रकाश डाला।
सम्मेलन में पारित अन्य प्रमुख मांगें
आयोजकों और प्रतिनिधियों ने मरांगबुरु के संरक्षण के लिए एकजुट होकर आवाज उठाने पर जोर दिया। सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में पारसनाथ पहाड़ी को अनादि काल से संताल आदिवासियों का पवित्र धार्मिक स्थल बताया गया। इसमें पहाड़ी पर किसी भी तरह के धार्मिक या सांस्कृतिक अतिक्रमण को रोकने और दिशोम मांझीथान जैसे पारंपरिक पूजा स्थलों का मूल स्वरूप बनाए रखने की मांग की गई। इसके अलावा, प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से आगामी जनगणना में अलग 'आदिवासी सरना धर्म कोड' शामिल करने की भी मांग की। संथाली भाषा और ओलचिकी लिपि को शिक्षा व रोजगार से जोड़ने तथा पारंपरिक मांझी-परगना स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने का भी प्रस्ताव पारित हुआ।
पहाड़ी पर दो समुदायों की आस्था
उल्लेखनीय है कि पारसनाथ पहाड़ी को लेकर दो समुदायों की गहरी धार्मिक आस्थाएं जुड़ी हैं। जहां संताल आदिवासी इसे 'मरांगबURU' के रूप में अपना प्रमुख धार्मिक स्थल मानते हैं, वहीं जैन समाज इसे 'सम्मेद शिखरजी' के रूप में पूजता है। जैन मान्यता के अनुसार, उनके 24 में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया था। इन अलग-अलग मान्यताओं और दावों के कारण यह क्षेत्र धार्मिक स्वरूप से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
इनपुट: IANS



