Opinion: बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को सीएम क्यों बनाया?

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Opinion: बीजेपी ने एकनाथ शिंदे को सीएम क्यों बनाया?

मुंबई: बीजेपी ने शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे को सीएम बनाया तो महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल आ गया। हर किसी को यही अंदाज़ा था कि वो बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे, लेकिन इस बात की भनक किसी को नहीं थी कि वो इस नई सरकार के मुखिया हो सकते हैं। ऐसे में सवाल ये है कि महाराष्ट्र विधानसभा 100 से ज़्यादा सीटों वाली बीजेपी ने चालीस एक विधायकों वाले बागी गुट के नेता को सीएम क्यों बनाया?

यूं तो इस फैसले के पीछे बहुत से कारण हो सकते हैं, मगर मोटे तौर पर हम इसे यूं समझ सकते हैं।
एकनाथ शिंदे मराठा हैं। महाराष्ट्र में 31 फीसदी मराठा वोटर हैं। बीजेपी काफी वक्त से किसी मराठा नेता की तलाश में थी। देवेंद्र फडणवीस को सीएम बनाया जाता तो शिवसेना कह सकती थी कि मराठा के ऊपर एक ब्राह्मण को तवज्जो दी गई। वो एकनाथ से पूछ सकती थी कि जब तुम्हें आम मंत्री ही बने रहना था तो तुमने हमसे बगावत क्यों की। पिछले कई दिनों से संजय राउत जैसे दावा कर रहे थे कि बीजेपी किसी हाल में एकनाथ शिंदे को सीएम नहीं बनाएगी।

ऐसे में एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाते ही बीजेपी ने शिवसेना के विरोध की सारी सियासत की हवा निकाल दी। अब शिवसेना किस मुंह से इस नई सरकार और इसके मुख्यमंत्री की आलोचना करेगी। वो मुख्यमंत्री जो शिवसैनिक भी है और मराठा भी। वो शिवसैनिक जिसे आप सीएम बनाने का भरोसा तो देते रहे, मगर बनाया नहीं। टेनिस की ज़बान में कहें तो इस एक फैसले ने शिवसेना के विरोध की राजनीति का गेम सेट मैच कर दिया।

एकनाथ शिंदे के सीएम बनाए जाने पर लोग जितना हैरान हुए उससे ही ज़्यादा उन्हें इस बात पर हैरानी हुई कि दो बार के सीएम फडणवीस डेप्युटी सीएम कैसे बन गए? राजनीति में कोई भी सीएम यूं डेप्युटी सीएम बनकर अपना डिमोशन क्यों करवाएगा? तो इसका सीधा जवाब है कि केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व में ज़्यादा मज़बूत कौन है?

जब सचिन पायलट ने राजस्थान में बगावत की तो बीजेपी चाहकर भी उनको अपने साथ इसलिए नहीं ला पाई, क्योंकि वसुंधरा सचिन पायलट के खिलाफ थीं। बीजेपी का आलाकमान भी राजस्थान में वसुंधरा की ताकत से वाकिफ था। वो उससे पहले भी कई बार इस ताकत को आज़मा चुका था। और जब वो वसुंधरा को नहीं झुका पाया और उसे लगा कि सचिन पायलट को साथ लाने की ज़िद्द उसे भारी पड़ सकती है तो उसे राजस्थान में तख्तापलट का प्लान टालना पड़ा, लेकिन वसुंधरा की तुलना में महाराष्ट्र में फडणवीस वैसे ताकतवर नहीं हैं और न ही वैसे अपरिहार्य। महाराष्ट्र के केस में पार्टी की Central Leadership को लगा कि शिंदे को सीएम बनाकर वो मराठा वोटों को भी साध लेगी और शिवसेना के किसी Counter Attack को भी ध्वस्त कर देगी।

वैसे भी फडणवीस अभी 50 के हैं। उम्र उनके पक्ष में हैं। उनके पास दोबारा सीएम बनने के लिए बहुत उम्र पड़ी है। इसलिए आलाकमान ने जब उन्हें सारी स्थिति समझाई होगी तो वो आखिरकार मान गए होंगे।

इस सबके बीच ये समझ लेना भी ज़रूरी है कि एकनाथ शिंदे को सीएम बनाना बीजेपी के लिए कोई Stop gap arrangement है। ऐसा नहीं लगता कि ये सिर्फ अगले ढाई साल की रणनीति है। लगता यही है कि शिंदे को लेकर बीजेपी की बड़ी और दूरगामी रणनीति है, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि आज वो एक मराठा को मुख्यमंत्री बनाकर इस पर वाहवाही बटोर ले और दो साल बाद कहें कि नहीं, हम शिंदे को हटाकर फडणवीस को अपना सीएम फेस बना रहे हैं। अगर वो ऐसा करेगी, तो आज इस कदम से उसे जितना फायदा नहीं होगा उससे कहीं ज़्यादा कल नुकसान उठाना पड़ेगा।

जिस तरह पंजाब में दलित सिख चन्नी को सीएम बनाने के बाद कांग्रेस ने इस बात को खूब प्रचारित किया कि राज्य में 35 फीसदी आबादी दलितों की है। हमने एक दलित सिख को सीएम बनाकर दलित सिखों का सम्मान बढ़ाया है।

अब हुआ ये कि इस प्रचार के बाद चन्नी को ही सीएम फेस घोषित करना कांग्रेस की मजबूरी हो गया। सिद्धू चाहते थे कि उन्हें यानी एक जाट सिख को सीएम फेस बनाया जाए, लेकिन ऐसा करना पार्टी के लिए आत्मघाती हो सकता था। दलित सिख इससे अपमानित महसूस कर सकते थे और इसलिए सिद्धू के लाख दबाव के बावजूद कांग्रेस को चन्नी को सीएम फेस बनाना पड़ा।

इसलिए मुझे लगता है कि शिंदे को लेकर बीजेपी का कोई लंबा गेम प्लान है। वो क्या गेम प्लान है, ये जानने के लिए अभी थोड़ा इंतजार करना होगा। उससे पहले हमें ये देखना होगा कि क्या शिंदे खेमा खुद को असली शिवसेना घोषित कर पाता है? नहीं करता तो क्या एकनाथ शिंदे गुट अलग पार्टी बनाकर आगे की राजनीति करेगा? क्या ये एक गुट अगले चुनावों में बीजेपी के साथ विलय कर लेगा?

जो भी है लेकिन इतना तय है कि एकनाथ शिंदे को सीएम बनाकर बीजेपी ने ऐसा राजनीतिक दांव चल दिया है जिसका भावनात्मक असर महाराष्ट्र की सियासत में लंबे वक्त तक देखने को मिलेगा।

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