शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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एक देश-एक चुनाव: क्या इससे क्षेत्रीय दलों को होगा फायदा? समिति अध्यक्ष ने चिंताओं पर दिया जवाब

देश में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की महत्वाकांक्षी योजना 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर चर्चा तेज हो गई है। इस प्रस्ताव से जुड़ी एक बड़ी चिंता यह है कि कहीं इससे क्षेत्रीय दलों की अहमिय…

एक देश-एक चुनाव: क्या इससे क्षेत्रीय दलों को होगा फायदा? समिति अध्यक्ष ने चिंताओं पर दिया जवाब
(फोटो: IANS)

देश में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की महत्वाकांक्षी योजना 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर चर्चा तेज हो गई है। इस प्रस्ताव से जुड़ी एक बड़ी चिंता यह है कि कहीं इससे क्षेत्रीय दलों की अहमियत कम न हो जाए और देश का संघीय ढांचा कमजोर न पड़ जाए। इन्हीं आशंकाओं पर 'वन नेशन, वन चुनाव' समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने विस्तार से अपनी बात रखी है।

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समाचार एजेंसी IANS के साथ बातचीत में चौधरी ने इन चिंताओं को संबोधित करते हुए कहा कि विशेषज्ञों ने 1967 से लेकर 2024 तक के चुनावी इतिहास का विश्लेषण किया है। उनके मुताबिक, जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग होते हैं, तो केंद्र में मौजूद मजबूत सत्ताधारी दल अक्सर राज्यों के चुनावों में भी बड़ी जीत दर्ज कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि इससे क्षेत्रीय दलों के लिए अपनी स्थिति मजबूत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

समिति का कामकाज और विचार-विमर्श

इस योजना को लागू करने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। पी.पी. चौधरी ने बताया कि यह विधेयक लोकसभा द्वारा 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति को भेजा जा चुका है। समिति अब तक दिल्ली में 25 बैठकें कर चुकी है और लगभग 10 राज्यों का दौरा भी किया है। इन दौरों के दौरान उद्योग जगत, नागरिक समाज संगठनों, राजनीतिक दलों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श हुआ।

चौधरी के अनुसार, समिति ने राज्यों के मुख्य सचिवों, विभिन्न विभागों के सचिवों के अलावा मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों तथा विधानसभा अध्यक्षों से भी मुलाकात की। उन्होंने कहा, "इन सभी जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और संगठनों ने अपने अनुभव के आधार पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।"

ऐतिहासिक संदर्भ और संवैधानिक मंशा

एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था भारत के लिए नई नहीं है। पी.पी. चौधरी ने याद दिलाया कि 1952 से 1967 के बीच देश में चार आम चुनाव लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ ही हुए थे। उन्होंने बताया कि उस समय चुनावी चक्र को बनाए रखने के लिए आठ से नौ राज्यों की विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग कर दिया गया था, ताकि वे लोकसभा के साथ चुनाव में जा सकें।

उन्होंने कहा, "इससे स्पष्ट होता है कि उस समय संविधान निर्माताओं और संविधान सभा के सदस्यों की सोच में भी एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था का विचार शामिल था।" चौधरी के अनुसार, यदि संविधान की मूल भावना और उद्देश्य को समझा जाए, तो वह 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की अवधारणा की ओर ही संकेत करती है।

समिति अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य एक ऐसी चुनावी व्यवस्था तैयार करना है, जिससे देश में चुनाव प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो और राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती मिले। इसके लिए समिति सभी पक्षों से मिले सुझावों का गहन अध्ययन कर रही है।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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