बीजेपी पर आगामी चुनाव में दबाव बढ़ाने के लिए, आज ये दो बड़े नेता करने जा रहे हैं मुलाकात

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बिहार: बिहार में चुनावी रण का सिलसिला काफी लंबे समय से चलता आ रहा है. राजनीतिक दल 2019 लोकसभा चुनाव के मोड़ में आ गए है. अब तो चुनाव में अधिक बहुमत से जीतने के लिए सभी पार्टियों रणनीति भी चलती नजर आ रही है. आए दिन कोई न कोई नेता बैठकों और पार्टी प्रमुख से मिलता नजर आ रहा है. आपको बता दें कि बिहार में लोकसभा की कुल चालीस सीटें है. पिछले साल के लोकसभा चुनाव में इन 40 सीटें में से एनडीए को कुल 31 सीटों में जीत दर्ज हुई थी. एनडीए की 31 सीटों में बीजेपी को 22, लोजपा को 6 और रालोसपा को 3 सीटों पर जीत मिली थी. उस दौरान चुनावी दंगल में नीतीश की जेडीयू अकेली चुनावी मैदान में उतरी थी, जिस वजह से वह महज 2 सीटें ही हासिल कर पाई.

आज नीतीश कुमार और रामविलास पासवान की मुलाकात

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी में अपना दबदबा बनाने के लिए आज रामविलास पासवान से मुलाकात करेंगे. इस मुलाकात का मतलब बीजेपी के लिए परेशानी और पासवान को अपने पाले में खड़े करने की कोशिश से है. कल यानी 8 जुलाई को जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है. इस बैठक से पहले ही नीतीश अपनी रणनीति के तहत पासवान से मुलाकात कर उनको अपनी पार्टी के संग जोड़ने की हर मुमकिन कोशिश जरुर करेंगे.

जानकारी के अनुसार, इस बैठक में 12 जुलाई से मुलाकात के दौरान सीट बंटवारे को लेकर भाजपा पार्टी में कैसे दबाव बनाया जाया इसकी प्लानिंग तय की जा सकती है. ये ही नहीं दूसरी तरफ रामविलास पासवान 2024 तक पीएम की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी के काबिज रहने की भविष्यवाणी भी कर रहे हैं. बता दें कि 2013 में नीतीश ने दिल्ली में ही जेडीयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पीएम मोदी के खिलाफ बागवत करते हुए जंग का ऐलान किया था. ऐसे में बस अब सभी पार्टियों की नजर दिल्ली में हो रहे जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर ही टिक हुई है. इस बैठक के दौरान नीतीश कुमार के भाषण के तहत उनके भविष्य के सियासी फैसलों से भी पर्दा उठ जाएगा.

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2014 से 2018 तक के सालों में सियासत में काफी बदलाव

बता दें कि 2014 से 2018 तक के सालों में सियासत में काफी बदलाव देखने को मिला है. जहां विपक्षी पार्टियों को अपना वजूद बचाने की चिंता सताने लगी है क्योंकि बीजेपी के विधानसभा चुनावों में बढ़ते प्रभाव का ही यह नतीजा है. तो वहीं सहयोगी दल भी पिछले चार सालों से बीजेपी के साथ उनके उतरा-चड़ाव के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अपने फैसलों पर पुनर्विचार कर सकता है. लोकसभा चुनाव के समीप आने से पहले ही एनडीए में शामिल कुछ भाजपा के कई सहयोगी धीरे-धीरे कर अपना साथ छोड़ते जा रहें है. वहीं इस बार शिवसेना ने भी आगामी चुनाव में अकेले लड़ने का फैसला करते हुए एनडीए की मुश्किलें और अधिक बढ़ दी है.

कई मुद्दों को उजागार कर बीजेपी में दबाव बना रहा है जेडीयू

अब तक बिहार में जेडीयू ने बीजेपी में दबाव बनाने का कोई मौका अपने हाथों से जाने नहीं दिया है. चाहे वो बिहार को एक विशेष दर्जे की मांग हो या असम नागरिकता, किसानों के मुद्दों हो या फिर महंगाई हो और यह फिर पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम. इन सभी मुद्दों को हथियार बनाते हुए जेडीयू ने भाजपा से अलग हट कर स्टैंड लिया है. कुछ समय पहले दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्ज की मांग को लेकर जेडीयू ने आप पार्टी द्वारा किए गए आंदोलन का समर्थन भी किया था. इस सब चीजों से यह तो साफ रूप से तय है कि जेडीयू लोकसभा चुनावों में अपने हिस्से की सीटों की संख्या और सीटों के नामों को तय करने में अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहती है.

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