Nitish Kumar: कुढ़नी में सात दलों पर भारी पड़ी बीजेपी, नेक टु नेक फाइट में ‘बेचारा’ हो गए नीतीश कुमार!

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Nitish Kumar: कुढ़नी में सात दलों पर भारी पड़ी बीजेपी, नेक टु नेक फाइट में ‘बेचारा’ हो गए नीतीश कुमार!

पटना: कुढ़नी विधानसभा उप चुनाव में भाजपा का जीतना कई मायने में चुनावी समीकरण को आगामी चुनाव के लिए पुष्ट करने जैसा है। एक तो यह कि भाजपा ने यह साबित कर दिया कि अकेले दम भाजपा सात दलों के गठबंधन से सामना कर सकती है। इसके साथ ही राजद और जदयू के अलावा अन्य दलों के साथ महागंठबंधन को जनता ने अपनी स्वीकृति नहीं दी है। दूसरा यह कि मोकामा और गोपालगंज में नीतीश कुमार के वोट बैंक में जो बिखराव देखा गया था, वह कुढ़नी में भी दिखा पर कुछ कम। यादव के साथ खुलकर अन्य पिछड़ा वर्ग जदयू के उम्मीदवार के पक्ष में नहीं दिखे। हालांकि यह निर्णय तब आ पाया है जब भाजपा अपने आधार वोट बैंक को एकत्रित करने में कामयाब हुई है। यही वजह भी है कि भाजपा ने नेक टु नेक फाइट को अंजाम देते हुए जीत हासिल की है।

भाजपा के जीत के मायने

भाजपा के साथ आधार वोट को समेटने की चुनौती तो उसी दिन से शुरू हो गई, जब भाजपा ने अपने पुराने उम्मीदवार केदार गुप्ता पर भरोसा किया। दरअसल, बोचहां उपचुनाव के बाद विधानसभा में भूमिहार और वैश्य के बीच जो मतभेद हुए, वह एक हद तक दूर नहीं हो सका था। लेकिन कुढ़नी विधानसभा चुनाव में भाजपा नेताओं ने इस दूरी को पाट डालने का संकेत जो दिया वह चुनाव परिणाम से झलकता भी है। वीआईपी ने भूमिहार जाति से आने वाले नीलाभ कुमार को टिकट दे दिया, पर वे भूमिहार और मल्लाह का ज्यादा वोट नहीं पा सके। अधिकांश वोट भाजपा के उम्मीदवार की तरफ शिफ्ट किया। यह भी भाजपा को प्लस कर गया। जदयू उम्मीदवार मनोज कुशवाहा पूरी तरह से कुशवाहा वोट प्राप्त नहीं कर सके। वहां भाजपा सेंधमारी करने में सफल हुई।

चिराग पासवान और भाजपा

इस चुनाव में पूरी तरह से दलित मतों की गोलबंदी हुई तो चिराग पासवान भी इसके एक किरदार हैं। इस बार चिराग पासवान की मदद वैसी मदद साबित हुई जो जीत की कहानी लिख सके। यह बात तो प्रचार के दौरान नीतीश कुमार की जनसभाओं में पासवान का आक्रामक विरोध से भी पता चला था। भाजपा ने इस आक्रामकता को बूथ तक लाने में सफल रही।

कुछ चूक तो हुई

कुढ़नी विधानसभा उप चुनाव में रोचकता की नींव तो उसी दिन रखी जा रही थी, जिस दिन सीएम नीतीश कुमार ने डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव के साथ मिल कर प्रचार किया। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव का एक साथ आना एमवाई समीकरण को दुरुस्त किया। परंतु वह समीकरण आक्रामकता के साथ बूथों तक नहीं पहुंच पाया। नीतीश कुमार ने एक हद तक अन्य पिछड़ी जातियां के साथ अत्यंत पिछड़ी जातियों के भीतर जो कन्फ्यूजन थे, उसे दूर किया। पर शायद इतना काफी नहीं था। अन्य पिछड़ा मत भी जदयू उम्मीदवार के साथ विभाजित रूप में गया। यह सब काफी नहीं थे, शायद जदयू की जीत के लिए।

एक हद तक उम्मीदवार मनोज कुशवाहा का कड़ा स्वभाव भी हार के लिए हकदार है। उस पर शिक्षक का मुद्दा, बीपीएससी का मुद्दा भी सरकार के विरुद्ध गया। बहरहाल, भाजपा ने 7 दलों के गंठबंधन वाली सरकार के विरुद्ध काफी बेहतर प्रदर्शन किया है और जीत कर आगामी विधानसभा के लिए महागंठबंधन की झोली में जीत के समीकरण का एक नमूना डाल अकेले दम पर कड़ी चुनौती का आगाज भी कर डाला।

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