Nirva Cheetah Missing Story: एक्सपर्ट्स, डॉग स्कॉयड, हाथी, ड्रोन, हेलीकॉप्टर और कैमरा-ट्रैप…एकदम फिल्मी है 22 दिन बाद मिली ‘निर्वा’ की कहानी

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Nirva Cheetah Missing Story: एक्सपर्ट्स, डॉग स्कॉयड, हाथी, ड्रोन, हेलीकॉप्टर और कैमरा-ट्रैप…एकदम फिल्मी है 22 दिन बाद मिली ‘निर्वा’ की कहानी

Nirva Cheetah Missing Story: एक्सपर्ट्स, डॉग स्कॉयड, हाथी, ड्रोन, हेलीकॉप्टर और कैमरा-ट्रैप…एकदम फिल्मी है 22 दिन बाद मिली ‘निर्वा’ की कहानी

श्योपुर। कई दिनों की प्लानिंग, ट्रैकिंग और कई टीमों के मिले-जुले प्रयासों के बाद आखिरकार फीमेल चीता ‘निर्वा’ को पकड़ लिया गया। ‘निर्वा’ कूनो नेशनल पार्क में लगभग 20 दिन से लापता थी। एक्सपर्ट्स की टीम ने आखिरकार उसका पता लगा लिया और उसे बचा लिया। इस ऑपरेशन के बारे में कूनो नेशनल पार्क के अधिकारियों द्वारा जारी एक अखबार में लिखा गया है। इस अखबार में चीता प्रोजेक्ट के दौरान आने वाली चुनौतियों के बारे में लिखा जाता है।
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60 दिन क्वारंटाइन बोमा (क्यूबी) में और लगभग 40 दिन एसआरबी में बिताने के बाद 28 मई को निर्वा को सॉफ्ट रिलीज किया गया था। इस मादा चीता को कूनो नेशनल पार्क के जंगल में छोड़ा गया था। सैटेलाइट और वेरी हाई फ़्रीक्वेंसी (वीएचएफ) ट्रैकिंग वाला कॉलर पहने हुए, वह पार्क की सीमाओं तक जा सकती थी।

सैटेलाइट पर निर्भर थे एक्सपर्ट्स

लेकिन रिहाई के कुछ ही समय बाद, वीएचएफ सिग्नल ने काम करना बंद कर दिया, जिससे कूनो के अधिकारी चिंता में आ गए। वीएचएफ सिग्नल से हो रही रेगुलर निगरानी से उलट, अधिकारी निर्वा की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए पूरी तरह से सैटेलाइट डेटा पर निर्भर हो गए। यहां परेशानी यह थी कि सैटेलाइट डेटा आम ट्रैकिंग उपकरणों की अपेक्षा देरी से सिग्नल देता है, जिससे टीम के लिए ‘निर्वा’ की रियल टाइम निगरानी करना मुश्किल हो रहा था।

निरवा का पता लगाने के लिए, इफेक्टिव ट्रैकिंग और कॉलर की बैटरी लाइफ को बचाते हुए टीम ने सैटेलाइट डेटा अपडेट के गैप को दो घंटे तक कम कर दिया। इससे निरवा की ट्रैकिंग में लगने वाला समय थोड़ा सा कम हुआ। इस गैप के बाद भी एक्सपर्ट्स ने अपनी कोशिशों से निर्वा की गतिविधियों को ट्रैक किया और प्रभावी निगरानी संभव हो पाई।
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चुनौतियों का था अंबार

इस बीच टीम के पास चुनौतियों का अंबार था। पहली चुनौती खराब कॉलर की थी। कॉलर बदलना ज़रूरी था, लेकिन यह प्रक्रिया नाजुक थी। चीते अन्य जानवरों की अपेक्षा तेज और एक्टिव होते हैं। वे अपने आसपास इंसान की उपस्थिति के आदी नहीं होते हैं। इसके बावजूद टीम ने सटीक को-ऑर्डिनेशन और टाइम मैनेजमेंट से इस मुश्किल को हल किया। चीतों के आसपास कोई भी अचानक की गई हरकत इंसान के अलावा निर्वा के जीवन को भी खतरे में डाल सकती थी।

इंसानों को देखते ही भागती थी निर्वाइस बात पर मंथन करने के बाद, भीषण गर्मी कम होने तक इंतजार करने का निर्णय लिया गया, जिससे ट्रैंकुलाइजेशन (Virus) से जुड़े जोखिम कम हो जाएंगे। आसपास इंसान महसूस होने पर निर्वा की भागने की आदत के कारण यह प्रोसेस और भी कठिन हो रहा था। निर्वा की खोज में कई प्रयास, रणनीतिक योजना और विभिन्न टीमों के बीच को-ऑर्डिनेशन शामिल था। इन प्रयासों में पैदल गश्त, डॉग स्कॉयड, हाथी, ड्रोन और बड़े पैमाने पर कैमरा-ट्रैप को लगाना शामिल था।

12 अगस्त को मिली सफलता
टीम को सफलता 12 अगस्त को मिली, जब तीन सप्ताह से अधिक की अनिश्चितता के बाद अचानक उपग्रह सिग्नल से निर्वा की गतिविधि ट्रैक हुई। इससे टीम को उसके होने की जगह पता चली। ये जगह कूनो नेशनल पार्क के धोरेट रेंज के भीतर था। जगह पता चलते ही एक्सपर्ट्स की टीम तुरंत कार्रवाई में जुट गईं और निर्वा के ठिकाने का पता लगाने के लिए ग्राउंड टीमों, ड्रोन, हाथियों और डॉग स्कॉयड को तैनात कर दिया।
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टीम वर्क और को-ऑर्डिनेशन से हल हुई मुश्किल
घंटों की सावधानीपूर्वक ट्रैकिंग, ड्रोन, हाथियों और डॉग स्कॉयड के इस्तेमाल से निरवा की सफल डार्टिंग हुई। इससे ऑपरेशन का शुरुआती स्टेप तो पूरा हो गया, लेकिन दूसरे स्टेप में उसकी एक्युरेट जगह का पता लगाना शामिल था। टीम ने आपसी को-ऑर्डिनेशन और टीम वर्क से इस मुश्किल को भी हल कर लिया।

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