श्रीनगर में 1996 की हिंसा: शब्बीर शाह को नहीं मिली जमानत, NIA कोर्ट ने खारिज की अर्जी
जम्मू की एक विशेष NIA अदालत ने अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला 1996 में श्रीनगर में एक आतंकी के अंतिम संस्कार के दौरान हुई कथित हिंसा से जुड़ा है। अदालत ने…
जम्मू की एक विशेष NIA अदालत ने अलगाववादी नेता शब्बीर अहमद शाह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह मामला 1996 में श्रीनगर में एक आतंकी के अंतिम संस्कार के दौरान हुई कथित हिंसा से जुड़ा है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को ध्यान में रखते हुए कहा कि इस स्तर पर शाह की रिहाई से मुकदमे की सुनवाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने यह फैसला शेरगढ़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR के संबंध में सुनाया। पूरा मामला 17 जुलाई 1996 का है, जब आतंकी हिलाल अहमद बेग की मौत के बाद श्रीनगर के जैना कदल से ईदगाह तक एक अंतिम संस्कार जुलूस निकाला गया था, जो नवा क्रॉसिंग के पास हिंसक हो गया था।
क्या हैं शब्बीर शाह पर आरोप?
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) का आरोप है कि शब्बीर शाह उस जुलूस का नेतृत्व करने वाले प्रमुख लोगों में से एक थे। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, वह नारे लगा रहे थे और भाषण दे रहे थे। इस दौरान अज्ञात हथियारबंद लोगों द्वारा पत्थरबाजी और गोलीबारी की घटनाएं भी दर्ज की गईं। इस मामले में उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 13 के अलावा भारतीय दंड संहिता (RPC) की धारा 147, 148, 336, 341, 307, 332, 427 और आर्म्स एक्ट की धारा 7 व 27 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
बचाव और अभियोजन पक्ष की दलीलें
शब्बीर शाह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद असलम गोनी ने तर्क दिया कि यह घटना लगभग तीन दशक पुरानी है और आरोपी हमेशा जांच एजेंसियों के लिए उपलब्ध रहे हैं। उन्होंने शाह की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और लंबे समय से हिरासत में होने का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ आरोपों के आधार पर उन्हें अनिश्चित काल तक जेल में रखना उचित नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि मामले के अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी है और शाह द्वारा हिंसा करने का कोई सीधा सबूत नहीं है।
इसके जवाब में, NIA की ओर से लोक अभियोजक अश्वनी वर्मा और चंदन कुमार सिंह ने जमानत अर्जी का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि शाह ने जुलूस में मुख्य भूमिका निभाई थी और उनका समर्थकों पर गहरा प्रभाव था। उन्होंने यह भी बताया कि सुरक्षित गवाहों से पूछताछ हो चुकी है और मामले में आगे की जांच जारी है।
अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने माना कि शाह पर UAPA की धारा 13 के तहत आरोप हैं, जो जमानत के लिए धारा 43-डी(5) की कठोर शर्तों को सीधे तौर पर आकर्षित नहीं करती। इसलिए याचिका पर सामान्य जमानत सिद्धांतों के आधार पर विचार किया गया। हालांकि, कोर्ट ने अंत में कहा कि इस बात की "उचित आशंका" है कि शब्बीर शाह की रिहाई से मुकदमे की निष्पक्ष कार्यवाही और सुरक्षित गवाहों के भरोसे पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसी आधार पर उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
इनपुट: IANS



