फेल होती योजनाओं के बीच “राष्ट्रवाद” बना चुनावी मुद्दा

प्रधानमंत्री मोदी जब 2014 में सत्ता में आये तो उसके बाद बहुत सी योजनायें भी उनके साथ अस्तित्व में आयी. या अगर यूँ कहा जाय कि कई पुरानी योजनाओं को नए सिरे से नए लिबास में प्रकट किया गया तो यह अतिश्योक्ति नही होगी. फिर अगर हम इस सरकार के साथ आयी योजनाओं की बात करें तो कुछ योजनाओं का नाम जहन में आना लाजमी है.

जैसे कि उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत और फिर सबसे अंत में नम्बर आता है किसान सम्मान निधि का. इन सब योजनाओं का जायजा लें तो हम पाएंगे कि इन योजनाओं को आसमान से जमीन पर लाने में काफी दुश्वारियां हैं, और उन्ही का सामना अब सरकार कर रही है.

ग्रामीण स्तर पर अगर देखा जाय तो उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त सिलेंडर तो मिल गये हैं लेकिन उनका उपयोग महिलाएं अभी भी नही कर रही हैं. इसके अलावा सभी गरीबों को आवास देने की योजना में अपनी तरह की मुसीबते हैं. या तो अभी तक देश से घूसखोरी नही गयी है या फिर इन योजनाओं का प्रचार ज़रूरत से ज्यादा किया गया है और असल काम बेहद कम.

गंगा की दुर्दशा भी अब तक कोई ख़ासा सुधार तो नजर नही आ रहा है, अब गंगा के स्वच्छता के लिए एक पूरा मंत्रालय बना दिया गया है लेकिन अब भी कितने सीवेज लाइन बिना साफ़ हुए ही सीधे गंगा में गिर रहे हैं, आंकड़ो में भी ये नाकामियां साफ़ तौर पर दिखती हैं.

अब जहाँ 2014 में एक पार्टी का नारा ‘सबका साथ सबका विकास’ था वो अब बदल कर ‘राष्ट्रवाद’ हो चुका है, पुलवामा हमला जहाँ एक नाकामी थी वही प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों में उन शहीदों के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं. हालाँकि अब चुनाव आयोग ने भी इस मसले पर प्रधानमंत्री को क्लीन-चिट दे दी है.

अब अगर सकारात्मक राजनीति की बात करें तो शायद अपने काम के लिए सत्तारूढ़ पार्टी को वोट मांगना चाहिए था जो कि “राष्ट्रवाद” के भूत में तब्दील हो चुका है, अब ये देखना होगा कि चुनाव नतीजों में क्या निकलता है.