Movie of the Week- मी शिवाजीराजे भोसले बोलतोय! -2009

1513

एक कहावात है कि भगवान् नियत देर्खकर देता है. अगर आप चोरी की नियत रखेंगे तो वो वैसे ही आसार बना देगा और अगर आप ईमानदारी से कुछ पाना चाहेंगे तो वैसे ही आसार पैदा कर देगा.

साल 2009 में संतोष मांजरेकर के निर्देशन में आयी “मी शिवाजीराजे भोसले बोलतोय!” इसी सीख को और पुख्ता करती है. इस फिल्म को महेश मांजरेकर ने लिखा है और उन्होने फिल्म में महाराज शिवाजी राव का दमदार किरदार भी निभाया है. उनके साथ मराठी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता सचिन खेड़ेकर मुख्य भूमिका में हैं.

फिल्म की कहानी दिनकर भोसले (सचिन खेड़ेकर) की आम सी ज़िंदगी और मामूली सी परेशानियों के इर्द-गिर्द घूमती है. एक वक़्त ऐसा आता है जब वो ये सोचने लगता है कि मराठी परिवार में पैदा होना उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमी है. हर कोई उसे घाटी (बेकार) कहकर पुकारता है. उसकी पत्नी भी उसकी गरीबी और इमानदारी से परेशान है. वहीँ दिनकर की बेटी शशिकला भोसले (प्रिया बापट) अपने नाम से भोसले शब्द को हमेशा के लिए हटाना चाहती है.

इसी बीच उसकी ज़िन्दगी में रमणीक गोसालिया (विद्याधर जोशी) नाम का एक बिल्डर होता है जो उसका पुश्तैनी बंगला हथियाना चाहता है. गोसालिया बिल्डर की वजह से दिनकर पूरी तरह टूट जाता है और खुद को कोसने लगता है. तभी एक रात महाराज शिवाजी राव उससे मिलने आते हैं और उससे खासी नाराजगी ज़ाहिर करते हैं. वो कहते हैं कि अपनी दुर्गति के लिए मराठी मानुष ख़ुद ज़िम्मेदार है. “दूसरों पर अपनी कमियों के लिए इलज़ाम लगाने से पहले आप ख़ुद के अन्दर झांकिए और देखिये कि आपने अपने लिए ख़ुद क्या किया है?”

Shivaji -

शिवाजी राव की सीख दिनकर की ज़िंदगी में क्या बदलाव लाती है और वो किस तरह एक मिसाल बनता है इसके लिए फिल्म का देखा जाना ज़रूरी है. यहाँ एक बात का खासतौर पर ज़िक्र करना चाहूंगी कि फिल्म में एक गाने के ज़रिये महाराज शिवाजी राव की शूरवीरता का बखान किया गया है. वो गाना किसी भी भारतीय को अपने देश के इतिहास पर गौरवान्वित होने के लिए मजबूर कर देगा.

अगर फिल्म की पटकथा की बात की जाए तो ये काफी हद तक कमल हासन की “हिन्दुस्तानी” से मिलती हुई है. मगर लेखक ने बड़ी होश्यारी और सफाई से कहानी को आज के समय अनुसार ढाला है और मौजूदा परिस्थितियों का अच्छा उदाहरण दिया है.

कई जगह पर कहानी अपनी पकड़ खोने लगती है और उबाऊ हो जाती है. लेकिन निर्देशक इस स्थिति को ज़्यादा देर नहीं रहने देता और फिल्म को ट्रैक पर वापास ले अता है.

फिल्म का संगीत बहुत ज़्यादा प्रभावशाली नही है मगर सुखविंदर की आवाज़ में “ओ राजे” गाना आपको लम्बे समय तक याद रहेगा.

मैं इसे 3 स्टार दूंगी.