Mayawati: दल-बदल से परेशान बसपा को अब याद आए ‘मिशनरी’, घटते जनाधार को थामने की कोशिश

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Mayawati: दल-बदल से परेशान बसपा को अब याद आए ‘मिशनरी’, घटते जनाधार को थामने की कोशिश

Reported by दीप सिंह | Edited by एनबीटी लखनऊ टीम | नवभारत टाइम्स | Updated: Jul 25, 2022, 11:15 AM

बाबू सिंह कुशवाहा, दद्दू प्रसाद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी सरीखे दिग्गज नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने पार्टी छोड़ दी या निकाल दिए गए। 2012, 2017 और 2022 के विधान सभा चुनाव हों या फिर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव, हर चुनाव में पार्टी की सीटें और वोट प्रतिशत गिरता गया

 

मायावती
लखनऊ : दल-बदल से परेशान बसपा को अब फिर से मिशनरी कार्यकर्ताओं की याद आई है। बसपा प्रमुख मायावती (Mayawati) ने रविवार को विभिन्न राज्यों के पदाधिकारियों की बैठक में इस बात की लगातार हिदायत दी कि आने वाले विधान सभा चुनाव में ‘मिशनरी’ सोच वालों पर ज्यादा भरोसा करें, जिससे घोर स्वार्थी, विश्वासघाती और बिकाऊ सोच रखने वालों से मुक्ति मिल सके। उन्होंने रविवार को पार्टी कार्यालय पर गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के पदाधिकारियों की बैठक में भी ये हिदायत दी। उन्होंने कहा कि सभी पार्टियों में इस तरह के लोग हैं और देश भर में सत्ता पलट और धनबल का गंदा खेल ऐसे ही लोगों के कारण हो रहा है।

बदला पार्टी का नजरिया, कई पुराने हुए दूर
वैसे बसपा की शुरुआत एक मिशन के तौर पर ही हुई थी। संस्थापक कांशीराम ने खासतौर से दलित, अति-पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय को साथ लेते हुए एक मिशन शुरू किया। बाद में पार्टी बनाई और कई मिशनरी नेता तैयार हुए, जो लंबे समय तक पार्टी के साथ रहे। धीरे-धीरे पार्टी का नजरिया बदला और जिताऊ प्रत्याशियों पर दांव लगाया जाने लगा। पार्टी को सफलताएं मिलीं और 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार भी बनी लेकिन धीरे-धीरे पुराने नेता और कार्यकर्ता पार्टी से दूर होने लगे। बाबू सिंह कुशवाहा, दद‌्दू प्रसाद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी सरीखे दिग्गज नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने पार्टी छोड़ दी या निकाल दिए गए।

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लगातार घटता गया जनाधार
इन नेताओं के पार्टी से बाहर जाने के साथ ही 2007 के बाद से पार्टी का जनाधार भी लगातार घटता गया। उसके बाद 2012, 2017 और 2022 के विधान सभा चुनाव हों या फिर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव, हर चुनाव में पार्टी की सीटें और वोट प्रतिशत गिरता गया। पिछले विधान सभा चुनाव में तो बसपा को महज एक सीट और 13 प्रतिशत से भी कम वोटों पर संतोष करना पड़ा। यही वजह है कि चुनाव के बाद से ही मायावती का पूरा जोर संगठन मजबूत करने पर है। वह अपनी पुरानी कार्यशैली पर मिशनरी लोगों को जोड़ने की कोशिश में हैं। यही वजह कि अब वह यूपी के अलावा दूसरे राज्यों के पदाधिकारियों के साथ बैठकों में लगातार इस बात पर जोर दे रही हैं। उन्होंने बैठक में कहा कि मिशनरी मूवमेंट की अब ज्यादा जरूरत है क्योंकि देश में आर्थिक विसंगति, अराजकता, बेरोजगारी जैसे संकट के भुक्तभोगी बहुजन वर्ग ही है।

यूपी में ट्रांसफर-पोस्टिंग बन गया धंधा
यूपी के ताजा हालात पर मायावती ने कहा कि यहां भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने अब यह भी देख लिया कि सरकारी ट्रांसफर-पोस्टिंग में किस प्रकार भ्रष्टाचार का खेल हुआ है। वास्तव में ट्रांसफर पोस्टिंग एक धंधा बन गया है। इसका खुलासा आखिरकार सरकार को मजबूर होकर खुद ही करना पड़ा। हालांकि इस खेल में बड़ी मछलियों को छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि यूपी में भाजपा सरकार पहले से भारी अन्तर्कलह और जातिवादी बिगाड़ का शिकार है। इससे जनहित काफी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि खाने-पीने की चीजों पर जीएसटी थोप दिया गया। यह सरकार की गरीब विरोधी नीति का प्रमाण है।

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