राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, “भारत-दर्शन” से “नारी सशक्तिकरण” तक।

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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त, 1886 को झाँसी में हुआ। गुप्तजी खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। पं महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से गुप्त जी ने खड़ी बोली में लिखना शुरू किया।  सिहित्यिक लोग इन्हें ‘दद्दा’ नाम से संबोधित किया करते थे। गुप्तजी की रचनाएं ना केवल हिन्दी साहित्य को समृद्ध करती है बल्कि हमें राष्ट्र और समाज के प्रति अपने दायित्वों के लिए भी जगाती है। इनकी कविता तात्कालिक विषमताओं को तो दर्शाती ही है, साथ ही वर्तमान में भी उनके शब्द उनते ही प्रासंगिक है। इस कड़ी में जहां ‘भारत-भारती’, से वो स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने का समाधान सुझाते हैं। वहीं जयद्रथ वध से हमें अपनी स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा करने का आह्वान करते हैं। नारी चेतना से संबंधित उनकी रचना साकेत और यशोधरा ने तो जैसे रामायण की उर्मिला और महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा पर सोचने के लिए मजबूर करता है कि भले ही लक्ष्मण ने भ्राता प्रेम में और महात्मा बुद्ध ने संसार उत्थान में उल्लेखनीय काम किया है। लेकिन उन्होंने अपनी पत्नियों का सम्मान नहीं किया और समय ने भी उनके साथ अन्याय किया है।

मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964 ई.) ने खड़ी बोली की उंगली पकड़कर उसे चलना सिखाया, बड़ा किया और काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ में जिस खड़ी बोली के स्वरूप को निश्चित करने का प्रयास किया था, उसे मैथिलीशरण ने जन-मन में विराजमान कराने का प्रयत्न किया। नए विचारों एवं परिवर्तनों से वे सदा प्रभावित रहे। परंतु ‘साकेत’ तक आते-आते गुप्तजी ने राजतंत्र का विरोध किया। उन्होंने प्रजातंत्र का समर्थन करते हुए कहा है –

‘राजा हम ने राम। तुम्हीं को है चुना
करो न तुम यों हाय। लोकमत अनसुना
जाओ, यदि जा सको रौंद हम को यहाँ
यों कह पथ में लेट गए बहुजन वहाँ ।’ (साकेत, पृ. 89)

पौराणिक कथा का चित्रण इस रूप में प्रस्तुत है कि कवि का युगबोध साकार हो उठा है गांधी जी का सविनय अवज्ञा आंदोलन – ‘माना यह कह रहा हो जाओ, यदि जा सको रौंद हम को यहाँ।’

‘हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी?
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।’ (भारत-भारती)

भारत-भारती की इन पंक्तियों से गुप्त हमें अपने आप को पहचानने को कह रहे हैं। जिम्मेदारियों का एहसास दिला रहे हैं।

‘सुख-शांति हेतु मैं क्रांति मचाने आया
विश्वासी का विश्वास बचाने आया।
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं
जो विवश, विफल, बलहीन, दीन, शापित हैं।’ ( साकेत, अष्टम सर्ग)

एक ओर जहां कवि साकेत और यशोधरा से समाज में नारी के प्रति उपेक्षा के लिए आगाह करते दिखते हैं वहीं ऊपर लिखे इन पंक्तियों के माध्यम से उन राम के रूप में उन लोगों की बात कर रहे हैं जो किसी ना किसी रूप में अंग्रेजों से या समाज की रूढ़ियों से लड़ रहे हैं।

गुप्तजी ने समाज और राष्ट्र की कभी उपेक्षा नहीं की। उनके समय में एक ओर बाबू राजेंद्र प्रसाद जी का नारा था कि परतंत्र भारत में राजद्रोह पाप नहीं, पुण्य-कार्य होता है। इसे कवि ने मिथकीय कथा के सहारे प्रस्तुति करते हुए कहा है –

‘वह प्रलोभन हो किसी के हेतु
तो उचित है क्रांति का ही केतु।
दूर हो ममता, विषमता, मोह
आज मेरा धर्म राजद्रोह।’

राजनीति कलुषित हो गई। स्वार्थ को ही परमार्थ समझा जाने लगा। राजनीति एक दूधारू गाय साबित हो गई है। गुप्त जी ने शत्रुघ्न से कहलवाया भी है –

राज्य को यदि हम बना लें भोग
तो बनेगा वह प्रजा का रोग।
(साकेत, सातवाँ सर्ग, पृ. 104)

नारी-विमर्श

राष्ट्रकवि की द्रौपदी, उर्मिला, कैकेयी, यशोधरा, विष्णुप्रिया, सत्यभामा आदि स्त्रियाँ परंपरा से आगत हैं परंतु

ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे। (भारत-भारती)

नारी विमर्श में यशोधरा कहीं भी पीछे नहीं रहती है। नीचे लिखी गुप्त की पंक्तयों के माध्यम से यशोधरा कह रही हैं कि महात्मा बुद्ध तप के लिए गए ये तो गर्व की बात है लेकिन यह बात उन्होंने मुझे बताई नहीं ये मेरे साथ अन्याय किया-

‘सिद्धि हेतु स्वामी गए, यह गौरव की बात,
पर, चोरी-चोरी गए, यही बड़ा व्याघात,
सखि! वे मुझसे कहकर जाते
कह तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?’

उर्मिला के विरह को उसके वियोग को गुप्त ने अविस्मरणीय बना दिया है।

मानस मंदिर में सती, पति की प्रतिमा थाप,

जलती थी उस विरह में, बनी आरती आप।

आंखों में प्रिय मूर्ति थी, भूले थे सब भोग,

हुआ योग से भी अधिक, उसका विषम वियोग।।

‘साकेत’ की उर्मिला को आत्म-सम्मान का बोध है। चित्रकूट में लक्ष्मण और उर्मिला का एकांत मिलन हुआ था। उस समय लक्ष्मण कुछ और ही सोच रहे थे, तभी उर्मिला कहती है – ‘मैं बाँध न लूँगी तुम्हें, तजो भय भारी।’

गुप्तजी मानव मूल्य के कवि हैं। उनके मानव-मूल्य में सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक मूल्य समाहित हैं। मानवतावादी दृष्टि सर्वोपरि होने के कारण उनकी रचनाएँ भारतीय जनता की कंठहार बनीं। उनकी रचनाओं ने मानव चेतना का संस्कार किया। प्रेम, भाईचारा एवं मैत्री का प्रचार किया। मनुष्य मात्र को जागरण का संदेश देते हुए उनके काव्यों ने मनुष्य जाति को नई दिशा दी। उन्होंने एकता में शक्ति की चेतना को अभिव्यक्त किया। इसलिए कभी अज्ञेय जी ने इन्हें संवेदना से अधिक मानव मूल्य का कवि माना था। गुप्तजी की रचनाएँ आस्था, विश्वास, अहिंसा का मंत्रपाठ कराती हैं। हमें उज्जीवित करती हैं, आस्थावान बनाती हैं-

‘बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा
है किंतु आशा भी कि होगी दीप्ति फिर प्राची दिशा।’

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