Loksabha By-Election Results: अखिलेश का जनाधार, योगी की पकड़ का रिजल्ट…जानिए क्यों महत्वपूर्ण हैं उप चुनाव के नतीजे

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Loksabha By-Election Results: अखिलेश का जनाधार, योगी की पकड़ का रिजल्ट…जानिए क्यों महत्वपूर्ण हैं उप चुनाव के नतीजे

लखनऊ: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजनीति के लिए आज का दिन काफी अहम है। दो लोकसभा सीटों पर हुए उप चुनाव के परिणाम (UP By Election Results) आने वाले हैं। पांच साल या यूं कहें चार साल बाद क्या कहानी दोहराएगी या फिर यहां की जनता को बदलाव नापसंद है। जी हां, हम बात कर रहे हैं आजमगढ़ (Azamgarh Lok Sabha By Election Result) और रामपुर लोकसभा उप चुनाव के परिणाम (Rampur Lok Sabha By Election Result) की। ये दोनों लोकसभा सीटें समाजवादी पार्टी के दो कद्दावर नेताओं ने खाली की हैं। आजमगढ़ से सांसद रहे अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने मैनपुरी के करहल सीट पर विधायकी का चुनाव जीतने के बाद सांसदी छोड़ दी। वहीं, आजम खान (Azam Khan) को पहली बार सांसद बनना नहीं भाया। जेल से ही रामपुर विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरे। दसवीं बार जीते और फिर सांसदी छोड़ दी। नतीजतन, उप चुनाव कराए गए हैं। लेकिन, पांच साल बाद हमने जिस कहानी की बात कही, वह है यूपी चुनाव 2017 के बाद की। तब भाजपा ने दो संसदीय सीटों को खाली किया था। मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने गोरखपुर सीट खाली की थी तो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने फूलपुर सीट। 2018 में जब लोकसभा उप चुनाव दोनों सीटों पर हुए तो जनता ने भारतीय जनता पार्टी को हरा दिया। सवाल फिर वही, क्या आजमगढ़ और रामपुर की जनता अबकी समाजवादी पार्टी को वही सबक सिखाएगी? इससे भी बड़ा सवाल, क्या अखिलेश यादव मुलायम परिवार के आजमगढ़ और रामपुर में बर्चस्व को कायम रख पाएंगे? क्या योगी आदित्यनाथ दूसरे कार्यकाल में भी आजमगढ़ और रामपुर में जीत की अबुझ पहेली को सुलझा पाएंगे?

क्या स्मृति ईरानी बन पाएंगे निरहुआ?
उप चुनाव में जीतने वालों की हार मिलती रही है। ऐसे में यह देखना सबसे अधिक दिलचस्प होगा कि दिनेश लाल यादव निरहुआ, क्या स्मृति ईरानी बन पाएंगे। स्मृति ईरानी को वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के सीनियर नेता राहुल गांधी की पारंपरिक सीट अमेठी से चुनावी मैदान में उतारा था। उस चुनाव में राहुल गांधी ने स्मृति ईरानी को 1,07,903 वोटों के भारी अंतर से हराया। वह भी तब जब एनडीए 80 में से 73 सीटों पर कब्जा जमाई थी। स्मृति ईरानी की हार बड़ी थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार अमेठी में डटी रहीं। केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी उनके दौरे लगातार जारी रहे।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर वे राहुल गांधी के सामने अमेठी में थीं और उन्होंने गांधी परिवार के इस पारंपरिक किले को 55,120 वोटों के अंतर से ढाह दिया। आजमगढ़ के चुनावी अभियानों के दौरान निरहुआ बार-बार इस चुनावी परिणाम का जिक्र करते रहे। लेकिन, फिल्मी कलाकार से राजनेता बने निरहुआ लोगों के दिलों तक कितना पहुंचे, इसका फैसला बस अब होने ही वाला है। साथ ही, फैसला यह भी होना है कि आजमगढ़ ने क्या अखिलेश की पकड़ को कमजोर किया या फिर योगी अब भी लोगों के दिलों में जगह बनाने में कामयाब नहीं हुए।

मुकाबला उतना भी सीधा नहीं
आजमगढ़ का मुकाबला उतना भी सीधा नहीं है। इस बार के लोकसभा उप चुनाव में 13 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं, लेकिन चर्चा 3 की हो रही है। पहले नंबर पर मुलायम परिवार के सदस्य धर्मेंद्र यादव हैं, जिनके कंधे पर परिवार की विरासत को इस सीट पर आगे लेकर जाने की जिम्मेदारी है। वर्ष 2014 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव, 2019 में अखिलेश यादव के बाद अब चचेरे भाई धर्मेंद्र जीत की ताल ठोंक रहे हैं। लेकिन, जिस 26+24 की राजनीति के तहत धर्मेंद्र जीत का दावा करते हैं, उसमें कहीं न कहीं सेंध लगती दिख रही है। इसका कारण मुकाबले का दो तरफा न होकर त्रिकोणीय हो जाना है।

खेल मायावती का है और जीत के सपने भाजपा सजा रही है। इसकी वजह भी साफ दिखती है। आजमगढ़ लोकसभा सीट के चुनावी नतीजों पर गौर करेंगे तो आप पाएंगे कि यहां पर हमेशा मुकाबला त्रिकोणीय होता रहा है। प्रमुख दलों की ओर से यादव और मुस्लिम उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरते हैं और वोटों का बंटवारा उनके बीच होता है। लेकिन, मजबूत समीकरण के सहारे सपा-बसपा जीत के आंकड़े तक पहुंचती रही है। धर्मेंद्र यादव बनाम निरहुआ की लड़ाई में गुड्‌डू जमाली का त्रिकोण पूरे मुकाबले को रोचक बनाए हुए है।

मायावती ने सबसे पहले किया था ऐलान
यूपी चुनाव 2022 का रिजल्ट 10 मार्च को आने के बाद से अखिलेश यादव के विधानसभा में ही रहने की बात कही जाने लगी थी। ऐसे में बसपा छोड़कर एआईएमआईएम जाने वाले गुड्‌डू जमाली को पार्टी ने पहले अपनी तरफ मिलाया। फिर, अखिलेश यादव और आजम खान के इस्तीफे के साथ ही मायावती ने ऐलान कर दिया कि आजमगढ़ से गुड्‌डू जमाली लड़ेंगे। रामपुर में पार्टी उम्मीदवार नहीं देगी। बसपा के इस फैसले के बाद से ही गुड्‌डू जमाली क्षेत्र में प्रचार अभियान में जुट गए। उनकी कैंपेनिंग पूरे अप्रैल, मई और 22 जून तक चली है।

वहीं, भाजपा की उम्मीदवार घोषणा के बाद सपा ने धर्मेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाया। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर, गुड्‌डू जमाली जिस गंभीरता से चुनाव लड़ रहे हैं, क्या वे भाजपा और सपा दोनों के लिए खतरा बन गए हैं, जैसा दावा बसपा सुप्रीमो मायावती का है। या फिर, वे मुस्लिम समाज के वोट बैंक में सेंधमारी कर भाजपा के लिए राह आसान बना रहे हैं।

समीकरण के सहारे जीत की आस में अखिलेश
आजमगढ़ में अखिलेश यादव इस बार एक दिन भी चुनाव प्रचार करने नहीं गए। ऐसा नहीं था कि चुनाव प्रचार के दौरान वे अत्यधिक व्यस्त थे या फिर राज्य से बाहर थे। वे छोटे-मोटे समारोहों में जाते रहे। लेकिन, उप चुनावों पर उन्होंने कोई रुचि नहीं ली। वोटिंग से एक दिन पहले और वोटिंग के दिन को छोड़ दें तो उनके ट्विटर हैंडल से उप चुनाव को लेकर एक ट्वीट तक नहीं किया गया। इसके कारण सपा के अंदरूनी सूत्र भी नहीं बता रहे। लेकिन, अफवाह यह है कि उम्मीदवारों के चयन में अखिलेश के मनोनुकूल फैसले नहीं होने को लेकर उनके मन में खटास हो सकती है।

धर्मेंद्र यादव को मुलायम गुट का माना जाता है। उनकी चाचा शिवपाल यादव से भी खासी बनती है। वहीं, रामपुर में तो सब आजम भरोसे ही रहा। ऐसे में अखिलेश ने इस पूरी प्रक्रिया से खुद को अलग रखा। अगर मनोनुकूल परिणाम नहीं आए तो अखिलेश के मन की बात निकल कर सामने आ सकती है।

रामपुर का खेल आजम के हवाले
20 मई को आजम खान जेल से बाहर आ रहे थे तो सुर्खियां यही थीं कि क्या वे सपा में अलग धड़ा बनाएंगे? सपा से अलग होंगे? क्या शिवपाल यादव के साथ मिलकर कोई नया राजनीतिक समीकरण तैयार करेंगे। लेकिन, आजम बीमार पड़े। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती हुए। लखनऊ जो रिश्तों की नरमी अखिलेश और आजम के बीच दिख रही थी। अस्पताल में एक मुलाकत ने माहौल को पूरी तरह से बदल दिया। आजम एक बार फिर रामपुर में सपा के सिकंदर घोषित कर दिए गए। रामपुर लोकसभा चुनाव से लेकर विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार चयन तक में उनका जलवा दिखा। प्रेसर पॉलिटिक्स के माहिर खिलाड़ी आजम खान अब आसिम राजा को रामपुर से जिताकर संसद भेजने की तैयारी में जुटे हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि उनके पुराने साथी भाजपा उम्मीदवार घनश्याम लोधी और आसिम राजा के बीच किस पर रामपुर मेहरबान होता है और किसके अरमानों पर रामपुरी चाकू चलता है।

रामपुर में भी सारा खेल समीकरणों का
रामपुर में करीब 50 फीसदी मुस्लिम मतदाता जीत तय करते हैं। लेकिन, वर्ष 1998 में मुख्तार अब्बास नकबी के बाद दूसरा अल्पसंख्यक सांसद बनने में 21 सालों का वक्त गुजर गया। मुलायम ने यहां से दो बार जया प्रदा को सांसद बनाया। वहीं, वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के डॉ. नेपाल सिंह ने जीत दर्ज कर सबको चौंकाया। अबकी बार रामपुर के मैदान में भले ही 6 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं, लेकिन चुनावी लड़ाई सपा के आसिम राजा और भाजपा के घनश्याम लोधी के बीच है। लोकसभा सीट के दायरे में पांच विधानसभा सीटें आती हैं। यूपी चुनाव 2022 में इन पांच में से तीन सीटों पर सपा ने कब्जा जमाया था और भाजपा को दो सीटों पर जीत मिली थी। सपा ने उन सीटों पर जीत दर्ज की, जहां पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 50 फीसदी से अधिक है।

रामपुर लोकसभा सीट पर लोध जाति के वोटरों का भी खासा बोलबाला है। यूपी चुनाव 2022 में इस लोकसभा सीट की पांचों विधानसभा सीटों को जोड़कर देखें तो सपा को 5.40 लाख से अधिक और भाजपा को साढ़े 4 लाख के करीब वोट मिले थे। हालांकि, इस बार नवाब परिवार और आजम खान के बीच जिस प्रकार की जुबानी जंग चली है, उससे मुस्लिम वोटरों में बिखराव दिख रहा है। वोटिंग प्रतिशत के महज 41.01 फीसदी पर रहने को भी इसका कारण माना जा रहा है। ऐसे में बाजी पलटी तो अधिक आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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