भीम राव आंबेडकर की जीवन कथा

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भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के 65 सालों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, जैसी बहुत सी ऐसी चीजे है, जो सवैधानिक आदि क्षेत्रों में अनगिनत कार्य करके राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. डॉ. आंबेडकर एक मनीषी, योद्धा, नायक, विद्वान, दार्शनिक, वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं धैर्यवान व्यक्तित्व के धनी थे. वे एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपना समस्त जीवन भारत के कल्याण और उसकी कामना के लिए समर्पण कर दिया था. जिन्हें आज भी हिंदुस्तान याद करता है.

डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू में सूबेदार रामजी शकपाल एवं भीमाबाई की चौदहवीं संतान के रूप में हुआ था. उनका व्कक्तित्व का स्मरण शक्ति की प्रखरता, बुद्धिमत्ता, ईमानदारी, सच्चाई, प्रचंड आदि था. संयोगवश भीमराव सातारा गांव के एक ब्राह्मण शिक्षक को बेहद पसंद आए, वे अत्याचार और लांछन की तेज धूप में टुकड़ा भर बादल की तरह भीम के लिए मां के आंचल की छांव बन गए.

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने यह भी कहा था कि वर्गहीन समाज गढ़ने से पहले समाज को जातिविहीन करना होगा. समाजवाद के बिना दलित-मेहनती इंसानों की आर्थिक मुक्ति संभव नहीं. इसके बाद डॉ. आंबेडकर की रणभेरी गूंज उठी, क्योंकि श्रेणी ने इंसान को दरिद्र और वर्ण ने इंसान को दलित बना दिया. जिनके पास कुछ भी नहीं है, वे लोग दरिद्र माने गए और जो लोग कुछ भी नहीं है वे दलित समझे जाते थे.

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संघर्ष का बिगुल बजाकर आह्वान किया. ऐसा कहा जाता है न कि ‘छीने हुए अधिकार भीख में नहीं मिलते, अधिकार को वसूल करना पड़ता है. डॉ. भीमराव आंबेडकर कहा कि हिन्दुत्व की गौरव वृद्धि में वशिष्ठ जैसे ब्राह्मण, राम जैसे क्षत्रिय, हर्ष की तरह वैश्य और तुकाराम जैसे शूद्र लोगों ने अपनी साधना का प्रतिफल जोड़ा है. इसी के साथ यह भी कहा कि उनका हिन्दुत्व दीवारों में घिरा हुआ नहीं है. बल्कि ये सब दिखावा है.

अमेरिका में कोलंबिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, मानव विज्ञान, दर्शन और अर्थ नीति का गहन अध्ययन बाबा साहेब ने किया. वहां पर भारतीय समाज का अभिशाप और जन्मसूत्र से प्राप्त अस्पृश्यता की कालिख नहीं थी. इसलिए उन्होंने अमेरिका में एक नई दुनिया के दर्शन किए. डॉ. आंबेडकर के अलावा भारतीय संविधान की रचना करने वाला भारत में कोई नहीं था. जिसके बाद डॉ. आंबेडकर को संविधान सभा की प्रारूपण समिति का अध्यक्ष चुना गया. 26 नवंबर 1949 को डॉ. आंबेडकर द्वारा रचित संविधान को पारित किया गया.

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जिसके बाद ड़ॉ. आंबेडकर मधुमेह से पीड़ित हो गए और 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई. 1990 में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.