बिहार को मजदूरों की फैक्ट्री बनाने में लालू का योगदान

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देश में जेपी आंदोलन चरम पर था। बिहर जेपी आंदोलन का केन्द्र बना हुआ था। उस दौर में देश के कई राज्यों में युवा नेता उभर कर आए। बिहार भी उनमें से एक था। बिहार में नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और सुशील कुमार मोदी जैसे नेता राज्य की तक़दीर बदलने आए। ऐसे में बगावती मंच से एक सशक्त युवा आवाज सुनाई देती थी और लोगों की तालिया गूंजने लगती थी। और वो आवाज थी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की। 1977 में पहली बार लोकसभा सद्स्य के रूप में सबसे युवा नेता के रूप में चुनकर आने वाले लालू, 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री क्या बने बिहार की सूरत ही बदल गई। बिहार में परिवर्तन का दौर शुरू हुआ। सामाजिक न्याय, अगड़े पिछड़ों के बीच संघर्ष जैसे और कई मुद्दे आए जिसने बिहार को बदलकर रख दिया। बिहार में राजनीतिक शक्ति के बीच लालू ने जब बिहार में आडवाणी के रथ को रोका तो जैसे बिहार के बेताज बादशाह और अल्पसंख्यकों के मसीहा बन गए ऐसे ही तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद बिहार में करीब 15 साल तक लालू की सत्ता रही। पेश है एक नजर:

लालू का सामाजिक न्याय

1989 में भागलपुर दंगे को लेकर लालू ने मुस्लिमों को विश्वास में लिया और एमवाई (मुस्लिम-यादव) के समीकरण से जनता दल का नेतृत्व करते हुए 1990 में मुख्यमंत्री बने। बस क्या था, एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाले। एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले लालू ने बिहार में सामाजिक न्याय लाने की भरपूर कोशिश की और इससे कुछ हद तक सुधार भी हुआ। अगड़ी जाती का सामाजिक प्रभुत्व खत्म होने लगा। पिछड़े लोग जागरूक होने लगे। लालू मुख्यमंत्री क्या बने जैसे कमजोरों के हाथ में सत्ता आ गई।

जातीय संघर्ष

लालू के आने से बिहार में जबरदस्त जातीय संघर्ष की शुरूआत हुई। यादवों और ब्राह्मणों के बीच जबरदस्त टकराव हुआ। लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए और इसका असर ये हुआ कि हर तरफ गुड़ागर्दी की शुरूआत हो गई। वोट बैंक की राजनीति चमकाने के लिए सरकार जातीय टकराव को राजनीतिक संरक्षण देने लगी। जातीयता को अपने राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। इसका परिणाम ये हुआ कि परिवर्तन और विकास से ध्यान भटककर लोगों का ध्यान अपने जातीय प्रभुत्व को स्थापित करने पर चला गया।

लालू का नारा, भूराबालसाफ करो

उस दौर में जातीय संघर्ष का आलम ये था कि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने खुद एक नारा दिया था, “भूराबाल साफ करो” इसका मतलब है: भू- भूमिहार, रा- राजपूत, बा- ब्राह्मण और ला- लाला। दलअसल ये चार नाम उन जातियों के हैं। जो अगड़ी जाति की श्रेणी में आते हैं। हालांकि उस दौर में लालू के और भी नारे थे, ‘जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा।’ लेकिन इसपे कितना अमल हो पाया ये तो बिहार के हालात से पता चलता है।

बिहार का आपराधीकरण

जातीयता और सामाजिक न्याय के बहाने बिहार में अपराधियों, दबंगों, माफियाओं और अपहरणकर्ताओं को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा। अपराध, अपराधियों और पुलिस की जबरदस्त सांठगांठ के चलते अपराधी बेखौफ हो गए। बिहार में अपराध एक उद्योग के रूप में स्थापित हो गया। अपहरण तो जैसे बिहार का प्रमुख उद्योग ही बन गया। डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी इनके सबसे अच्छे अपभोगता बने जिसे जब चाहे उठा लिया और मुंह मांगे पैसे ऐंठ लिए और जहां से पैसा नहीं मिला उसे दे दी मौत।

भ्रष्टाचार का बोलवाला

लालू के राज में चरवाहा विद्धालय के नाम पर जो भ्रष्टाचार हुआ। उससे साफ पता चल गया कि लालू जिस पिछड़े और गरीब की बात करते हैं। उनसे उनको कोई सरोकार नहीं। हां उनका ये एक तरीका है अपनी राजनीति चमकाने का। 1997 में लालू के ऊपर 950 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा आरोप लगा। जिसने उन्हें जेल तक भेज दिया और उन्हें अपनी पत्नी राबड़ी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद उन्होंने जनता दल से अलग होकर अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया।

बिहार में विकास का बंटाधार  

बिहार में लालू राज में बहुत कुछ हुआ जिसका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं। लेकिन अगर कुछ नहीं हुआ तो वो विकास था। जनता के मूलभूत अधिकारों का हनन हुआ। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली और पानी जैसे जरूरतों के लिए जनता को बेहद समस्यों का सामना करना पड़ा। सरकारी स्कूलों, हस्पतालों के हालात तो बेहद ही खराब हो गए। कर्मचारी खुलेआम भ्रष्टाचर करने लगे। परिणाम ये हुआ कि लोग पलायन पर मजबूर हो गए।

बेरोगारी और अपराध के कारण पलायन

बिहार में ये वो दौर था जब सड़कों पर खुलेआम हत्या, लूटपाट और डकैती जैसे वारदार हो रहे थे। रोजगार का कोई साधन नहीं था। प्रदेश में शिक्षा का महौल पूरी तरह चौपट हो गया था। ऐसे में युवाओं का अपराध के प्रति झुकाव बढ़ता जा रहा था। सरकार युवाओं को रोजगार के लिए कोई उपाय नहीं कर रही थी। अपराध के साये में नए उद्योग राज्य में आ नहीं रहे थे अगर कुछ थे भी तो वो कमीशन और रंगदारी के कारण बंद हो गए थे। ऐसे में गरीब युवाओं के लिए दो ही रास्ते बचे थे। पहला, अपराध का और दूसरा पलायन का। सभी का अपराधी बनना तो मुश्किल था। इसलिए पलायन का भयावह दौर शुरू हुआ जो कि आजतक जारी है।

पलायन के दो कारण

पलायन का एक कारण ये था कि घर में रोटी-रोटी का कोई साधन नहीं था। इसलिए उन्हें अपने बिहार को छोड़कर दिल्ली, बंबई, कोलकाता, गुजरात और आसाम जैसे शहरों की ओर भागना पड़ा। और पलायन का दूसरा कारण था, राज्य में संसाधनों की कमी। जैसे शिक्षा, स्वासथ्य बिजली और पानी जैसे कई जरूरी चीजों की कमी के कारण लोगों को ये लगा कि बच्चों का भविष्य अब बिहार में नहीं बन सकता है। इसलिए हमें बिहार छोड़ देना चाहिए।

हम मजदूरों की फैक्ट्री होकर रह गए

इसमें कोई संदेह नहीं कि एक समय बिहार से सबसे ज्यादा आईएएस-आईपीएस हुआ करते थे। हालांकि आज भी बिहार के युवा अपनी मेहनत से पूरे देश ही नहीं पूरी दुनियां में अपने आप को साबित कर रहे हैं। लेकिन ये भी सच्चाई ये है कि आज हम हर देश के हर राज्य को सबसे ज्यादा लेबर निर्यात (इंपोर्ट) करते है। आज अगर हमारा बिहार देश में का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बन गया है तो इसका सबसे बड़ा श्रेय लालू जी को जाता है। जिन्होंने कभी भी बिहार के युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर काम नहीं किया। उन्होंने बिहार को एक ऐसी राजनीतिक दिशा दिखाई जिसने देश में हमारी छवि बिगाड़ कर रख दिया। हमें जातीयता और आपराधिक दृष्टि से देखा जाने लगा और हमें दूसरों के टूकड़ों पर पलने वाला कहा जाने लगा। जिसका परिणाम बिहार के हजारों लाखों लोग कभी बंबई में तो आसाम में भूगते हैं और लालू जी ही इन परिणामों के जनक कहे जा सकते हैं।

 

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