Kahani Uttar Pradesh ki: मोहर पड़ेगी… पर या गोली पड़ेगी छाती पर, जब ददुआ के फरमान पर पलट जाते थे उम्‍मीदवारों के गणित

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Kahani Uttar Pradesh ki: मोहर पड़ेगी… पर या गोली पड़ेगी छाती पर, जब ददुआ के फरमान पर पलट जाते थे उम्‍मीदवारों के गणित

लखनऊ: यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियां चरम पर हैं। पार्टियां अपने जिताऊ उम्‍मीदवारों का ऐलान कर रही हैं। समाजवादी पार्टी ने कुख्‍यात दस्‍यु ददुआ के बेटे वीर सिंह पटेल को मानिकपुर से टिकट दिया है। वीर सिंह चित्रकूट की सदर सीट से विधायक हैं। इसी क्षेत्र यानि यूपी के चित्रकूट, बुंदेलखंड क्षेत्र के साथ ही मध्य प्रदेश के विंध्य इलाके में वीर सिंह के पिता शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ ने तीन दशकों तक राज किया। पाठा के जंगलों के इस बेताज बादशाह की परछाई तक को कभी पुलिस छू नहीं सकी थी। बिना उसके आशीर्वाद के ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनाव नहीं लड़े जा सकते थे। उसने बंदूक की नाल की जोर पर जंगल में वोट की फसल उगाई। लेकिन सियासत में अति महत्वकांक्षा उसे ले डूबी। और स्पेशल टास्क फोर्स ने उसे मार गिराया था।

देश की आजादी के कुछ सालों के बाद चित्रकूट के देवकली गांव में जन्मे ददुआ ने 1975 में पहली लाश गिराई। इसके बाद उसके कदम आगे ही बढ़ते चले गए। 2007 में एनकाउंटर तक ददुआ के ऊपर लूट, डकैती, हत्या, अपहरण जैसे करीब ढाई सौ मामले दर्ज थे। कहा जाता है कि ददुआ के पिता को कुछ लोगों ने गांव में नंगा करके घुमाया था और फिर हत्या कर दी थी। इसी एक घटना ने शिवकुमार पटेल को जिंदगी भर के लिए ददुआ के रूप में बदल डाला।
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गंगा-यमुना की बेल्ट में तूती बोलती थी
अपराध की दुनिया में ददुआ ने अपना एक गैंग तैयार कर लिया। साल 1986 में ददुआ ने रामू का पुरवा नामक गांव में मुखबिरी के शक में 9 लोगों के सीने में गोली उतार दी थी। 1992 में मड़ैयन गांव में 3 लोगों की हत्या के बाद गांव को जला डाला था। उसने राजनीति की तरफ रुचि लेनी शुरू कर दी। कुर्मी पटेल और आदिवासी कार्ड की बदौलत गंगा और यमुना के मैदानी इलाकों में उसने अपनी पैठ बना ली थी। वह तेंदू पत्ते के व्यापार में भी सक्रिय था।

‘मोहर पड़ेगी या गोली पड़ेगी छाती पर’
चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, फतेहपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, मिर्जापुर, कौशांबी की करीब 10 लोकसभा सीटों और दर्जनों विधानसभा की सीटों पर ददुआ का बोलबाला था। कहा जाता है कि वह चुनाव में फरमान जारी करके वोटिंग का आदेश देता था। ‘मोहर लगेगी … पर, वरना गोली पड़ेगी छाती पर’ जैसे ददुआ के फरमान लोगों की जुबान पर आज तक दर्ज हैं। इसमें … की जगह संबंधित पार्टी या प्रत्याशी का नाम होता था। गरीबों के लिए ददुआ एक मसीहा था। शोषित और वंचित समाज में उसकी इमेज रॉबिनहुड की रही।

जंगल में दौड़ाई हाथी और साइकल
बांदा के नेता रामसजीवन सिंह सांसद और विधायक भी चुने गए। वह ददुआ को बेटे जैसा स्नेह देते थे। अपने राजनीतिक गुरु के कहने पर ददुआ ने मायावती के पक्ष में माहौल तैयार किया। सैकड़ों गांवों में उसकी तूती बोलती थी। वह बसपा नेताओं के करीब आ गया। कहा जाता है कि उसे खुलेआम पार्टी का संरक्षण प्राप्त था। लेकिन बाद में बसपा नेता दद्दू प्रसाद से अनबन हो गई और उन्होंने मायावती से शिकायत कर दी। राजनीतिक महत्वकांक्षा से ददुआ ने भी पाला बदल लिया और 2004 में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को सपोर्ट कर दिया। उसे शिवपाल का खास माना जाता था। जिस ददुआ ने पहले चंबल के जंगलों में हाथी दौड़ाई थी, उसने अब साइकल चलवा दी।

veer singh patel akhilesh yadav

ददुआ का बेटा वीर सिंह पटेल अखिलेश यादव के साथ

मौत से बचा तो बनवा दिया मंदिर
ददुआ हमेशा पुलिस से दो कदम आगे ही रहता था। अपराध की दुनिया में आने के बाद 1992 में पहली बार ददुआ पुलिस के चंगुल में फंसा था। फतेहपुर के नरसिंहपुर कबरहा में गन्ने खेत में ददुआ को पुलिस फोर्स ने घेर लिया था। बचने की कोई संभावना नहीं थी लेकिन किस्मत साथ दे गई। ददुआ बच निकला। चार साल बाद 1996 में वहां मंदिर बनवा दिया। मंदिर आज भी है। बेटे ने विधायक बनने के बाद भव्य मंदिर में पिता ददुआ और मां की मूर्ति लगवाई। यह मूर्ति आज भी विराजमान है।

भाई, बेटे, बहू, भतीजे बैठे कुर्सी पर
ददुआ खुद खादी नहीं पहन पाए। लेकिन परिवार का राजनीतिक करियर सेट कर गए। भाई बालकुमार पटेल 2009 में मिर्जापुर से सांसद बने। बेटा वीर सिंह पटेल 2012 में चित्रकूट के कर्वी से विधायक भी चुना गया। बहू ममता पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गईं। वहीं भतीजा राम सिंह पटेल भी पट्टी से विधायक बना। 22 जुलाई 2007 को ददुआ पुलिस और एसटीएफ की मुठभेड़ में ढेर हो गया। चित्रकूट और बुंदेलखंड के गांव-गलियों में ददुआ के किस्से आज भी चबूतरे की बैठक का किस्सा हैं।



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