अखिलेश को ‘हैपी बर्थडे’ बोलने के पीछे क्या माया का कोई सियासी गणित है? समझिए मायने

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अखिलेश को ‘हैपी बर्थडे’ बोलने के पीछे क्या माया का कोई सियासी गणित है? समझिए मायने

अखिलेश को ‘हैपी बर्थडे’ बोलने के पीछे क्या माया का कोई सियासी गणित है? समझिए मायने

लखनऊ : 1 जुलाई को सपा मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav Birthday) का जन्मदिन था। उनको बधाई देने वालों में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (Mayawati) भी शामिल थीं। जन्मदिन पर राजनीतिक हस्तियों का एक-दूसरे को बधाई देना आम है लेकिन मायावती की बधाई इसलिए चौंकाने वाली रही क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जैसे ही एसपी-बीएसपी का गठबंधन टूटा था, दोनों के बीच संवाद खत्म हो गया था। उसके बाद के अखिलेश के जन्मदिनों पर मायावती की तरफ से अखिलेश यादव को बधाई देने की जरूरत नहीं समझी गई थी। एक तरह से अखिलेश के जन्मदिन पर मायावती का यह पहला बधाई संदेश है। मायावती जनवरी 2019 में सोशल मीडिया पर सक्रिय हुई थी। 22 जनवरी को ट्वीट कर उन्होंने अपनी सक्रिय उपस्थिति का ऐलान किया था सक्रियता के साढ़े तीन सालों में चार बार अखिलेश यादव का जन्मदिन पड़ा, लेकिन, ट्विटर पर माया की बधाई पहली बार आई है।

डिंपल के लिए माया ने भिजवाया था केक
12 जनवरी 2019 को मायावती के जन्मदिन के तीन दिन पहले अखिलेश ने उनकी पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान किया था। गठबंधन धर्म निभाने अखिलेश 15 जनवरी को मायावती के जन्मदिन पर उनके घर पहुंचे और शाल ओढ़ाई। इसी तारीख को अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव का भी जन्मदिन होता है। लिहाजा, मायावती ने उन्हें केक व बुके भेजकर जन्मदिन की बधाई दी। गठबंधन की उम्र महज छह महीने रही। नतीजे प्रतिकूल रहे तो गठबंधन भी अनुकूल नहीं रहा और टूट गया। इसके साथ ही शिष्टाचार व औपचारिकताओ का ढंग भी बदल गया। जवाब के बजाय सवाल व तंज ही रहे। अखिलेश व डिंपल पर आशीर्वाद बरसाने वाली मायावती गठबंधन तोड़ने के बाद सपा व अखिलेश पर आक्रामक ही रही हैं। 2020 में अखिलेश ने जब माया ने जन्मदिन की बधाई दी तो उन्होंने जवाब तक नहीं दिया, जबकि उसी दिन बसपा प्रमुख ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी बुलाई थी। सपा को लेकर सवाल हुए तो तंज कसा कि आज राष्ट्रीय मुद्दों व दलों पर ही बात होगी। प्रदेशस्तरीय दलों पर बात करेंगे तो बहुत वक्त लग जाएगा। यह बात अखिलेश को नागवार गुजरी और उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि अब वह मायावती को जन्मदिन की बधाई नहीं देंगे। हालांकि, अखिलेश ने मायावती पर न कभी कोई टिप्पणी की और न ही बधाई का सिलसिला तोड़ा। उसके तरीके और टाइमिंग जरूर बदल गई।

एका की गुंजाइश है?
मायावती की अखिलेश को शुभकामनाओं के बाद दोनों दलों के साथ आने के कयासों को फिर हवा मिल रही है। सपा के गठबंधन सहयोगी ओम प्रकाश राजभर इन दिनों सावर्जनिक मंचों से अखिलेश और मायावती के एक साथ आने की वकालत करते दिख रहे हैं। उनका कहना है कि इसके लिए वह मायावती से बात भी करेंगे। हालांकि इसकी गुंजाइश बहुत कम दिखती है। मायावती के निर्णयों को लेकर अनिश्चितता व आरोपों की सियासत से अखिलेश अब सहज नहीं है। 2019 में फायदा बसपा को हुआ और नुकसान व आरोप दोनों अखिलेश के हिस्से आए। दोनों दलों के वोट एक-दूसरे को ठीक से ट्रांसफर नहीं होते हैं, यह भी साबित हो गया है। दूसरी ओर विधानसभा चुनाव और उसके बाद भी मायावती लगातार सपा के कोर मुस्लिम वोटरों को साधने की कवायद में जुटी हैं। हर सार्वजनिक बयान में वह उन्हें ही समझाने में लगी हैं। वहीं, बसपा के अधिकांश सिपहसलार अखिलेश अपने पाले में कर चुके हैं।

क्या राजनीति का स्टाइल बदल रही हैं?
बसपा के एक नेता का कहना है कि बहनजी ने अपनी राजनीति की स्टाइल को बदला है। अब वह अधिकतर नेताओं व हस्तियों को जन्मदिन या अन्य अवसर पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान कर रही हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ को सबसे पहले बधाई देने वालों में उनका नाम था। हालांकि, सियासी जानकार इसको दूसरे चश्मे से भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि बसपा पर भाजपा की ‘बी’ टीम होने का आरोप दूसरे विपक्षी दल पहले से ही लगा रहे हैं। आजमगढ़ उपचुनाव में बसपा ने सपा के कोर वोट में जबरदस्त सेंधमारी की, जिसके चलते भाजपा को अखिलेश के गढ़ में जीत मिली। राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने एनडीए उम्मीदवार का समर्थन किया है। इसके बाद सपा सहित दूसरे दलों ने माया पर भाजपा की छाया के आरोप मढ़ने और तेज कर दिए हैं। ऐसे में अखिलेश को जन्मदिन की बधाई देकर मायावती की कोशिश यह संदेश देने की है कि वह सभी दलों के नेताओं के साथ शिष्टाचार निभाती हैं और भाजपा के नेताओं से संवाद भी उसी का हिस्सा है।

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