“करो या मरो” से “करो और पेट भरो” तक पहुंचा भारत!

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हम भारत छोड़ो आंदोलन के 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। जिस आंदोलन में गांधी जी ने नारा दिया था, “करो या मरो” भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, “एक छोटा सा मंत्र मैं आप लोगों को दे रहा हूं। आप इसे अपने दिलों में उतार लें और अपनी हर सांस से इसे संचारित करें। ये मंत्र है “करो या मरो।” या तो हम भारत को आजाद करेंगे या इस प्रयास में हम अपनी जान दे देंगे। अपने को गुलाम देखने के लिए हम जीवित नहीं रहेंगे। हर सच्चा कांग्रेसी संघर्ष में इस निष्ठा के साथ शामिल होगा कि वो अपने देश को गुलामी और बंधन में देखने के लिए जीवित नहीं रहेगा। यही आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिए। भगवान के सामने ये प्रतिज्ञा कीजिए की आप तब तक आराम नहीं करेंगे जब तक स्वतंत्र नहीं हो जाते और स्वतंत्रा को पाने के लिए अपनी जान तक देने को तैयार रहेंगे। जो अपनी जान देगा उसे आजादी मिलेगी। जो अपनी जान बचाएगा उसे अपनी आजादी खोनी होगी। आजादी कायरों और कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है।”

गांधी के विकास मॉडल को नहीं अपनाया

हमने गांधी के विचारों को फैलाने के बजाय उन्हें युवाओं से दूर किया है। हमने अपनी नीति अमीरों के विकास के लिए बनाई है। पूंजीवादी व्यवस्था को हमारी सरकार ने बढ़ावा दिया है। दरअसल आजादी के बाद से ही गांधी के नाम को आगे बढ़ाया है लेकिन उनके विचारों को पीछे ढकेला है। विकास को लेकर गांधी का नजरिया देसी था, ग्रामिणों का विकास गांधी की प्राथमिकता थी। लेकिन आज स्थिति ये है कि रिकार्ड तोड़ रूप से ग्रामिणों का पलायन हो रहा है। किसान मर रहे हैं। मजदूर और निजी कर्मचारियों का घोर शोषण जारी है। शिक्षा का हाल बुरा है। स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। लोग असंवेदनशील हो गए हैं।

हम स्वार्थी और भ्रष्ट हो गए

गांधी ने कहा युवाओं जागरूक बनो, पर हम स्वार्थी बनते गए। हम भेड़ चाल चलते गए। उन्होंने शिक्षित बन राष्ट्र उत्थान की बात की, लेकिन हम शिक्षित बन भ्रष्टाचारी बन गए। उन्होंने युवाओं को समाज उत्थान में भाग लेने को कहा तो हम भ्रष्टतम नेता बन गए। उन्होंने कहा कि हमें गरीबी हटाना है तो हमने अपनी तिजौरी भर ली। भूखमरी मिटाने के बदले हमने अपने लिए अकूत दौलत जमा करना शुरू कर दिया। हमने अपने खून में भ्रष्टाचार को ऐसे उतार लिया मानों, भ्रष्टाचार हमारी राष्ट्र नीति हो गई हो।

गांधी जी के करो या मरो की जगह आज हमारे लिए सर्वोपरी हो गया है- आपना करो और पेट भरो। हमें ये कहने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ये केवल हमारी सरकारों ने किया है बल्कि इसके लिए हम भी बराबर के दोषी हैं। आज हमारे नेता हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं और डकैत हैं हमने अच्छे नेताओं को चुनना बंद कर दिया है। जिनके पास पैसा नहीं होता हम उनको वोट नहीं देते हैं। उनसे हमारा सरोकार नहीं होता है। इस विषय पर हम सबको सोचने की जरूरत है।

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