भारत और यूरोपीय संघ का बड़ा कदम: 'होराइजन यूरोप' कार्यक्रम से भारतीय शोधकर्ताओं के लिए खुलेंगे नए रास्ते
भारत के वैज्ञानिक और शोध संस्थान अब यूरोप के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित रिसर्च कार्यक्रम का हिस्सा बन सकेंगे। भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने 'होराइजन यूरोप' कार्यक्रम में भारत के शामिल होने को लेकर बातची…
भारत के वैज्ञानिक और शोध संस्थान अब यूरोप के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित रिसर्च कार्यक्रम का हिस्सा बन सकेंगे। भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने 'होराइजन यूरोप' कार्यक्रम में भारत के शामिल होने को लेकर बातचीत सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, यह समझौता भारत की रिसर्च और इनोवेशन क्षमता को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान देगा। इस ऐतिहासिक साझेदारी से भारतीय शोधकर्ताओं को यूरोपीय संघ की फंडिंग, रिसर्च समूहों और अत्याधुनिक सुविधाओं तक सीधी पहुंच मिल जाएगी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस समझौते को भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक साझेदारी में एक 'महत्वपूर्ण मील का पत्थर' बताया। उन्होंने कहा, "इसका उद्देश्य अनुसंधान सहयोग के लिए एक दीर्घकालिक ढांचा तैयार करना है, जो जनवरी 2026 में ऐतिहासिक भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान नेताओं की ओर से तय किए गए दृष्टिकोण के अनुरूप है।"
समझौते का भारत के लिए क्या मतलब है?
इस साझेदारी से भारतीय शोधकर्ताओं, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत के लिए कई नए अवसर खुलेंगे। अब वे 'होराइजन यूरोप' कार्यक्रम के तहत मिलने वाली फंडिंग के लिए सीधे आवेदन कर सकेंगे। इसके अलावा, उन्हें यूरोपीय रिसर्च समूहों के साथ मिलकर काम करने और वहां की अत्याधुनिक शोध सुविधाओं का लाभ उठाने का भी मौका मिलेगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय का मानना है कि इससे दोनों क्षेत्रों के बीच प्रतिभाओं के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा मिलेगा।
किन क्षेत्रों में होगा विशेष लाभ?
'होराइजन यूरोप' कार्यक्रम के दूसरे स्तंभ में शामिल क्षेत्र भारत की अपनी शोध प्राथमिकताओं से काफी मेल खाते हैं। इनमें स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, उद्योग और अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा एवं परिवहन, और खाद्य व जैव-अर्थव्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। इस सहयोग से भारत इन क्षेत्रों में अपनी वैज्ञानिक क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल कर सकेगा और महत्वपूर्ण तकनीकों व समाधानों के संयुक्त विकास का रास्ता भी साफ होगा। यह कदम भारत के 'विकसित भारत 2047' लक्ष्य की दिशा में नवाचार और शोध तंत्र को बड़ी मजबूती देगा।
कैसे पूरी हुई यह प्रक्रिया?
इस महत्वपूर्ण सहयोग की नींव 27 जनवरी 2026 को हुए भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान रखी गई थी। इसके बाद, 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में हुई व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की मंत्रिस्तरीय बैठक में बनी सहमति के आधार पर औपचारिक बातचीत शुरू की गई, जो अब सफलतापूर्वक पूरी हो गई है। यह समझौता भारत-ईयू विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते और भारत-ईयू व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद के तहत पहले से चल रहे सहयोग को और मजबूत करेगा।
इनपुट: IANS



