क्या है पूरा रामजन्मभूमि विवाद

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भारत का राजनीतिक इतिहास जब भी लिखा जाएगा, रामजन्मभूमि का ज़िक्र ज़रूर आएगा. इसका कारण साफ है, भारत की राजनीति में रामजन्मभूमि का बेहद ही महत्वपूर्ण योगदान है. असल में पूरा मामला क्या है, आखिर क्यों है इस मसले पर इतना विवाद, हम नीचे इस मामले की ऐतिहासिक तह तक जा कर जानने की कोशिश करेंगे

आखिर इस इस विवाद का बीज कब बोया गया?

बाबरी मस्जिद की नींव सन 1528 में बाबर के सेनापति ‘मीर बांकी खां’ ने रखी थी. इस जगह पर पहला दंगा सन 1853 में हुआ, और 1885 में ‘महंत रघुवर दास’ ने पहली बार अपील की, लेकिन जिला जज ने फैसला दिया कि जब इस ढांचे का निर्माण 356 साल पहले ही हो चुका है, तो विवाद कैसा?

भये प्रकट कृपाला

21 और 22 दिसंबर 1949 में पहली बार खबर फैली कि विवादित ढांचे के गर्भगृह में ‘रामलला’ की मूर्ति प्रकट हुई है. इसके बाद काफी समय तक यह मामला कोर्ट में चलता रहा.

विवादित ढांचे का ताला खुला

शाहबानों मामले में जब उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी फंसते हुए नज़र आये तो उन्होंने 1989 फरवरी में इस ढांचे का ताला खोलने का फैसला ले लिया. इसके बाद ‘विश्व हिंदू परिषद’ ने नवम्बर 1989 में इस जगह पर ‘निर्माण का शिलान्यास’ किये जाने का एलान किया. इसके बाद से व्यापक आंदोलन शुरू हो गया और गांव-गांव में शिलापूजन शुरू हो गया.

दंगे फैले, राजनीति चमकी

सन 1989 में कुल मिलाकर 706 दंगे दर्ज किए गए. सबसे ज्यादा दंगे बिहार के भागलपुर में हुए. दंगो की शुरुआत भी एक ऐसे ही कार्यक्रम के दौरान हुई. इसके बाद जो हुआ उसके गवाह तो सभी हैं, 6 दिसम्बर 1992 को जब रथयात्रा अयोध्या पहुंची , उसी दौरान भीड़ ने मस्जिद के गुम्बद को तोड़ दिया, उसके बाद से ही सारा मामला कोर्ट की हवा खा रहा है.

हालांकि 2010 में इस मामले का फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दे दिया है, लेकिन फिर भी धार्मिक मामलों का निपटारा इतनी आसानी से थोड़ी न होता है. आज भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने ‘मध्यस्थता’ से संबंधित फैसले को 8 हफ्ते बाद देने के लिए कहा है.