अनुसंधान और विकास में अमेरिका को चीन ने दी सीधी टक्कर, व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में खुलासा
अमेरिकी व्हाइट हाउस की विज्ञान नीति पर जारी एक अहम रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि अनुसंधान और विकास (R&D) पर होने वाले खर्च के मामले में चीन अब अमेरिका का बराबरी का प्रतिस्पर्धी बन गया है। समाचार…
अमेरिकी व्हाइट हाउस की विज्ञान नीति पर जारी एक अहम रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि अनुसंधान और विकास (R&D) पर होने वाले खर्च के मामले में चीन अब अमेरिका का बराबरी का प्रतिस्पर्धी बन गया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह रिपोर्ट बीजिंग की सुनियोजित कोशिशों के प्रति आगाह करती है, जिनसे महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में उसकी क्षमताएं तेज़ी से बढ़ रही हैं।
मंगलवार को व्हाइट हाउस के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति कार्यालय द्वारा जारी "साइंस: ए न्यू गोल्डन एज" नामक इस दस्तावेज़ में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में चीन ने R&D पर अपने खर्च को उस स्तर पर पहुँचा दिया है, जो 'परचेजिंग-पावर-एडजस्टेड' आधार पर अमेरिका के बराबर है। पहले इस क्षेत्र में चीन का खर्च अमेरिका की तुलना में लगभग न के बराबर था।
रणनीति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
रिपोर्ट में इस प्रतिस्पर्धा की तुलना शीत युद्ध के दौर से की गई है। दस्तावेज़ के मुताबिक, बीजिंग ने वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता को अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक रणनीति के केंद्र में रखा है, जहाँ सर्वोच्च स्तर पर फ़ैसले लिए जाते हैं और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान के प्रयासों में समन्वय स्थापित किया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया, "समाज के सभी वर्गों को शामिल करने वाले इस नज़रिए की वजह से चीन बुनियादी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए संसाधन जुटा पाया है, राष्ट्रीय हित की अहम टेक्नोलॉजी में तेज़ी से आगे बढ़ पाया है और अपनी इनोवेशन प्रक्रिया में सुधार कर पाया है।"
किन तकनीकों पर है ज़ोर?
व्हाइट हाउस का यह ब्लूप्रिंट अमेरिका के लगभग 200 अरब डॉलर के वार्षिक संघीय अनुसंधान और विकास सिस्टम को फिर से व्यवस्थित करने की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। इसमें संघीय संसाधनों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, न्यूक्लियर फिशन और फ़्यूजन, एडवांस्ड कम्युनिकेशन, रोबोटिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और स्पेस सिस्टम जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित करने की सलाह दी गई है। चीन को ऑटोनॉमस वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के क्षेत्र में भी एक प्रतिस्पर्धी के रूप में पहचाना गया है, जहाँ AI और रोबोटिक्स प्रयोगों को डिजाइन करने और संचालित करने में मदद कर सकते हैं।
भारत का उल्लेख नहीं
इस पूरी रिपोर्ट में भारत या किसी भी भारतीय वैज्ञानिक संस्थान का कोई उल्लेख नहीं है। दस्तावेज़ में बताए गए किसी भी राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी मिशन में भारत को एक संभावित साझेदार के रूप में भी नहीं पहचाना गया है। हालांकि, वित्तीय वर्ष 2028 की अनुसंधान प्राथमिकताओं से जुड़े एक मेमोरेंडम में संघीय एजेंसियों को ऐसी फंडिंग पहलों पर विचार करने की अनुमति दी गई है, जिनमें "अंतरराष्ट्रीय पार्टनर" लागत साझा करते हैं, लेकिन इसमें किसी विशेष देश का नाम नहीं है।
अन्य देशों से सीखने की सलाह
रिपोर्ट में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के उदाहरण के तौर पर कई अन्य देशों का भी ज़िक्र है। इसमें याद दिलाया गया है कि कैसे 1980 के दशक तक जापानी निर्माताओं ने वैश्विक मेमोरी-चिप बाज़ार पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसके जवाब में 14 अमेरिकी सेमीकंडक्टर कंपनियों ने मिलकर सेमाटेक कंसोर्टियम बनाया था। रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि अमेरिका में हुई खोजों का औद्योगिक लाभ अक्सर दूसरे देशों को मिला है, जैसे लिथियम-आयन बैटरी सप्लाई चेन पर एशियाई कंपनियों का दबदबा है।
इनपुट: IANS



